कोरोना महामारी के बीच क्यों बढ़ा अमरीका-ईरान तनाव

  • जोनाथन मर्कस,
  • डिप्लोमेटिक संवाददाता, बीबीसी
खाड़ी क्षेत्र

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पिछले साल अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने एक भाषण में कहा था कि अमरीका की क्रांतिकारी सेना ने 1770 के दशक में ब्रिटिशों से एयरपोर्ट छीन लिए थे.

अगर उस बयान के परिपेक्ष्य में देखें तो बुधवार को नौसेना कमांडरों को अमरीकी युद्धपोतों को परेशान करने वाले ईरानी नौसेना के सशस्त्र नाविकों को मार गिराने के आदेश वाला उनका ट्वीट कहीं छोटा झूठ है.

लेकिन यह निश्चित तौर पर, इस साल की शुरुआत में ईरानी कुद्स फोर्स यानी इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के कमांडर जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या के बाद अमरीका की ओर सैन्य कार्रवाई सबसे सख्त संदेश है.

अमरीकी हमले में सुलेमानी के मारे जाने के बाद अमरीका और ईरान संघर्ष के कगार पर पहुंच गए थे.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि हाल में ऐसा क्या हुआ है कि जिसके चलते ट्रंप को चेतावनी देनी पड़ी है? जब ईरान और अमरीका, दोनों मुल्क कोविड-19 महामारी से संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे वक़्त में दोनों देशों के बीच तनाव क्यों बढ़ रहा है?

कोविड के दौर में भी तनाव जारी

डोनाल्ड ट्रंप के संक्षिप्त धमकी की तात्कालिक वजह पिछले सप्ताह की घटना है. अमरीका के मुताबिक़ पिछले सप्ताह ईरान की इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड (आईआरजीसी) की नौ सेना द्वारा संचालित कई सशस्त्र स्पीडबोट्स ने खाड़ी क्षेत्र में अमरीकी युद्धपोत के बेड़े को परेशान किया था.

अमरीकी युद्धपोत के बेड़े में असधारण क्षमता वाला मोबाइल बेस पोत यूएसएस लुइस बी पुलर और विध्वंसक पोत यूएसएस पॉल हैमिल्टन भी शामिल थे.

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अमरीकी नौ सेना ने कहा कि एक बार तो ईरानी सशस्त्र नौका तेज़ गति से अमरीकी बेड़े की सुरक्षा कर रहे कोस्ट गार्ड कटर से महज 9 मीटर क़रीब से गुजरा था. इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड ने भी झड़प की बात मानी है लेकिन इसके लिए अमरीकियों को ज़िम्मेदार ठहराया है.

ईरानी कुद्स फोर्स के कमांडर इन चीफ जनरल हुसैन सलामी ने गुरुवार को कहा है कि उन्होंने ईरानी नौसेना को "उन अमरीकी सैन्य बल को ख़त्म करने का आदेश दिया है जिससे ईरान के खाड़ी क्षेत्र में सैन्य या नागरिक समुद्री पोत को कोई ख़तरा हो."

अब आशंका जताई जा रही है कि जुबानी जंग कहीं एक्शन में ना तब्दील हो जाए. हालांकि इसमें डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट वाले आदेश से बहुत बदलाव होगा, ऐसा नहीं है.

तनाव गहराने की आशंका

खाड़ी में तैनात अमरीकी युद्धपोतों के कमांडर उन फ़ैसलों को लेने में सक्षम होते हैं जो उनके मुताबिक़ युद्धपोत और उनके साथियों की सुरक्षा के लिए जरूरी हों. इतना ही नहीं वे, छोटे ईरानी नावों की झुंड वाली रणनीति के अभ्यस्त हैं.

बहरहाल इस प्रकरण से इतना साफ़ है कि कोरोना वायरस महामारी के समय में भी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले से मौजूद तनाव कम नहीं हुआ है, उल्टे उनके गहरे होने होने की आशंका है.

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ऐसा इसलिए है क्योंकि अमरीका और ईरान का एक दूसरे को लेकर जो रणनीतिक लक्ष्य है, उसमें बदलाव नहीं हुआ है. ईरान खाड़ी क्षेत्र में अमरीकी दबदबे को कम करना चाहता है और अमरीका अपने दबदबे को बढ़ाना चाहता है.

उदाहरण के लिए हाल में सीरिया पर इइराइली हवाई हमलों में तेज़ी से इस इलाक़े में ईरान और उसके सहयोगियों के अपने लक्ष्य के प्रति सक्रिय होने के संकेत मिलते हैं.

दरअसल, कुछ ईरानी नेताओं जिनमें कोविड-19 के समय में मज़बूत होते कट्टरपंथी भी शामिल हैं को लग रहा कि कोरोना संक्रमण के चलते अमरीका अपने घरेलू मोर्चे पर संघर्ष कर रहा है, इसका फ़ायदा उठाते हुए ईरान खाड़ी क्षेत्र में अपनी स्थिति मज़बूत कर सकता है.

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वहीं ट्रंप प्रशासन भी कोविड-19 को एक मौक़े के तौर पर देख रहा है और ईरानी पर अधिकतम दबाव डालने की अपनी रणनीति पर ज़ोर दे रहा है. ये बात विशेषज्ञ साझा नहीं कर रहे हैं लेकिन कहा जा रहा है कि कोरोना महामारी से तेहरान में इस्लामिक शासन के पतन का कारण बन सकती है.

बेहतर होता ईरानी मिसाइल कार्यक्रम

हालांकि इस बीच, ईरान दूसरे मोर्चों पर भी आगे बढ़ रहा है.

इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड के दावे के मुताबिक़ ईरान ने सैन्य सैटेलाइट लॉन्च किया है. माना जा रहा है कि यह उत्तर कोरियाई तकनीक पर निर्भर रॉकेट के ज़रिए किया गया है. इससे पता चलता है कि ईरान का मिसाइल कार्यक्रम लगातार बेहतर हो रहा है.

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वैसे ईरान मोटे तौर पर विश्व शक्तियों के साथ 2015 के उस समझौते में शामिल है जिसमें आण्विक गतिविधियों को सीमित करने पर ज़ोर दिया गया था, लेकिन वह इस समझौते की कई शर्तों का उल्लंघन कर रहा है.

विशेषज्ञों को इस बात की चिंता है कि तेहरान प्रशासन के कई क़दम समझौते के उलट हैं. ऐसा लग रहा है कि ईरान उस स्थिति की तरफ़ बढ़ रहा है कि जहां से वह गुप्त रूप से अंतरराष्ट्रीय निगरानी से परे यूरेनियम संवर्धन के लिए ज़रूरी मशीनरी कार्बन फाइबर सेंट्रिफ्यूज बना सकता है.

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अमरीका और ईरान के तनाव कम हो सकते हैं अगर उन्हें अस्थायी रूप से पीछे रखा जा रहा हो लेकिन स्पष्ट है कि ऐसा है नहीं.

ऐसे में किसी आकस्मिक संघर्ष छिड़ने का ख़तरा पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बना हुआ है. क्योंकि दोनों देश कोरोना वायरस महामारी से लड़ने की एक दूसरे की क्षमता और एक दूसरे पर पड़ने वाले असर को लेकर गफलत में हैं.

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