अमरीका में नस्लभेद को उजागर करने वाला वो आसान सवाल

एक आसान सवाल जिसने अमरीका में नस्लभेद को उजागर कर दिया

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आंदोलनकारी और शिक्षिका जेन इलियट

अमरीका में जगह जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. कई जगहों पर ये विरोध हिंसक भी रहे हैं. मुद्दा है, नस्लवाद. यह मुद्दा भले ही सदियों पुराना हो लेकिन यह तब जितना प्रासंगिक था आज भी उतना ही है.

अमरीका के 75 शहरों में एक काले अफ़्रीकी-अमरीकी जॉर्ज फ़्लॉयड की मौत के बाद से विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं. इन प्रदर्शनों में हज़ारों लोग शामिल हैं.

मिनियापोलिस में 25 मई को जॉर्ज की मौत हो गई थी. उनकी गर्दन पर एक पुलिसकर्मी ने अपना घुटना रखा हुए था. जॉर्ज उनसे विनती कर रहे थे कि वो सांस नहीं ले पा रहे हैं और उसके बाद उनकी मौत हो गई.

ये प्रदर्शन अमरीका से निकलकर 2 जून को लंदन, बर्लिन और ऑकलैंड जैसे शहरों में पहुंच गया, जिसे सोशल मीडिया पर #BlackoutTuesday का नाम दिया गया.

87 वर्षीय आंदोलनकारी और शिक्षिका जेन इलियट बीबीसी से कहती हैं "वर्तमान प्रदर्शन हम गोरों द्वारा बनाई गई परिस्थितियों का परिणाम है, हम अपने व्यवहार के परिणामों को भुगत रहे हैं."

वो कहती हैं, "आप 300 सालों तक एक होशियार लोगों के समूह से दुर्व्यवहार नहीं कर सकते और उनसे उम्मीद नहीं कर सकते कि वो इसे अनिश्चितकाल तक सहेंगे."

विरोध प्रदर्शनों के बाद जो दंगें भड़के हैं उनकी तुलना 4 अप्रैल 1968 से की जा रही है, जब प्रसिद्ध आंदोलनकारी मार्टिन लूथर किंग जूनियर की हत्या कर दी गई थी.

युवा इलियट के लिए तब यह एक टर्निंग पॉइंट था. वो एक प्रयोग के ज़रिए लोगों को उनके नस्लवाद को लेकर पूर्वाग्रहों और जाने-अनजाने में किए गए व्यवहार के बारे में बताने लगीं.

इसके बाद इलियट दुनिया की प्रसिद्ध शिक्षाविद और नस्लवाद-विरोधी आंदोलनकारी बनीं.

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नीली आंखें, भूरी आंखें

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दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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इलियट लोगों को समझाना चाहता थीं कि कैसे नस्लवाद समाज में एक आम बात हो गई है.

मार्टिन लूथर किंग जूनियर की जब हत्या की गई, उस समय इलियट ग्रामीण लोवा के सरकारी मिडिल-स्कूल में युवा शिक्षिका थीं.

अगले दिन जब वो स्कूल गईं तो उन्होंने छात्रों के लिए एक एक्सरसाइज़ बनाई जिसमें उन्हें नस्लवाद और इससे होने वाले नुक़सान के बारे में बताना था.

उन्होंने इस प्रायोगिक एक्सरसाइज़ का नाम रखा 'नीली आंखें, भूरी आंखें.'

यह उन युवा बच्चों को समझाने के लिए काफ़ी था कि शुरुआती दिक़्क़त वहां से शुरू होती है जब कोई अपने आप को दूसरे से रंग के मुक़ाबले श्रेष्ठ समझने लगता है.

इलियट ने क्लास को दो समूहों में बांटा. एक को भूरा रुमाल दिया गया और कहा गया कि वो 'भूरी आंखें' टीम है और दूसरे को नीला रुमाल दिया गया और कहा कि वो 'नीली आंख' वाली टीम का प्रतिनिधित्व करते हैं.

इसके बाद उन्होंने क्लास से कहा कि 'भूरी आंखों' वाली टीम बेहद समझदार और साफ़ टीम है और इनको अधिक खेलने का समय जैसी सुविधाएं दी जानी चाहिए.

साथ ही इलियट ने कहा कि नीली आंखों वाली टीम के बच्चों ने सबकुछ ख़राब कर दिया इसलिए अगर वो उस फ़ाउंटेन से पानी पीते हैं जहां से भूरी आख़ों वाली टीम के बच्चे पीते हैं तो उन्हें डिस्पोज़ेबल कप का इस्तेमाल करना होगा ताकि वो उनको न छू पाएं.

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छोटी बच्ची ने की चौंकाने वाली टिप्पणी

इलियट कहती हैं कि बच्चों का व्यवहार तुरंत बदल गया. 'भूरी आंखों' वाली टीम के बच्चे 'नीली आंखों' वाली टीम के बच्चों के आगे बेहद आत्मविश्वासी, दूसरों को नीचा दिखाने वाले और निर्दयी हो गए.

सोमवार को इलियट ने इसी एक्सरसाइज़ को दोहराया लेकिन इस बार उन्होंने भूमिकाएं बदल दीं.

इस परीक्षण के आख़िर में उन्होंने बच्चों से उनके अनुभवों पर टिप्पणी करने के लिए कहा.

डेबी ह्यूस नामक लड़की ने कहा, "भूरी आंखों के साथ वाले बच्चों ने नीली आख़ों वालों के साथ भेदभाव किया."

डेबी की टिप्पणियों को स्मिथसोनियन इंस्टिट्यूशन की वेबसाइट ने संभालकर रखा है.

लड़की ने इसके बाद कहा, "मैं 'भूरी आखों' वालों के साथ थी और मुझे लगता था कि मैं जब चाहूं उन्हें मार सकती हूं."

डेबी के कई साथियों ने उससे सहमति भी जताई.

डेबी ने कहा, "जैसे ही हमने भूमिकाएं बदलीं तो मुझे लगा कि मैं स्कूल छोड़ दूं. मुझे गुस्सा आया. यह ऐसा था कि कैसे वो आपसे भेदभाव करते हैं."

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पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हुआ प्रयोग

इलियट ने इस प्रयोग को 'नस्लवाद के जीवित वायरस का इंजेक्शन' नाम दिया.

'नीली आंखें, भूरी आंखें' नाम की एक्सरसाइज़ ने विश्व प्रसिद्धि हासिल की और कई सालों तक विभिन्न देशों के हज़ारों लोगों ने इसमें भाग लिया.

2016 में बीबीसी के 100 वुमेन प्रोजेक्ट में इलियट को शामिल किया गया.

हालांकि, यह प्रयोग विवादों में भी रहा. कुछ लोगों ने इसे ओरवेलियन प्रयोग (जॉर्ज ऑर्वेल के विचारों के विवरण के बाद उसे एक स्वतंत्र और खुले समाज के कल्याण के लिए विनाशकारी बताया गया.) कहा, जो ख़ुद से नफ़रत करना सिखाता है. डेनवर के एक स्तंभकार ने इसे 'शैतान' तक कहा.

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एक साधारण सवाल

हालांकि, इसके बाद भी इलियट ने कुछ और काम किए हैं.

उसका एक सबसे अच्छा उदाहरण 1996 में 'नीली आंखें' नामक डॉक्युमेंट्री में रिकॉर्ड किया गया भाषण है.

लोगों से भरे ऑडिटोरियम में इलियट पूछती हैं, "मैं चाहती हूं कि इस कमरे में मौजूद वो सभी गोरे लोग खड़े हो जाएं जो आमतौर पर समाज द्वारा काले नागरिकों से किए जाने वाले व्यवहार पर ख़ुश होंगे."

इसके बाद एक सन्नाटा छा गया और दर्शक इलियट की ओर अपनी कुर्सियों से देखते रहे.

उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा, "क्या आपको मेरी बात समझ नहीं आई?"

उन्होंने कहा, "अगर आपके साथ भी काले लोगों के साथ किया जा रहा व्यवहार दोहराया जाए, तो कृपया खड़े हो जाइये."

कुछ सेकंड के बाद इलियट कहती हैं, "कोई भी खड़ा नहीं हुआ."

उन्होंने कहा, "यह साफ़तौर पर दिखाता है कि आप जानते हैं कि क्या हो रहा है और आप इससे भी अवगत हैं कि आप इसे अपने साथ होने देना नहीं चाहते हैं, तो फिर यह आप दूसरों के साथ ऐसा क्यों होने दे रहे हैं?"

वो कहती हैं, "गोरे लोग जानते हैं कि यह कुछ ऐसा है कि वो उन्हें तब तक चिंतित नहीं करेगा जब तक कि यह उनके साथ नहीं हो जाता. वे खड़े नहीं होना चाहते या जब तक कि यह उनके साथ नहीं हो जाता."

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ये सिर्फ़ एक मेलेनिन है

इलियट कहती हैं कि उनका प्रयोग सिर्फ़ साधारण तरीक़े से यह दिखाने के लिए था कि कैसे बचपन में ही नस्लभेद जैसी चीज़ भर दी जाती हैं.

वो कहती हैं, "कोई भी गोरा शख़्स जो अमरीका में पैदा हुआ और पला बढ़ा है, अगर वो नस्लभेदी न हो तो ऐसा सिर्फ़ चमत्कार ही हो सकता है."

इलियट कहती हैं, "नस्लवाद एक सीखा गया बर्ताव है. कोई भी श्रेष्ठ भावना लेकर पैदा नहीं होता. श्रेष्ठता सिखाई जाती है और यह वही है जो हम इस देश में सीखते हैं."

उनके अनुसार, अमरीका की शिक्षा प्रणाली 'गोरे रंग के वर्चस्व के मिथक को हर कीमत पर बनाए रखने' के लिए डिज़ाइन की गई है.

लेकिन वहीं जब नस्लवाद जो बनाया जाता है उसे नष्ट भी किया जा सकता है.

इलियट कहती हैं, "लोगों को नस्लभेदी बनने से रोका जा सकता है."

वो कहती हैं, "लोगों की आंख और त्वचा का रंग सिर्फ़ मेलेनिन की वजह से है. इसका मतलब ये नहीं है कि आप उनकी त्वचा में मेलेनिन की मात्रा से उनको लेकर कोई राय बनाएं."

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