अमरीका और चीन के रिश्ते सबसे निचले स्तर पर कैसे आ गए हैं

2019 में ओसाका में हुए जी20 देशों के सम्मेलन में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग
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2019 में ओसाका में हुए जी20 देशों के सम्मेलन में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग

अमरीका ने चीन के साथ अपने तनाव को इस हफ़्ते बेतहाशा बढ़ाया है. जासूसी का आरोप लगाते हुए अमरीका ने ह्यूस्टन स्थित चीनी वाणिज्य दूतावास को बंद करने का आदेश दिया.

इस ताज़ा घटनाक्रम ने पहले से खींचतान में उलझे हुए दोनों देशों के रिश्तों को दशकों के सबसे निचले स्तर पर ला खड़ा किया है.

वॉशिंगटन में मौजूद बीबीसी संवाददाता बारबरा प्लेट उशर ने समझने की कोशिश की कि अमरीका-चीन के हालिया टकराव की वजहें क्या रहीं और अब ये घटनाक्रम दोनों को कहां लेकर जाएंगे.

ये गहराता तनाव क्यों अहम है?

ऐसा नहीं है कि अमरीका ने पहली बार किसी विदेशी मिशन को बंद किया है. लेकिन ये एक बहुत ही असाधारण और नाटकीय कदम है, जिसे वापस लेना अब मुश्किल है.

सबसे पहली बात तो ये कि ये एक कांसुलेट है, ना कि एम्बेसी. इसलिए इस पर कोई नीति बनाने की ज़िम्मेदारी नहीं होती. लेकिन व्यापार करने और किसी तरह की पहुंच के लिए इसकी अहम भूमिका होती है.

अमरीका के इस कदम का चीन ने भी जल्द ही जवाब दे दिया. उसने पश्चिमी चीनी शहर चेंगडू में अमरीका को अपना कांसुलेट बंद करने का आदेश दिया. ये उस राजनयिक बुनियादी ढांचे पर एक और चोट थी जिसके ज़रिए दोनों देश एक दूसरे से बातचीत करते हैं.

पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के बिगड़ते रिश्तों का शायद ये सबसे बुरा दौर है. जिसमें वीज़ा प्रतिबंध, डिप्लोमेटिक ट्रेवल के नए नियम, और विदेशी संवाददाताओं को देश से बाहर जाने को कहना शामिल है. दोनों पक्षों ने हर बार एक-दूसरे पर जवाबी कार्रवाई की, लेकिन मौजूदा टकराव के पीछे अमरीका ज़्यादा बड़ी वजह है.

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क्या भारत बनाम चीन 21वीं सदी का सबसे बड़ा टकराव है?

दोनों यहां तक कैसे आ गए?

अमरीकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने ह्यूस्टन कांसुलेट को जासूसी के सबसे गंभीर ऑफेंडर्स में से एक बताया है और कहा कि सभी चीनी राजनयिक इमारतों में यही देखने को मिल रहा है.

आमतौर पर विदेशी मिशनों में थोड़ी-बहुत जासूसी अपेक्षित होती है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि टेक्सस की गतिविधियां अनापेक्षित हद से आगे बढ़ चुकी थीं और वो चीन को कड़ा संदेश देना चाहते थे कि इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

चीन के ख़िलाफ़ "ज़्यादा निर्णायक कार्रवाई" और उसके ऑपरेशन को रोकने जैसे कदम इस महीने की शुरुआत में दिए एफ़बीआई निदेशक के भाषण से मेल खाते हैं. जिसमें उन्होंने कहा था कि पिछले एक दशक में अमरीकी हितों पर मंडरा रहे चीनी ख़तरे में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी हुई है. उन्होंने ये भी बताया था कि उन्होंने हर दस घंटे में चीन-संबंधी काउंटर-इंटेलिजेंस यानी चीन से जासूसी के ख़तरे को लेकर नई जांच शुरू की है.

चीन लगातार अमरीका के इस तरह के आरोपों को खारिज करता रहा है और ह्यूस्टन के मामले को उसने "दुर्भावनापूर्ण बदनामी" बताया.

आलोचक ट्रंप प्रशासन के इस कदम की टाइमिंग को शक़ की नज़र से देखते हैं. बराक ओबामा के कार्यकाल में विदेश मंत्रालय में एशिया मामलों से जुड़े विभाग के शीर्ष अधिकारी रह चुके डैनी रुसेल कहते हैं कि ये घटनाक्रम ध्यान भटकाने की कोशिश लग रहा है.

वो कहते हैं कि नवंबर के चुनाव से पहले ये राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक गड़बड़ियों से ध्यान हटाने का प्रयास हो सकता है.

तो क्या ये चुनाव की वजह से किया जा रहा है?

इस सवाल का जवाब हां भी है और नहीं भी.

"हां" क्योंकि हाल में ही ट्रंप ने अपने कैंपेन में पूरी तरह से चीन-विरोधी रुख अपनाया है. उनके रणनीतिकारों को लगता है कि इससे मतदाताओं का ध्यान आकर्षित होगा. अब फिर से 2016 की तरह वो राष्ट्रवादी बातें की जा रही हैं कि अमरीका के साथ धोखा करने वाले चीन के साथ सख़्ती की जानी चाहिए.

लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा आरोप ये जुड़ गया है कि चीन ने कोरोना वायरस को ग़लत तरह से हैंडल किया. वो संदेश देना चाहते हैं कि देश में कोविड-19 की बिगड़ती स्थिति का कारण चीन है, ना कि वो.

"नहीं" क्योंकि पोम्पियो जैसे उनके प्रशासन के अंदर के ही नेता काफ़ी वक़्त से चीन के ख़िलाफ़ कड़े कदम उठाने और इस तरह का रुख़ अख़्तियार करने की मांग कर रहे थे. लेकिन पहले डोनल्ड ट्रंप इस दुविधा में थे कि वो ये सलाह माने या अपनी इच्छा के मुताबिक़ ट्रेड डील करें और चीनी नेता शी जिनपिंग के साथ "दोस्ती भरा" रिश्ता बनाएं.

अब चीनी कांसुलेट बंद होना बताता है कि चीन का विरोध करने वाले इस मामले में भारी पड़े हैं. इसमें अमरीका में पनपे उस गुस्से ने भी आग में घी डालने का काम किया है, जो उन लोगों का है जो मानते हैं कि चीनी सरकार की वायरस को लेकर पारदर्शिता में कमी की वजह से ये वैश्विक आपदा खड़ी हुई है.

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कोरोना वायरस सबसे पहले चीन के वुहान में पाया गया था. वहीं से ये दुनिया के और देशों में फेलना शुरू हुआ.

ये अमरीका-चीन रिश्तों के बारे में क्या कहता है?

अमरीका और चीन के रिश्ते इस वक़्त बहुत ख़राब हो चुके हैं. 1972 में अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से सामान्य रिश्ते बनाने की ओर कदम बढ़ाया था, तब से लेकर अब दोनों देशों के रिश्ते सबसे ख़राब दौर में पहुंच चुके हैं.

रिश्ते ख़राब होने की शुरुआत 2013 में तब से हुई जब राष्ट्रपति शी जिनपिंग सत्ता में आए. शी जिनपिंग अपने पहले के राष्ट्रपतियों के मुक़ाबले ज़्यादा मुखर और दबंग माने जाते हैं.

चीन ने हाल में तनाव को और हवा तब दी जब वो हॉन्ग-कॉन्ग के लिए कठोर सुरक्षा क़ानून लाया और चीन में अल्पसंख्यक वीगर मुस्लिमों के कथित दमन की रिपोर्ट्स आने लगीं. लेकिन ट्रंप प्रशासन के साथ चीन का टकराव एक वैचारिक वैश्विक नज़रिए के चलते बहुत ज़्यादा बढ़ गया. इसी से प्रभावित होकर पोम्पियो ने इस हफ़्ते चीन को लेकर एक भाषण भी दिया.

शीत युद्ध की याद ताज़ा करते हुए उन्होंने चीनी नेताओं पर आरोप लगाया कि वो अपना वैश्वक वर्चस्व कायम करने के लिए तानाशाही कर रहे हैं. साथ ही उन्होंने अमरीका और चीन के मुक़ाबले को आज़ादी और उत्पीड़न का संघर्ष बताया.

चीनी सरकार में कई लोगों का मानना है कि प्रशासन, चीन को रोकना चाहता है ताकि वो अमरीका से आर्थिक रूप से आगे ना निकल जाए. चीनी सरकार में कई लोग ख़ास तौर पर इस बात को लेकर नाराज़ हैं कि अमरीका ने चीनी टेलिकम्युनिकेशन टेक्नोलॉजी को लेना बंद कर दिया है. लेकिन बढ़ते दंडात्मक कदमों को लेकर चिंता और भ्रम भी है.

चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने हाल में अमरीका से अपील की थी कि वो अपने कदम वापस ले और उन क्षेत्रों पर बात करें जहां दोनों देश मिलकर काम कर सकते हैं.

आगे क्या होगा?

शॉर्ट टर्म में देखें तो चुनाव तक तनाव की ये अनिश्चित स्थिति बनी रह सकती है. ऐसा लगता है कि चीन नहीं चाहता कि तनाव बढ़े. और विश्लेषक मानते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप कोई गंभीर टकराव यानी किसी तरह का सैन्य टकराव नहीं चाहते.

लेकिन फिलहाल एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टिट्यूट में उपाध्यक्ष रसेल चेतावनी देते हैं कि एक गैर इरादतन संघर्ष की स्थिति बन सकती है.

वो कहते हैं, "अमरीका और चीन के रिश्तों को बचाए रखने वाले जो एक ऐतिहासिक बफ़र था, एक पूर्वधारणा थी कि तनाव कम करना चाहिए और मुद्दों को सुलझाना चाहिए, लेकिन अब वो ख़त्म हो गई है."

"और लॉन्ग टर्म में सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि नवंबर में कौन जीतता है. लेकिन भले ही डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडन सहयोग के अवसरों को पुनर्जीवित करने के इच्छुक हों, लेकिन वो भी चीन के साथ सख़्त होने के संदेश के साथ ही प्रचार कर रहे हैं."

"ऐसी स्थिति में व्हाइट हाऊस में कोई भी पहुंचे, लेकिन इस तरह के विरोधी के साथ सहयोग की संभावना कम ही देखी जाती है."

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हॉन्ग-कॉन्ग में मौजूद अमरीकी दूतावास के बाहर चीन के समर्थन में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं.

द हेरिटेज फाउंडेशन के कंज़रवेटिव थिंक टैंक में एक राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ जिम काराफानो मानते हैं कि चीन के "अस्थिरता" के रवैये को चुनौती देकर स्थिरता ही आएगी, ना कि तनाव बढ़ेगा.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "पहले कभी हमने ये साफ़ तौर पर नहीं कहा कि चीन हमारे हितों का उल्लंघन कहां कर रहा है और इसलिए वो बढ़ते गए."

लेकिन रिपब्लिकल पर्टी के एक नेता विलियम कोहेन, जो डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल में डिफेंस सेकेट्री रह चुके हैं, मानते हैं कि ये ख़तरनाक है कि चीन को पॉलिटिकल स्पेक्ट्रम से परे एक विरोधी के तौर देखा जा रहा है.

वो कहते हैं कि चीन जिस तरह से अपनी सैन्य, आर्थिक और तकनीकी ताक़त को बढ़ा रहा है, उसी वजह से अमरीका कह रहा है कि "हम वैसे कारोबार नहीं कर सकते जैसे हम किया करते थे. लेकिन हमें अब भी कारोबार तो करना ही पड़ेगा."

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