कोरोना काल में लेबनान में क्यों लगी है असंतोष की आग

लेबनान

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एक ओर जहाँ दुनिया कोरोना वायरस के कारण फैला महामारी से जूझ रही है, वहीं मध्य पूर्व का एक देश लेबनान आर्थिक संकट के जूझ रहा है.

ये संकट देश को भूखमरी के रास्ते पर ले जा रही है और इस कारण बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए हैं.

दरअसल लेबनान का ये संकट कोरोना काल के पहले से चल रहा है. अक्तूबर को लाखों की संख्या में लोगों ने सरकार विरोधी प्रदर्शन किया था और साद अल हरीरी की सरकार को पद छोड़ना पड़ा था.

लेकिन हालात उसके बाद भी नहीं सुधरे और नई सरकार से भी लोग संतुष्ट नहीं हुए. पहले से ही संकट झेल रहा लेबनान अब कोरोना की वजह से और बुरे दौर में चला गया है.

लोगों के पास पैसे नहीं हैं, कोरोना के कारण बिजनेस ठप है और रोज़गार न के बराबर.

लेबनान में कोरोना के मामले अभी उतने ज़्यादा नहीं है. ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ वहाँ संक्रमण के 717 मामले सामने आए हैं और 24 लोगों की मौत हुई है.

लोगों क्यों हैं परेशान

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बीबीसी की मध्यपूर्व संवाददाता लीना सिंजाब का कहना है कि बड़ी संख्या में लोगों की नौकरियाँ गई हैं और बड़ी संख्या में लोगों की सेलरी में 30 फ़ीसदी तक की कटौती हुई है.

29 वर्षीय यास्मीन हामूद की नौकरी चली गई है और अब वे सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल हो गई हैं. उनका कहना है कि उनकी कंपनी ने इन प्रदर्शनों को आधार बनाकर पहले तो उनकी सेलरी कम की और फिर नौकरी ले ली.

उन्होंने बताया, "जनवरी में मुझसे कहा गया कि मैं बिना वेतन के छुट्टी ले लूँ और स्थिति जब बेहतर होगी, मुझे वापस बुला लिया जाएगा. लेकिन किसी को पता नहीं कि स्थिति कब बेहतर होगी."

किराये के मकान में रहने वाली यास्मीन को अब कोई रास्ता नहीं नज़र आता. उनकी चिंता अपनी जीविका को लेकर है कि वे कैसे किराया देंगी और अन्य ख़र्च वहन करेंगी.

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यास्मीन की ये समस्या अकेले की नहीं है, लेबनान में बड़ी संख्या में ऐसे युवा है, जिनके सामने रोज़ी रोटी का संकट आ पड़ा है.

मार्च में कोरोना वायरस के संक्रमण को देखते हुए लेबनान की सरकार ने भी अन्य देशों की तरह कर्फ़्यू की घोषणा कर दी और लोगों के बाहर निकलने पर पाबंदियाँ लगा दी गई.

शुरू में इसके कारण पहले से ही सरकार से नाराज़ चल रहे प्रदर्शनकारी भी वापस लौट गए.

पिछले सप्ताह शुक्रवार को लेबनान की सरकार ने देश की अर्थव्यस्था को खोलने के लिए पाँच चरणों की घोषणा की. बस लोगों का धैर्य जवाब दे दिया. लॉकडाउन के कारण घरों में बंद बेरोज़गार युवक पाबंदी की परवाह किए बिना सड़कों पर उतर आए.

बैंकों पर क्यों हो रहे हैं हमले

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प्रदर्शन हिंसक हो गया. बैंकों पर हमले हुए. नेशनल हाईवे को बंद कर दिया गया और सेना के साथ प्रदर्शनकारियों का टकराव हुआ. बैंक से पैसे न निकल पाने की निराशा में एक व्यक्ति ने बैंक के अंदर ही ख़ुद को आग लगाने की कोशिश की.

लोग ख़ास तौर पर बैंक से इसलिए नाराज़ हैं क्योंकि वे अपना पैसा भी नहीं निकाल सकते. बैंकों ने सीमित रूप से पैसा निकालने की अनुमति दी है. कई बैंकों से आप सप्ताह में 50 यूएस डॉलर तक ही निकाल सकते हैं.

लेबनानी पाउंड की क़ीमत में डॉलर के मुक़ाबले 60 फ़ीसदी की गिरावट आई है और क़ीमतें आसमान छू रही हैं. हालात को देखते हुए प्रदर्शकारी हिंसक हो गए. कई बैंकों पर हमले हुए और एटीएम नष्ट कर दिए गए.

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स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां

आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST

पिछले साल अक्तूबर में एक डॉलर की क़ीमत 1500 लेबनानी पाउंड थी, जो बढ़कर 4500 हो गई है.

कार्नेगी इन्डावमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल पीस में मध्य पूर्व सेंटर की डायरेक्टर माहा याहया ने बताया कि लेबनानी बैंक्स ने लोगों को ज़्यादा ब्याज़ देने की बात कहकर आकर्षित किया. ऐसा ब्याज़ दर दुनिया का कोई बैंक नहीं देता.

याहया के मुताबिक़ उसके बाद इन बैंकों ने लोगों का पैसा सेंट्रल बैंक में जमा कर दिया. लेकिन सेंट्रल बैंक ने ये पैसा सरकार को दे दिया. पहले से ही क़र्ज़ में चल रही सरकार ने ज़रूरत से ज़्यादा ख़र्च कर दिया.

अब इन बैंकों के पास नकदी की कमी हो गई और इस कारण लोगों को अपना पैसा तक नहीं मिल पा रहा है.

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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समाप्त

लेबनान के प्रधानमंत्री हसन दियाब ने सेंट्रल बैंक के गवर्नर रियाद सलामेह पर संकट का ठीकरा फोड़ा है. प्रधानमंत्री का कहना है कि सेंट्रल बैंक के गवर्नर की नीतियों से ऐसी स्थिति आ गई है.

हालांकि हिज्बुल्लाह ने कहा कि सेंट्रल बैंक के गवर्नर इस स्थिति के लिए अकेले ज़िम्मेदार नहीं हैं. संगठन के डिप्टी लीडर शेख़ नईम कासिम ने कहा कि ये पिछली कई सरकारों की नीतियों का नतीजा है.

लेबनान में रोज़ाना के ट्रांजैक्शन डॉलर में होते हैं. अब स्थिति ये है कि देश में डॉलर की कमी हो गई है और लेबनानी पाउंड की क़ीमत लगातार गिर रही है. लोगों को अपने पैसे नहीं मिल रहे हैं और सरकार के पास आयात के लिए पैसे की कमी है.

अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ़ बेरूत में प्रोफ़ेसर जाद चाबान ने वॉशिंगटन पोस्ट को बताया, "2020 के शुरू से अभी तक मंहगाई की दर 50 से 60 फ़ीसदी तक बढ़ गई है. लोगों की क्रय शक्ति ख़त्म हो गई है और ग़रीबी तेज़ी से बढ़ी है. इसी कारण बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर हैं."

रविवार को लेबनान का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच बहस हो रही है. इस वीडियो में प्रदर्शनकारी कहता है- मैं भूखा हूँ और आपके सामने खड़ा हूँ. मारो मुझे. इस पर पुलिस अधिकारी जवाब देता है- मैं आपसे ज़्यादा भूखा हूँ.

इस पर अन्य प्रदर्शनकारी चिल्लाते हैं- तो आप क्या कर रहे हैं, प्रदर्शन में शामिल हो जाइए.

एक की मौत, लेबनान की स्थिति गंभीर

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मंगलवार को त्रिपोली में सेना और प्रदर्शनकारियों के बीच हुई हिंसक झड़प में एक व्यक्ति की मौत हो गई है. इस हिंसा में 30 लोग घायल भी हुए हैं.

सरकारी न्यूज़ एजेंसी ने दावा किया है कि अब त्रिपोली में स्थिति शांतिपूर्ण है और वहाँ अतिरिक्त सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है.

सुरक्षाकर्मी संदिग्ध प्रदर्शनकारियों के घरों पर छापे मार रही है. मंगलवार की हिंसा में एक बैंक को आग भी लगा दी गई थी.

प्रदर्शनकारी राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव की मांग कर रहे हैं. उनकी मांग देश से भ्रष्टाचार ख़त्म करने की भी है.

लेबनान की सेना ने इस घटना पर खेद जताया है और मामले की जाँच का आदेश दिया है.

लेबनान में यूएन के स्पेशल को-ऑर्डिनेटर जान कुबिच ने त्रिपोली की घटना देश के राजनीतिक नेतृत्व के लिए चेतावनी है.

उन्होंने कहा कि ये समय बैंकों पर हमला करने का नहीं है. उन्होंने अपील की कि देश में बढ़ती भूखमरी और बेरोज़गारी पर ध्यान देने की आवश्यकता है और लोगों को मदद मिलनी चाहिए.

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