कोरोना संकट से किन मुश्किलों में घिरे हैं इमरान ख़ान

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इमरान ख़ान पर कोरोना संकट को लेकर लगातार दबाव बढ़ रहा है
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इमरान ख़ान पर कोरोना संकट को लेकर लगातार दबाव बढ़ रहा है

सत्ता में आने के बाद पहला साल बढ़ती महँगाई और लोगों को नाख़ुश करनेवाले सुधारों से जूझते इमरान ख़ान ने कहा था 2020 का साल पाकिस्तान की तरक्की का साल होगा. मगर कोरोना संकट ने उनकी योजना पर पानी फेर दिया है.

सेना के समर्थन के बावजूद लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था पहले ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के नेतृत्व की परीक्षा ले रही थी. विपक्षी पार्टियाँ बँटी होने के बावजूद सरकार के कामकाज की आलोचना करती रहीं.

आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों के अलावा पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को गेहूँ और चीनी की कमी को लेकर अपनी पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ़ के नेताओं के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से भी दो-चार होना पड़ा जिससे उनकी छवि पर गंभीर दाग़ लगा.

और इसी सियासी संघर्ष के बीच पाकिस्तान के स्वास्थ्य मंत्री ज़फ़र मिर्ज़ा ने 26 फ़रवरी को देश के पहले कोरोना संक्रमण की पुष्टि की.

25 अप्रैल तक पाकिस्तान में 12,500 से ज़्यादा लोगों के संक्रमित होने और 250 से ज़्यादा लोगों के मारे जाने का आँकड़ा सामने आया है.

प्रांतों के साथ लॉकडाउन पर मतभेद

पाकिस्तान में केंद्र सरकार पर संकट को लेकर भ्रम फैलाने और स्पष्ट नीति ना होने का आरोप लगाया जा रहा है.

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री 15 मार्च को अपने पहले सार्वजनिक संबोधन में संकट को बहुत गंभीर बताने से बचे और लॉकडाउन की संभावना से ये कहते हुए इनकार किया कि देश की आर्थिक स्थिति बहुत नाज़ुक है और उनकी ये ज़िम्मदारी है कि वो देखें कि कोई ग़रीब भूख से ना मारा जाए.

लेकिन उनके विरोध के बावजूद, प्रांतीय सरकारों ने 22 मार्च से अपने यहाँ लॉकडाउन लागू कर दिया.

सिंध प्रांत जहाँ कि विपक्षी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार है, और गिलगिट-बाल्टिस्तान जहाँ पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ काबिज़ है, इन दोनों सूबों की सरकारों ने पूरी तरह से लॉकडाउन लागू कर दिया.

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पंजाब और बलोचिस्तान ने, जहाँ इमरान ख़ान की पीटीआई सत्ता में है, वहाँ की सरकारों ने सामाजिक दूरी को लागू करवाने के लिए सेना की मदद माँगी.

इमरान ख़ान ने इसके बाद 25 मार्च को संसद में अपने भाषण में प्रांतीय सरकारों से अपने फ़ैसलों पर पुनर्विचार करने का आग्रह करते हुए कहा कि इससे सामानों की सप्लाई चेन पर असर पड़ेगा और सामानों की किल्लत हो सकती है.

हाल के समय में उन्होंने ये भी चिंता जताई कि कोविड-19 के मामलों में उछाल से पाकिस्तान की पहले से ही चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है.

लेकिन इसके बाद भी उनकी सरकार ने 14 अप्रैल को कुछ उद्योगों और धार्मिक आयोजनों पर से पाबंदियाँ हटा लीं और चेतावनी दी कि सामाजिक दूरी के नियमों को नहीं मानने पर सख़्त कार्रवाई होगी.

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने साथ ही साढे सात अरब डॉलर के राहत पैकेज की भी घोषणा की और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कर्ज़ में रियायत देने की अपील की.

कोरोना से लड़ाई की कमान क्या सेना के हाथ में है?

कोरोना महामारी को लेकर एलान भले ही इमरान कर रहे हों मगर घटनाएँ यही बताती हैं कि फ़ैसला लेने के काम में सेना का वर्चस्व बना हुआ है.

सरकार ने 14 मार्च को कोरोना वायरस पर नेशनल कोऑर्डिनेशन कमिटी बनाई जिसमें सेना और ख़ुफ़िया अधिकारी शामिल थे.

इस कमिटी की बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री ने की मगर वहाँ सेना प्रमुख जेनरल क़मर बाजवा भी मौजूद थे.

वहीं सेना लॉकडाउन को लागू करवाने में भी प्रांतीय सरकारों के साथ खड़ी थी जबकि प्रधानमंत्री इसके पक्ष में नहीं थे.

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23 मार्च को, प्रधानमंत्री के लॉकडाउन को नकार देने के एलान के ठीक एक दिन बाद, गृहमंत्री रिटायर्ड ब्रिगेडियर एजाज़ अहमद शाह ने सशस्त्र सेनाओं को तैनात करने की चारों प्रांतों, संघीय क्षेत्रों और पाकिस्तान-प्रशासित कश्मीर के आग्रह को मंज़ूरी दे दी.

इसी दिन सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल बाबर इफ़्तिख़ार ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पाबंदियों का पूरा ब्यौरा दिया.

कोरोना महामारी से निबटने की रणनीति किसके हाथ में है इसका एक और संकेत मिला 1 अप्रैल को जब लेफ़्टिनेंट जनरल हामूद उज़्ज़मां को नेशनल कमांड एंड ऑपरेशन सेंटर का चीफ़ कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया गया.

वरिष्ठ मंत्रियों और अधिकारियों वाली ये संस्था महामारी को लेकर क्या क़दम उठाने हैं इसका निर्णय करती है.

मगर इस संस्था की बैठक में सेना प्रमुख आए – इमरान ख़ान नहीं.

सरकार की हर ओर आलोचना

महामारी के हर चरण में विपक्ष पाकिस्तानी प्रधानमंत्री पर हमला बोलता रहा है.

लॉकडाउन नहीं करने को लेकर ख़ास तौर से पीपीपी ने उनकी ख़ूब खिंचाई की.

मीडिया ने भी उन्हें नहीं बख़्शा और अख़बारों से लेकर टीवी तक पर जानकार उनके इस फ़ैसले पर सवाल उठाते रहे.

उदार सोच वाले कुछ मीडिया समूहों ने भी उनकी आलोचना की. देश के नामी अंग्रेज़ी अख़बार डॉन ने एक लेख में दावा किया कि प्रधानमंत्री उद्योगपतियों की सलाह पर फ़ैसले ले रहे हैं और उन्हें गंभीर मौक़ों पर बड़े फ़ैसले लेने में दिक्कत होती है.

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मध्यमार्गी और रूढ़िवादी विश्लेषकों ने ग़रीबों की बात करने को लेकर प्रधानमंत्री से थोड़ी सहानुभूति दिखाई मगर लॉकडाउन पर उनके क़दम से असहमति जताई.

वैसे ये दिलचस्प है कि कोरोना संकट पर सरकार की कड़ी आलोचना करने वाले सुप्रीम कोर्ट ने इमरान ख़ान पर कोई टिप्पणी नहीं की है.

13 अप्रैल को चीफ़ जस्टिस गुलज़ार अहमद ने केंद्रीय मंत्रिमंडल पर अक्षमता का आरोप लगाते हुए उनकी आलोचना तो की मगर कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री पर भरोसा है.

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