कोरोना वायरस: वो महामारी जिसने अमरीका को यूं महाशक्ति बना दिया

  • 30 जून 2020
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यह एक ऐसी महामारी थी जिसके प्रभाव ने सदियों तक दुनिया की भू-राजनीति को बदल दिया.

साल 1801 के अंत में नेपोलियन बोनापार्ट ने कैरिबियाई देश हैती में कब्ज़ा करने के लिए फ्रांस के इतिहास की सबसे बड़ी सेना भेजी लेकिन फ्रांस की नेवी और बड़ी तादाद में सैनिक एक मच्छर के आगे हार गए.

पीत ज्वर या येलो फीवर महामारी की चपेट में आकर हज़ारों फ्रांसीसी सैनिक मारे गए. कैरिबायई क्षेत्र में इतने लोगों के मरने का यह रिकॉर्ड करीब 300 सालों का है.

इस महामारी के चलते वेस्ट इंडीज़ को लेकर नेपोलियन की वह योजना बिखर गई जिसका केंद्रबिंदु हैती था.

इस विफलता से एक संपन्न लेकिन युवा देश के बनने के लिए परिस्थितियां बेहतर हुईं जिसका उदय आने वाली सदियों में दुनिया बदलने वाला होगा.

लेकिन सवाल यह उठता है कि नेपोलियन को हैती में दिलचस्पी कैसे आई?

चीनी और कॉफ़ी का साम्राज्य

फ्रांस ने हिस्पानिओला के पश्चिमी भाग में खुद को अनौपचारिक रूप से स्थापित करने के बाद, यहां डॉमिनिकन गणराज्य और हैती के कब्ज़े वाले क्षेत्र का एक तिहाई हिस्सा साल 1697 में स्पेन शासन को देने में कामयाब रहा. इसके लिए एक संधि भी की गई. सेंटो डॉमिन्गो जल्द ही फ्रांस की सबसे समृद्ध जगह बन गई. इसकी वजह यहां होने वाला कॉफ़ी और चीनी का उत्पादन था. जिसका निर्यात मुख्य रूप से यूरोप में होता था.

साल 1780 की शुरुआत में इस कॉलोनी से उत्पादन का सामान ले जाने के लिए 700 से अधिक जहाज आते थे. उस वक्‍त यह विदेशों में यह फ्रांस के दो तिहाई निवेश का हिस्सा था. हालांकि यह सारी संपत्ति मुख्य रूप से अफ्रीकी लोगों को गुलाम बनाकर जमा की गई थी.

उस दौरान कई दुष्चक्र थे. ज़मीन के मालिक कम पैसे में रखरखाव कर रहे थे. उस दौरान मृत्यु दर बहुत अधिक थी और लोग कम पैसे में ही गुज़ारा करने पर राजी हो जाते थे.

परिणाम यह हुआ कि बुरी परिस्थितियों में रहने की वजह से हैती में आधे ग़ुलाम पहले साल में ही मर गए.

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इस घटना के बाद विदेशों से ग़ुलामों के व्यापार का चलन भी बढ़ा. हर साल हज़ारों ग़ुलामों का व्यापार होने लगा.

उस समय भी नस्लभेद चरम पर था. गोरे और काले का भेद बहुत था. हालांकि इसमें भी काफ़ी तरह के मुद्दे थे.

फ्रांसीसी इतिहासकार पॉल फ्रेगोसी इस मुद्दे पर गहराई से नज़र डालते हैं.

वो कहते हैं, ''ग़रीब गोरा, अमीर गोरे को बर्दाश्त नहीं करता था. अमीर गोरा गरीब गोरे को नीचा दिखाता था. मध्यम वर्ग का जीवन जीने वाले गोरे जलन में रहते थे.''

''इनके बीच मुलटोस भी थे. मुलटोस वो लोग थे जिन्होंने काले लोगों को फिर से अस्तित्व में लाने का काम किया. उन्होंने काले लोगों को एक तरह से वापस लौटने का मौका दिया और गोरों का तिरस्कार किया.''

1791 में ग़ुलामों ने बग़ावत का बिगुल फूंका. इसी बग़ावत ने सिविर वॉर की शुरुआत कराई और जातियों के बीच लड़ाइयां होने लगीं.

साल 1794 में फ्रांस ने अपने सभी कैरिबियाई उपनिवेशों में ग़ुलामी को समाप्त कर दिया.

नेपोलियन ने साल 1801 की शुरुआत में सेना भेजना शुरू किया और 1802 की जनवरी के आखिर में शुरुआती फौज सेंटो डॉमिन्गो पहुंच चुकी थी. विशेषज्ञों के मुताबिक, सेंटो डॉमिन्गो में करीब 60 हज़ार से 85 हज़ार सैनिक मौजूद थे.

सेना के प्रमुख को मिशन के बारे में खुफिया निर्देश दिए गए थे.

अमरीकी इतिहासकास जेआर मैक्नील अपनी किताब, 'मॉस्कीटो एंपायर्स: इकॉलॉजी एंड वॉर इन द ग्रेटर कैरिबियन, 1620-1914' में लिखते हैं, ''नेपोलियन की योजना थी कि उनके सेना प्रमुख जनरल विक्टर इमैनुएल चार्ल्स लेक्लेर्क किसी भी तरह से सेंटो डॉमिन्गो पर फ्रांस का कब्ज़ा बरकरार करेंगे और अर्थव्यवस्था उनके हाथ होगी और इसी तरह टॉस्सैंट की वास्तविक आजादी का अंत होगा.''

उनकी योजना ये भी थी कि दासता की प्रथा को दोबारा शुरू किया जाए लेकिन ऐसा तभी किया जाए जब काले लोग निशस्त्र कर दिए जाएं और उनके नेताओं को फ्रांस भेज दिया जाए. ऐसे में पूरी गोपनीयता बरतना भी ज़रूरी था.

बोनापार्ट ने लेक्लेर्क को ये भी निर्देश दिया कि टॉस्सैंट के साथ शातिराना ढंग से पेश आए. उन्होंने कहा कि लेक्लेर्क पहले टॉस्सैंट के प्रति सम्मान दिखाए और जब टॉस्सैंट अपनी सुरक्षा में ढील दे दे तब उसे पकड़ लिया जाए.

फ़्रांस की अनुभवी सेना के मुक़ाबले में स्थानीय लड़ाके थे. ऐसे में लेक्लेर्क के लिए साल 1802 में मई महीने के अंत तक काफ़ी ज़्यादा जगह जीतना मुश्किल नहीं रहा. इसके बाद लेक्लेर्क ने हैती के इस नेता के साथ संधि की जिसके तहत टॉस्सैंट अपने इलाक़े में जाने के लिए राज़ी हो गया.

इसके एक महीने बाद टॉस्सैंट बेफ़िक्री के साथ लेक्लेर्क से मिलने के लिए पहुँचे जहां पर लेक्लेर्क ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया. इसके बाद टॉस्सैंट को फ़्रांस भेज दिया गया जहां पर एक साल बाद कालकोठरी में उनकी मौत हो गई.

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छोटा लेकिन ख़तरनाक शत्रु

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि टॉन्सैंट की गिरफ़्तारी जल्दबाज़ी में की गई हैं. क्योंकि औपनिवेशिक शक्तियों को ये पता चल गया कि टॉस्सैंट बस किसी तरह समय काटते हुए इस इंतज़ार में बैठा था कि फ़्रांस येलो फीवर से मात खाकर वापस चला जाए.

चिकित्सा के क्षेत्र का इतिहास लिखने वाले जॉन एस मार और जॉन टी कैथी कहते हैं, "टॉस्सैंट को चिकित्सा के क्षेत्र का ज्ञान था और ये भी समझ थी कि ये बुख़ार कब और कहां उसके दुश्मनों पर हमला बोलेगा. ऐसा लगता कि उन्हें ये पता था कि अगर बारिश के मौसम में गोरों को बंदरगाहों और निचले इलाक़ों में लेकर जाया जाए तो पूरे के पूरे दस्ते ख़त्म हो सकते हैं."

इस रणनीति की झलक टॉस्सैंट के लिखे उस पत्र में मिलती हैं जो उन्होंने जैक्सन डेसालाइंस को लिखा था. डेसालाइंस वो शख़्स थे जो टॉन्सैंट के उत्तराधिकारी थे और औपनिवेशिकता की ज़ंजीरें तोड़कर आज़ाद होने वाले हैती के पहले राष्ट्रपति बनते.

टॉस्सैंट अपने पत्र में डेसालाइंस को निर्देश देते हैं कि वह उस बंदरगाह को जला दें जहां पर फ़्रांसीसियों ने गैरिसन बनाकर रखा हुआ है.

वह लिखते हैं, "ये मत भूलना कि जब हम बरसात का इंतज़ार कर रह हैं जो कि हमें हमारे शत्रुओं से मुक्ति दिला देगी तब ऐसे समय में हमारे हथियार तोड़फोड़ और आग ही है."

टॉस्सैंट की गणनाएँ एकदम सटीक थीं. जब साल 1802 का बारिश का मौसम शुरू हुआ तो फ़्रांसीसी सेना एम्स एइग्यप्ति मच्छर की मार झेलने लगी.

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लेक्लेर्क ने अपने सामने खड़ी समस्याओं को उस पत्र में समझाया जो कि उन्होंने फ़्रांसीसी रक्षा मंत्री डेनिस डेस्क्रेस को लिखा था.

लेक्लेर्क लिखते हैं, "कोई भी यहाँ पर अपनी जान जोखिम में डाले बिना मेहनत से काम नहीं कर सकता है. मेरे लिए यहाँ छह महीने से ज़्यादा रुकना संभव नहीं है. मेरी सेहत बहुत ख़राब है और अगर मैं इतना भी जी पाया तो मैं ख़ुद क ख़ुशक़िस्मत मानूँगा. मौतें होना जारी हैं और लोग बेहद डरे हुए हैं. वो सेना जिसमें 26 हज़ार जवान थे उसमें अब बस 12 हज़ार जवान शेष हैं. इस समय मेरे 36 सौ सैनिक अस्पताल में हैं. हाल ही रातों में मैंने प्रतिदिन अपने तीस से पचास सैनिकों को खोया है. हर रोज़ अस्पताल में 200 से 500 सैनिक जाते हैं जिनमें से बमुश्किल 50 ज़िंदा बाहर निकलते हैं."

फ़्रांसीसी सेना जिस तरह के माहौल जैसे भीड़भाड़ वाले बंदरगाह और जहाज़ों में रह रही थी, वो मच्छरों के लिए मुफ़ीद हैं.

इसके साथ ही जो लोग विदेशों से आए थे उनके अंदर इस रोग से लड़ने की क्षमता नहीं थी जैसी कि इस द्वीप पर पहले से रह रहे लोगों में थी.

इस वजह से लेक्लेर्क की सैन्य टुकड़ियाँ येलो फीवर की वजह से छोटी होती गईं.

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Image caption लेक्लेर्क

मेक्नील के मुताबिक़, हैती भेजे गए फ़्रांसीसी सैनिकों में से 80 से 85 फ़ीसदी वापस नहीं आ सके. इनमें से ज़्यादातर बीमारी की वजह से और कुछ युद्ध के दौरान मारे गए.

जॉन एस. मार और जॉन टी. केथी के मुताबिक़, "सभी मानकों को मानते हुए इस मामले में मरने वालों की संख्या और मृत्यु दर को समझना मुश्किल है जब तक कि कोई उस आदर्श जलवायु और पारिस्थितिक कारकों को न समझे जो कि किसी महामारी को पनपने में मदद करते हैं."

इस महामारी के एक शिकार लेक्लेर्क स्वयं भी थी. साल 1802 के नवंबर महीने में लेक्लेर्क की मौत हो गई. इसके एक साल बाद फ़्रांसीसी सेनाएँ आख़िरकार इस द्वीप से वापस आ गईं और आधिकारिक तौर पर इस द्वीप पर क़ब्ज़ा करने का अभियान त्याग दिया."

इस हार के लिए कुछ रणनीतिक ग़लतियाँ ज़िम्मेदार रहीं. इनमें टॉस्सैंट को गिरफ़्तार किया जाना, नेपोलियन का ग्वाडलुपे द्वीप पर दास व्यवस्था को वापस शुरू करने का फ़ैसला, लेक्लेर्क के उत्तराधिकारी जनरल डोनेशियन रोचाम्बियु का बर्बर युद्ध अभियान शामिल हैं. इनकी वजह से फ़्रांस को काले और मुलाट्टुस समुदाय की ओर से भारी विरोध का सामना करना पड़ा.

लेकिन इनमें से कोई भी कारक फ़्रांसीसी सेना की हार के लिए उतना ज़िम्मेदार नहीं था जितना कि येलो फीवर था.

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एक महाशक्ति का उदय

नेपोलियन बोनापार्ट की ओर से सेंट डोमिनग्वे पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश के बाद दूसरी ताक़तों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिए. लेकिन सेंट डोमिनग्वे में बढ़ता रुझान एक नए और विकासशील देश के लिए चिंता का सबब बन रहा था. ये नया और विकासशील देश अमरीका था.

साल 1800 के अंत में स्पेन ने एक गुप्त समझौते के तहत फ़्रांस को लुइसियाना की एक कॉलोनी दे दी. इस कॉलोनी के तहत फ्रांस को अमरीका में जो ज़मीन मिली वो वर्तमान अमरीका के अरकान्सास, आइओवा, मिश्री, कान्सास, ओक्लाहामा, नेब्रास्का, मिनेसोटास के कुछ हिस्से, न्यू मैक्सिको, साउथ डकोटा, टेक्सास, व्योमिंग, मोन्टाना और कोलोराडो राज्य हैं.

इसके साथ साथ फ़्रांस को कनाडाई प्रांत अलबर्टा और सास्काचेवान भी मिल गया.

थॉमस जैफरसन सरकार इस बात को लेकर चिंतित नहीं थी कि नेपोलियन को अमरीका में एक बड़ी ज़मीन मिल गई है. इसकी जगह वे इस लुइसियाना कॉलोनी के स्थान को लेकर चिंतित थे. क्योंकि अमरीकी सरकार के पास मिसिसिपी नदी और यू ओरेलेंस बंदरगाह का नियंत्रण था. और इन जगहों से अमरीका का काफ़ी सारा सामान जाया करता था.

इसके अलावा एक चिंता ये और थी कि इस बड़े क्षेत्रफल का नया मालिक एक उभरती हुई ताक़त था.

साल 1802 में लुइसियाना समझौते की ख़बर मिलने के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ने लिखा, "ये (समझौता) अमरीका में सभी राजनीतिक संबंधों को बदल देता है. और इसके बाद राजनीतिक घटनाओं के एक नए युग की शुरुआत होगी.

इतिहासकार जॉन मीचम कहते हैं कि अमरीकी राष्ट्रपति ने अपनी जीवनी में लिखा - , "स्पेन उसे सालों तक अपने पास रख सकता है. इसकी फ़्रांस के हाथों में जाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी. फ़्रांस का स्वभाव, ऊर्जा और न थकने वाला चरित्र हमारे साथ उस स्थिति में रखता है जहां से हमेशा संघर्ष चलता रहेगा. ये बिलकुल असंभव है कि फ़्रांस और अमरीका ऐसी स्थिति में होने के बाद भी दोस्त बने रहें."

इस समस्या को जन्म लेने से पहले ही ख़त्म करने के विचार से जैफरसन ने जेम्स मुकरो को अपना विशेष दूत बनाकर पेरिस भेजा ताकि वे नेपोलियन से न्यू ओरेलेंस को ख़रीदने के लिए बात कर सकें.

मुनरो ने जैफरसन का दिया काम तो कर दिया. लेकिन इसके साथ ही जैफरसन को एक ख़ास चीज़ भी मिली.

दरअसल, हुआ कुछ यूँ कि मुनरो जब सिर्फ़ न्यू ओरेलेंस की बात करने गए थे तो नेपोलियन ने न्यू ओरेलेंस देने पर तो हामी भर ही दी लेकिन उन्होंने पूरी लुइसियाना कॉलोनी ही अमरीका को देने का प्रस्ताव रख दिया है.

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Image caption अमरीकी राष्ट्रपति थॉमस जैफरसन

लेकिन नेपोलियन ने ये क़दम क्यों उठाया?

इतिहासकार मीचम बताते हैं, "फ़्रांस के लिए, यूरोप से इतनी दूरस्थ जगहों को नियंत्रित करना काफ़ी महँगा और समस्याओं से भरा होने लगा था. सेंट डोमिग्वा में दास सेनाओं से हार नेपोलियन को ज़्यादा परेशान करने वाली थी. ऐसे में नेपोलियन ने अपने सभी संसाधन फ़्रांस के नज़दीकी क्षेत्रों में चलाए जाने वाले अभियानों पर खर्च करना उचित समझा."

कुछ इस तरह साल 1803 के अप्रैल महीने की तीस तारीख़ को अमरीका और फ़्रांस के बीच समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए.

और अमरीका ने मात्र 15 मिलियन अमरीकी डॉलर (वर्तमान में मात्र 340 मिलियन अमरीकी डॉलर) में फ़्रांस को अपने क्षेत्र से बाहर निकालकर अपनी सीमाओं में दोगुनी बढ़ोतरी कर ली.

बॉब कॉर्बेट जैसे इतिहासकार सेंट डोमिन्ग्वा को नई दुनिया विकसित करने के फ़्रांसीसी विचार के केंद्र में मानते हैं.

इस विचार में लुइसियाना हैती के दासों के लिए खाना पैदा करने का काम करता.

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Image caption जेम्स मुनरो

इतिहासकार हेनरी एडम्स पूछते हैं, "लेकिन द्वीपों के बिना, इस नए तंत्र के हाथ, पैर और सिर तो थे लेकिन शरीर नहीं था. ऐसे में लुइसियना की फ़्रांस के लिए क्या उपयोगिता थी जब फ़्रांस उसी उपनिवेश से हाथ धो बैठा था जिसके लिए लुइसियाना को खाद्य आपूर्ति करनी थी."

अन्य शोधार्थी कुछ सबूतों के आधार पर मानते हैं कि नेपोलियन बोनापार्ट लुइसियाना पर नियंत्रण करना चाहता था और उसके बाद अमरीका को जीतना चाहता था. या कम से कम ख़ुद को उस क्षेत्र में एक बड़ी शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता था. ऐसे में ये क्षेत्र अमरीका, फ़्रांस और स्पेन के बीच बंटा हुआ क्षेत्र होता. अगर नेपोलियन की योजना से जुड़ी इनमें से एक भी बात सही है तो सेंट डोमिंग्वा की हार ने नेपोलियन की महत्वाकांक्षाओं को ख़त्म कर दिया.

लुइसियाना को ख़रीदकर पश्चिमी ओर सीमाओं को बढ़ाने का रास्ता खुल गया. इसमें अमरीका और मेक्सिको के बीच जंग भी शामिल है जिसमें अमरीका ने टेक्सस और कैलिफ़ोर्निया समेत रियो ग्रान्डे के उत्तर के भाग पर क़ब्ज़ा कर लिया.

अपने क्षेत्र में विस्तार करके अमरीका दुनिया में क्षेत्रफल के लिहाज़ से चौथा सबसे बड़ा देश बन गया. इसके साथ ही इसके सीमावर्ती देशों की संख्या कम हो गई. और प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर अमरीका की ढाल बन गए. इस वजह से ही अमरीका एक लंबे समय तक आक्रमणों से बचा रहा.

इन सभी कारकों की वजह से अमरीका अपने आधारभूत ढाँचे और अर्थव्यवस्था को दुश्मनों से बचाने में कामयाब रहा.

और ये सब इसलिए हो पाया क्योंकि येलो फीवर महामारी ने हैती में फ़्रांसीसी फ़ौज की हार में एक बड़ी भूमिका निभाई थी.

ऐसे में ये साफ़ है कि शोधार्थी एर्विन एकेरनेक्ट इसे इतिहास की संभवत: सबसे अहम महामारी बताते हैं.

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