कोरोना वायरसः क्या अमरीका पहले जैसा बन पाएगा?

  • कैटी केय
  • प्रेज़ेंटर, बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़
अमरीका

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अमरीका में एक तरफ़ राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भले ही ये कहें कि "हम वापस लौटने का माद्दा रखने वाले लोग" हैं तो दूसरी तरफ़ वैज्ञानिकों ने ये चेतावनी दी है कि पाबंदियों में ढील देना आसान नहीं होगा.

क्योंकि अमरीका में आज भी ज़रूरत के हिसाब से संक्रमण की जांच और ट्रैकिंग की पूरी क्षमता नहीं है.

यूरोप में लॉकडाउन के बाद ज़िंदगी धीरे-धीरे पटरी पर आ रही है और अमरीकी बड़ी बेचैनी से ये होते हुए देख रहे हैं.

व्हॉइट हाउस और बिज़नेस लीडर्स की तरफ़ से बेइंतहा दबाव पड़ रहा है कि अमरीका में भी जितनी जल्दी हो सके चीज़ें वापस अपनी रफ़्तार पकड़े, इसकी कोशिश होनी चाहिए.

इस दिशा में जो भी प्रस्ताव रखे जो रहे हैं, वो बेहद बिखरे हुए और साफ़ नहीं हैं.

आम तौर पर लोग ये बात समझने लगे हैं कि दूसरे देशों की तुलना में अमरीका में हालात सामान्य होने में ज़्यादा वक़्त लग सकता है.

इसकी एक वजह तो ये भी है अमरीका एक बहुत बड़ा देश है. एक और वजह है, वो ये है कि अमरीका ने दूसरे देशों के बनिस्बत कोरोना वायरस से बचाव के लिए देर से कदम उठाया.

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कोरोनावायरस: ट्रंप के दावे और अमरीका की चिंता

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लॉकडाउन और पाबंदियों के फ़ैसले देर से लेने का मतलब ये था कि कोरोना वायरस पहले ही काफी फैल गया था. इसलिए इसके ख़त्म होने में ज़्यादा वक़्त लगेगा.

राष्ट्रपति ट्रंप के पूर्व सुरक्षा सलाहकार टॉम बॉज़र्ट कहते हैं, "देर से कदम उठाने वालों को तो पूरी दुनिया में सबसे ख़राब माना जाता है."

टॉम बॉज़र्ट ने साल 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश को किसी संभावित महामारी से निपटने के लिए योजना बनाने में मदद की थी.

टॉम तभी से ऐसी किसी महामारी के ख़तरे को लेकर सजग थे. फरवरी के आख़िर में उन्होंने व्हॉइट हाउस को इसके बारे में चेताया भी था लेकिन किसी ने उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया.

वैक्सीन मिलने से पहले क्या किया जा सकता है?

विशेषज्ञ इस बात पर तो सहमत हैं कि कोविड-19 के संक्रमण को या तो किसी वैक्सीन से रोका जा सकता है या फिर किसी मेडिकल थेरेपी से.

न्यूयॉर्क के गवर्नर एंड्रयू क्यूमो ने बुधवार को अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "जब हमारे पास वैक्सीन होगा, ये ख़त्म हो जाएगा. लेकिन वैक्सीन तैयार होने में 12 से 18 महीने का वक़्त लग सकता है."

इस बीच अमरीकी वैज्ञानिकों ने और डेटा की मांग की है ताकि उन्हें भरोसा हो सके कि कोरोना वायरस से संक्रमण की आशंका के बगैर अमरीकी अर्थव्यवस्था को दोबारा खोला जा सकता है.

वे जानना चाहते हैं कि कितने लोग संक्रमित हुए हैं. वे जानना चाहते हैं कि संक्रमण के समय मरीज़ के स्वास्थ्य की क्या स्थिति थी.

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राष्ट्रपति ओबामा के समय अमरीका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन विभाग के प्रमुख रही डॉक्टर पेग्गी हैमबर्ग कहती हैं, "विचार ये है कि हम पहले प्रतिरोधक दवाओं का परीक्षण करें और फिर लोगों को आर्थिक गतिविधियों में शामिल होने के लिए तैयार करें. लेकिन हम अभी तक उस स्थिति में नहीं पहुंचे हैं कि ये भरोसे के साथ किया जा सके."

लेकिन डॉक्टर पेग्गी हैमबर्ग बताती हैं कि वेस्टचेस्टर कंट्री, न्यूयॉर्क, सांता क्लारा काउंटी और कैलिफोर्निया में जो रिसर्च हो रहा है, उससे प्रतिरोधक दवाओं और इम्युनिटी के बारे में ज़्यादा जानकारी मिल सकती है.

घर में रहने से प्रतिरोधक क्षमता कैसे बढ़ेगी?

देश में जितने दिनों तक लॉकडाउन की स्थिति रहेगी, अर्थव्यवस्था को उतना ज़्यादा नुक़सान उठाना पड़ेगा. हां, इसका एक फ़ायदा ज़रूर है कि संक्रमित लोगों की संख्या कम होगी. स्वास्थ्य सुविधाओं को बचाने के लिहाज से ये अच्छा कदम ज़रूर है लेकिन कई हेल्थ एक्सपर्ट ये सवाल उठाते हैं कि अगर हम लोगों को प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने का मौका नहीं देंगे तो एक समुदाय के स्तर पर उनकी प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हो पाएगी जिसे कथित तौर पर कुछ लोग 'हर्ड इम्युनिटी' भी कहते हैं.

'हर्ड इम्युनिटी' यानी जब एक समुदाय की बड़ी आबादी में किसी संक्रामक बीमारी से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाए.

अमरीकी स्वास्थ्य एजेंसी सेंटर फ़ॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) के पूर्व प्रमुख टॉम फ्रीडेन का मानना है कि न्यूयॉर्क जैसी हॉटस्पॉट करार दी गई जगहों पर भी केवल 5 से 10 फ़ीसदी लोग ही संक्रमित हुए हैं. 'हर्ड इम्युनिटी' का स्तर हासिल करने के लिए किसी आबादी के 60 फ़ीसदी हिस्से का संक्रमित होता ज़रूरी होता है.

राष्ट्रपति ट्रंप के पूर्व सुरक्षा सलाहकार टॉम बॉज़र्ट कहते हैं, "वैज्ञानिकों को ज़रूरी डेटा चाहिए, उसकी मौजूदगी के बिना ही अमरीका को अर्थव्यवस्था का सामान्य कामकाज शुरू करना पड़ सकता है. क्योंकि ज़्यादा दिनों तक आर्थिक गतिविधियों के बंद रहने का नुक़सान ज़्यादा हो सकता है."

टॉम बॉज़र्ट ये भी चेतावनी देते हैं कि अप्रैल के आख़िर तक अमरीका में पर्याप्त संख्या में लोगों के टेस्ट नहीं कराए गए तो राजनेता पूरे भरोसे के साथ आर्थिक गतिविधियां दोबारा शुरू नहीं करा सकेंगे.

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जिन लोगों में कोई लक्षण नहीं हैं, क्या उनके टेस्ट भी कराये जाने चाहिए?

टॉम बॉज़र्ट का सुझाव है कि जिन लोगों में फ़्लू के लक्षण हैं, उन्हें कोरोना से संक्रमित मानकर उनको आइसोलेशन में रखा जाना चाहिए. टेस्ट करने की उपलब्ध क्षमता के अनुसार उन लोगों की जांच कराई जाए जिनमें कोई लक्षण नहीं है. अगर ऐसे लोग कोरोना पॉजिटिव पाए जाते हैं तो उन्हें भी आइसोलेशन में रखा जाए.

सिएटल में कुछ ऐसा प्रयोग किया जा रहा है. सिएटल कोरोना वायरस असेसमेंट नेटवर्क उन घरों को टेस्ट किट भेज रहा है, जिनके संक्रमित होने की संभावना तो है लेकिन उनमें ऐसा कोई लक्षण नहीं है.

कॉलेज हॉस्टल्स, इस्तेमाल नहीं हो रहे होटल, अस्पतालों के अतिरिक्त बेड्स पर लोगों को आइसोलेशन में रखा जा सकता है.

टॉम बॉज़र्ट का मानना है कि अगर अमरीकियों को घर में घर में आइसोलेशन में रहने के विकल्प दिया जाएगा तो वे ठीक से क्वारंटीन में नहीं रहेंगे.

लेकिन उनकी दलील से वो विवादास्पद सवाल भी जुड़ा हुआ है कि क्या लोगों को ऐच्छिक रूप से क्वारंटीन में रहने के लिए कहा जाए या फिर उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य किया जाए.

अगर कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों को ऐसे दो समूहों में बांट लिया जाए- पहला जिनमें लक्षण है, उन्हें पॉजिटिव माना जाए और दूसरा जिनमें लक्षण नहीं है लेकिन जांच में वो पॉजिटिव पाए जाएं- तो इस तरह से कोविड-19 के संक्रमण को फैलने से बड़े पैमाने पर रोका जा सकता है.

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क्या अमरीका सभी की टेस्टिंग और ट्रेसिंग कर पाएगा?

अगर आप टेस्टिंग का विकल्प चाहते हैं तो इसके समर्थन में ज़्यादा लोग होंगे. सभी चाहें कि टेस्ट कराये जाएं. अमरीका इस समय हर दिन एक लाख लोगों का टेस्ट करा पा रहा है.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के साफ्रा सेंटर का कहना है कि अमरीका को इस समय हर दिन 50 लाख से दो करोड़ लोगों के टेस्ट करने की ज़रूरत है.

अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफ़ेसर पॉल रोमर के मुताबिक़ अमरीका की ज़रूरत इससे कहीं ज़्यादा लोगों के टेस्ट कराने की है.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

वे कहते हैं, "अमरीका को इस समय दो करोड़ 20 लाख लोगों का टेस्ट हर दिन कराना चाहिए. ज़रूरत कहीं ज़्यादा की है क्योंकि लोगों को टेस्ट और फिर से दोबारा टेस्ट कराने की ज़रूरत है."

एक नज़रिये से कहें तो प्रोफ़ेसर पॉल रोमर अमरीका की मौजूदा क्षमता को 220 गुना बढ़ाने की वकालत कर रहे हैं.

ज़्यादा से ज़्यादा टेस्टिंग की ज़रूरत के अलावा अमरीका ये सच्चाई भी समझ रहा है कि संक्रमितों के संपर्क में आने वाले लोगों को ट्रैक किया जाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. दक्षिण कोरिया, सिंगापुर और हांगकांग ने ये कामयाबी के साथ किया है. ये एक श्रम साध्य प्रक्रिया है.

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न्यूयॉर्क के गवर्नर एंड्रयू क्यूमो कहते हैं कि अगर एक व्यक्ति संक्रमित होता है तो आप को उसके संपर्क में आने वाले 30 लोगों को खोजना पड़ सकता जो मुमकिन है कि संक्रमित हो गए होंगे.

'कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग' के लिए संघीय सरकार की तरफ़ से न तो लोगों की भर्ती और न ही प्रशिक्षण की कोई सुगबुगाहट दिख रही है.

बोस्टन की ग़ैरसरकारी संस्था 'पार्टनर्स इन हेल्थ' ज़्यादातर विकासशील देशों में काम करती है. 'कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग' के लिए उसनें 500 लोगों की भर्ती की है. सैनफ्रांसिस्को में ऐसे केवल दस लोग हैं जो 'कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग' के काम के लिए योग्य कहे जा सकते हैं. हालांकि वहां तीन दर्जन वॉलंटियर्स इस काम से हाल ही में जुड़े हैं.

लेकिन सीडीसी के पूर्व प्रमुख टॉम फ्रीडेन का अनुमान है कि अमरीका को इस समय तीन लाख 'कॉन्टैक्ट ट्रेसर्स' की ज़रूरत है.

तकनीक मदद कर सकती है पर नागरिक अधिकारों का क्या होगा?

चूंकि अमरीका में पहले ही कोरोना वायरस का संक्रमण व्यापक स्तर पर हो चुका है. इसलिए अमरीका को 'कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग' के लिए मानव श्रम के अलावा टेक्नॉलॉजी की भी मदद लेनी होगी. दक्षिण कोरिया और सिंगापुर में मोबाइल ऐप्स का इस्तेमाल किया गया था.

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लॉकडाउन उठाने के लिए अमरीका में छह चरणों वाली जिस योजना पर काम किया जा रहा है, उस पर उदारवादी मानी जाने वाले थिंकटैंक 'सेंटर फ़ॉर अमरीकन प्रोग्रेस' का कहना है कि टेक्नॉलॉजी की मदद ली जानी चाहिए लेकिन प्राइवेसी से जुड़े नागरिक अधिकारों का सम्मान भी ज़रूरी है.

'सेंटर फ़ॉर अमरीकन प्रोग्रेस' के मुताबिक़ ऐसे डेटा को भरोसेमंद और ग़ैरलाभकारी संस्था के पास रखा जाना चाहिए और हर 45 दिन पर इसे डिलीट भी कर दिया जाना चाहिए.

दूसरे थिंकटैंक्स भी कमोबेश ऐसी ही कुछ योजनाएं लेकर सामने आए हैं जिनमें टेस्टिंग, ट्रेसिंग और क्वारंटीन के साथ प्राइवेसी के अधिकार की कहीं ज़्यादा तो कहीं कम संरक्षण की बात की गई है.

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