चीन के वीगर मुसलमानों पर दुनिया की 'चुप्पी' क्यों- दुनिया जहान

  • संदीप सोनी
  • बीबीसी संवाददाता

कभी उनकी 'लंबी दाढ़ी पर पाबंदी' लगाई जाती है, तो कभी उन्हें 'क़ुरान ना रखने का आदेश' दिया जाता है.

कभी उनका 'ब्रेनवॉश करने की कोशिश' की जाती है तो कभी उनकी 'औरतों की ज़बरन नसबंदी' की जाती है.

वीगर मुसलमानों को लेकर चीन पर जब-जब इस तरह के आरोप लगे, चीन ने हमेशा उन्हें बेबुनियाद बताया.

इसी कड़ी में, एक रेलवे स्टेशन का ड्रोन से लिया गया वीडियो फुटेज भी चर्चा में रहा.

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बीबीसी ने ये फुटेज ब्रिटेन में चीन के राजदूत ल्यू शाओमिंग को दिखाकर कुछ सवाल पूछे. जबाव में उन्होंने इससे अनभिज्ञता जताते हुए आरोपों को ख़ारिज किया.

चीन भले ही इनकार करे, लेकिन प्रमाणों के साथ ऐसी कई रिपोर्ट मौजूद हैं, जो वीगर मुसलमानों पर ज़्यादती की कहानियाँ बयां करती हैं.

फिर भी वीगर मुसलमानों की दशा पर दुनिया का उतना ध्यान नहीं जाता. यहाँ तक कि वो देश जो मुसलमानों के झंडाबरदार बनते हैं, वो भी कभी वीगर मुसलमानों के लिए आवाज़ बुलंद करते नज़र नहीं आते. आख़िर इसकी वजह क्या है?

जिसकी लाठी उसकी भैंस

''चीन अपनी ज़मीन पर, किसी तरह का विरोध ज़रा भी बर्दाश्त नहीं करता. ऐसा हम कई बार देख चुके हैं."

ये दावा है अज़ीम इब्राहिम का, जो वॉशिंगटन के सेंटर फॉर ग्लोबल पॉलिसी में 'डिसप्लेसमेंट एंड माइग्रेशन प्रोग्राम' के डायरेक्टर हैं.

अज़ीम इब्राहिम कहते हैं, "पाकिस्तान समेत कई देश चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' में शामिल हैं. चीन ये सुनिश्चित करता है कि प्रोजेक्ट में शामिल होने वाले देश, उसके किसी मामले में दख़ल नहीं देंगे."

चीन 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' प्रोजेक्ट के ज़रिए सड़कों और बंदरगाहों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर रहा है, जो अफ़्रीका, यूरोप और एशिया को जोड़कर उनके बीच की दूरियों को ख़त्म कर देगा.

चीन ने सात साल पहले ये प्रोजेक्ट शुरू किया था, जिसे मूर्त रूप देने के लिए उसने अरबों डॉलर पानी की तरह बहाए हैं.

शिनजियांग की सीमा से लगने वाला पाकिस्तान शुरू से इस प्रोजेक्ट का हिस्सा रहा है.

अज़ीम इब्राहिम कहते हैं, "चीन ने पाकिस्तान को अरबों डॉलर का लोन दिया है. चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर की वजह से चीन, पाकिस्तान में कहीं भी आ-जा सकता है. ऐसे में पाकिस्तान, वीगर मुसलमानों के समर्थन में चीन के ख़िलाफ़ भला कैसे कुछ कह सकता है."

चीन वैसे भी पाकिस्तान का 'सदाबहार दोस्त' है.

इंडोनेशिया, दुनिया में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश है. लेकिन वीगर मुसलमानों के मामले में उसका हमेशा यही कहना रहा है कि वो इस बारे में "चीन से सीधे बात" करता है.

सऊदी अरब, ख़ुद को सुन्नी मुस्लिम जगत के नेता के तौर पर पेश करता है.

लेकिन चीन के सरकारी टेलीविज़न को दिए एक इंटरव्यू में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने कहा था, "चीन का ये हक़ बनता है कि वो चरमपंथ के ख़िलाफ़ ज़रूरी क़दम उठाए और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अतिवादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करे."

अज़ीम इब्राहिम का मानना है कि बाक़ी मुस्लिम देशों की तरह सऊदी अरब की भी कुछ "मजबूरियाँ" हैं और कुछ वजहें "कूटनीतिक" हैं.

बात जब तुर्की की होती है, तो ये माना जाता है कि वीगर मुसलमान सांस्कृतिक रूप से ख़ुद को चीन के बजाए तुर्की के ज़्यादा नज़दीक पाते हैं.

पाँच साल पहले तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने कहा भी था कि उनके देश में वीगर मुसलमानों का स्वागत है. लेकिन बाद में तुर्की के स्वर बदल गए.

अज़ीम इब्राहिम बताते हैं, "विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा कि वीगर जिस तरह का बर्ताव कर रहे हैं, वो मंज़ूर नहीं है. दूसरे बयान में कहा गया कि हमने जो पहले कहा था, उस रुख़ में कोई बदलाव नहीं आया है."

तुर्की भी चीन के 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' प्रोजेक्ट में शामिल है.

तो क्या वीगर मुसलमानों का मुद्दा चीन के साथ उठाने वाला मुस्लिम बहुल कोई देश नहीं है?

अज़ीम इब्राहिम इसका अपवाद बताते हुए कहते हैं, "मुझे लगता है कि मलेशिया इस मामले में दुनिया का एकमात्र देश है. मलेशिया अपने आसपास के देशों के मुक़ाबले कहीं अधिक विकसित है. महातिर मोहम्मद सबसे बड़े आलोचकों में से एक रहे हैं. मेरे ख़्याल में उन्हें ये बात समझ आ गई थी कि चीन के ख़िलाफ़ भी खड़ा हुआ जा सकता है."

दोस्त और सहयोगी

चीन की रणनीति का दूसरा पक्ष राजनीतिक और कूटनीतिक है. भरपूर अंतरराष्ट्रीय समर्थन सुनिश्चित करने के लिए चीन ने कई वर्षों तक जमकर मेहनत की है.

वॉशिंगटन के नेशनल ब्यूरो ऑफ एशियन रिसर्च में सीनियर फैलो नडेज रोलांड शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन को इसका बेहतरीन उदाहरण बताती हैं.

वो कहती हैं, "शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन साल 2001 में बनाया गया था. इसका मुख्य उद्देश्य अलगाववाद, अतिवाद और आतंकवाद से लड़ना है. इस संगठन का बुनियादी सिद्धांत ये है कि कोर-मेम्बर्स रूस, चीन, कज़ाख़स्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़बेकिस्तान आपस में सुरक्षा-संबंधी सहयोग करते हुए एक दूसरे के आंतरिक मामलों में दख़ल नहीं देंगे."

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

इसका मतलब ये हुआ कि शिनजियांग से जिन देशों की सीमा लगती है, वो वीगर मुसलमानों के मामले में चीन से कुछ नहीं कहेंगे.

शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन के लिए ख़तरों की कोई तय परिभाषा नहीं है. इसलिए वीगर मुसलमानों को ख़तरा बताने में चीन को परेशानी नहीं हुई.

नडेज रोलांड के मुताबिक़, "सरकार जिसे आतंकवादी कहे, उस पर आतंकवादी का ठप्पा लग जाता है. सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों के ख़िलाफ़ ये तरीक़ा इन देशों के लिए गोंद का काम करता है. ये एक तरह की इंश्योरेंस पॉलिसी है. अंतरराष्ट्रीय दबाव और प्रतिबंधों से निपटने के लिए चीन को इन देशों की ज़रूरत होती है. इसी तरह जब बाक़ी देशों को अपने यहाँ बाग़ियों से निपटना होता है, जिन्हें वो आतंकवादी गुट कहते हैं, तब चीन उनकी मदद करता है."

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संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, न्यूयॉर्क

चीन का यही नेटवर्क पिछले साल तब कारगर नज़र आया, जब वीगर मुसलमानों से सहानुभूति रखने वाले देशों ने संयुक्त राष्ट्र को एक पत्र लिखा.

नडेज रोलांड बताती हैं, "अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन और जर्मनी की अगुआई में 22 देशों के एक समूह ने पत्र लिखकर शिनजियांग में मानवाधिकारों के उल्लंघन का मुद्दा उठाते हुए चीन की आलोचना की. जबाव में जो पत्र लिखा गया, उस पर 50 देशों के दस्तख़त थे जिनमें सूडान, ताजिकिस्तान, जिबूती, यमन, कुवैत, म्यांमार जैसे देश शामिल थे."

इस प्रकार "चीन को घेरने की की कोशिश" नाकाम रही.

नज़र से दूर, दिमाग़ से परे

"चीन की सरकार ने ग़ज़ब का इंतज़ाम किया है, वीगर मुसलमानों की तस्वीरें चीन से बाहर निकलना लगभग नामुमकिन है."

ऐसा मानना है रायन थम का, जो नॉटिंघम यूनिवर्सिटी में सीनियर रिसर्च फ़ेलो हैं. रायन थम लगभग दो दशक से वीगर मुसलमानों पर अध्ययन कर रहे हैं.

उनका मानना है कि वीगर मुसलमानों की ज़्यादा से ज़्यादा तस्वीरें चीन से बाहर आना बेहद ज़रूरी है.

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वीगर महिला

वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि वीगर मुसलमानों के साथ जो सलूक हो रहा है, उसके बारे में दुनिया को बताने के लिए तस्वीरों की कमी बहुत बड़ी बाधा है. वीगर मुसलमानों का जैसे कोई अस्तित्व ही नहीं है. वो जब नज़र आएँगे, तभी तो कोई उनके बारे में सोचेगा."

रायन थम का मानना है कि चीन दुनिया को दिखाने के लिए, एक दूसरा तरीक़ा अपनाता है. इससे उसे अपने ख़िलाफ़ लगे आरोपों को ग़लत साबित करने में मदद मिलती है.

रायन थम के मुताबिक़, "चीन बड़े ही चुनिंदा तरीक़े से बहुत छोटे देशों से अधिकारियों और पत्रकारों को अपने यहाँ बुलाता है, ये दिखाने के लिए कि करीने से बने कैंप्स में वीगर मुसलमान किस तरह रहते हैं. जहाँ दूर-दूर तक कोई गार्ड नज़र नहीं आता. ऐसा करके चीन उन्हीं अधिकारियों के मुँह से ये बात कहलवा सकता है कि वीगर मुसलमानों की दुर्दशा की जो कहानियाँ हैं, वो दरअसल अमरीकी प्रोपेगैंडा है."

ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा एजेंसियों द्वारा प्रमाणित रेलवे स्टेशन जैसे दुर्लभ ड्रोन फुटेज़ वीगर मुसलमानों की जो तस्वीर बयां करते हैं, उनके विपरीत चीन जो तस्वीर दिखाता है, उनमें सब सामान्य नज़र आता है.

रायन थम कहते हैं, "चीन दुनिया को एकदम अलग तस्वीरें दिखाता है. चीन दिखाता है कि एक क्लासरूम है, जिसमें युवा वीगर लड़के-लड़कियाँ मुस्कुरा रहे हैं, खिड़कियाँ खुली हैं जिनमें सलाखों जैसा कुछ नहीं है."

वोकेशनल ट्रेनिंग या प्रिज़न कैम्प्स

"जिस स्कूल से मैंने अपनी कक्षा छह की पढ़ाई शुरू की थी, उसे अब प्रिज़न कैंप यानी बंदीगृह बना दिया गया है. दो साल पहले जब मुझे ये पता चला, मैं रो पड़ी."

ये हैं रहीमा महमूद, जो वर्ल्ड वीगर कांग्रेस की यूके प्रोजेक्ट डायरेक्टर हैं. रहीमा महमूद चीन के शिनजियांग में पली-बढ़ी हैं.

चीन सरकार के आँकड़े बताते हैं कि शिनजियांग में वीगर मुसलमानों की आबादी एक करोड़ 20 लाख है. लेकिन रहीमा महमूद का दावा है कि वीगर मुसलमानों की आबादी लगभग दो करोड़ होगी.

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि थोड़े समय के लिए आज़ाद रहा शिनजियांग, साल 1949 में 'कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना' के गठन के बाद चीन का हिस्सा बना लिया गया. तब तक शिनजियांग में वीगर बहुसंख्यक थे.

फिर 1960 के दशक में, कल्चरल रेवोल्यूशन की शक्ल में चली राजनीतिक मुहिम के दौरान, सरकार समर्थित छात्रों के गिरोह- 'रेड गार्ड्स' ने इबादतगाहों को तहस-नहस किया.

साल 1976 में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता माओत्से तुंग की मौत के बाद एक तरह की ख़ामोशी रही.

यही वो समय था, जब सरकार की शह पर चीन के बाक़ी हिस्सों से लाखों लोगों ने शिनजियांग को अपना घर बनाया. इससे वीगर मुसलमानों अहसास हुआ कि वो अल्पसंख्यक बनने जा रहे हैं.

रहीमा महमूद के मुताबिक, "साल 1980 से 1989 तक हमने काफ़ी हद तक आज़ाद हवा में साँस ली. मस्जिदें खुलती थीं, बुजुर्ग अपने हिसाब से अपनी ज़िंदगी जी रहे थे. हम कभी-कभी विरोध भी कर सकते थे."

लेकिन सोवियत यूनियन के पतन से उत्साहित होकर शिनजियांग में जब अलगाववादी समूह बढ़ने लगे, तब दमन का दौर दोबारा शुरू हो गया.

रहीमा महमूद बताती हैं, "पुलिस घरों पर छापे मारती और धार्मिक नेताओं के साथ युवाओं को चुन-चुनकर गिरफ़्तार करती."

फिर जब साल 2009 में राजधानी उरूम्ची में दंगे हुए, चीन की सरकार के मुताबिक़, 200 लोग मारे गए, जिनमें से ज़्यादातर हान समुदाय थे. हान, चीन में बहुसंख्यक जातीय समूह है.

उरूम्ची के दंगों के लिए वीगर मुसलमानों को ज़िम्मेदार माना गया.

इसके बाद बड़ी संख्या में लोगों को बंदी बनाने के लिए कंटीले तारों के घेरे में कंक्रीट के ढाँचे बनने लगे या रहीमा महमूद के स्कूल जैसी जगहों को बंदी-गृहों में बदल दिया गया.

रहीमा महमूद का दावा है, "इनका उद्देश्य वीगर और तुर्की मूल के अन्य जातीय समूहों का दमन करना है. वो धर्म को वायरस कहते हैं, इसलिए बंदी बनाकर पीटा जाता है, भूखा रखा जाता है, छोटे से कमरे में बहुत सारे बंदियों को भर दिया जाता है, जहाँ सारे लोग एक साथ सो भी नहीं सकते."

दो साल पहले संयुक्त राष्ट्र ने उस रिपोर्ट को "विश्वसनीय" बताया था, जिसमें कहा गया था कि दस लाख लोगों को बंदी बनाकर रखा गया है.

बंदीगृहों में क्या-क्या होता है, रहीमा मेहमूद उसका एक उदाहरण बताती हैं, "उन्हें पार्टी का प्रोपेगैंडा सीखने के लिए विवश किया जाता है. जिसे हम चाइनीज़ रेड सांग कहते हैं, गाने के लिए मजबूर किया जाता है. वीगर बुजुर्गों के लिए ये सब सीखना बहुत मुश्किल होता है, वो चाइनीज़ रेड सांग नहीं गा पाते, इसके लिए भी उन्हें सज़ा मिलती है. वो पूछते हैं- क्या कोई ईश्वर है, अगर आप हाँ कहते हैं तो वो आपको पीटते हैं. ईश्वर को मानना ग़लत है."

चीन की सरकार इस तरह के कैंप होने से पहले तो इनकार करता रही. फिर उसने माना कि कैंप तो हैं, लेकिन वो इन्हें "रि-एजुकेशन" सेंटर्स कहती है, जहाँ चरमपंथ और मजहबी कट्टरता को ख़त्म करने के लिए 'वोकेशनल ट्रेनिंग' दी जाती है.

रहीमा मेहमूद के मुताबिक़, "कुछ लोगों को 20 तक बंदी बनाकर रखा जाता है. चीन की सरकार के शब्दों में कहें तो जब वो ग्रेजुएट हो जाते हैं, तो उन्हें चीन के कारखानों में ज़बरन श्रम कराने के लिए भेज दिया जाता है."

ऑस्ट्रेलियन स्ट्रेटैजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, दुनिया के कुछ सबसे बड़े ब्रांड्स के कारखानों में लगभग 80 हज़ार वीगर कामगार हैं.

रहीमा मेहमूद का दावा है कि कैंप से बाहर, शिनजियांग के अंदर भी वीगर मुसलमानों की ज़िंदगी कड़े पहरे में है.

वो कहती हैं, "चेहरों को ख़ासतौर पर पहचानने वाले कैमरे लगे हुए हैं, हर 200 मीटर पर एक चेक-प्वाइंट हैं. घर के भीतर भी आप पर नज़र रखी जाती है. सरकारी अधिकारियों को हाउस गेस्ट बनाकर भेजा जाता है, जो घर में रहकर नज़र रखते हैं."

रहीमा मेहमूद ब्रिटेन आने के बाद लौटकर कभी चीन नहीं गईं, जहाँ आज भी उनके भाई-बहन रहते हैं. रहीमा ने तय किया कि वो ब्रिटेन में रहकर ही वीगर मुसलमानों की हालत दुनिया को बताने की कोशिश जारी रखेंगी.

चीन में वीगर और अन्य अल्पसंख्यक जातीय समूहों के हक़ में आवाज़ उठाने का मतलब है, चीन की सरकार का विरोध करना.

चीन के निवेश पर निर्भर देश इस तरह का जोख़िम मोल नहीं ले सकते, लेकिन जिन्हें कुछ खोने का डर नहीं है, उनकी आवाज़ भी बुलंद होनी चाहिए.

रहीमा मेहमूद को हैरानी है तो बस एक बात की, जिसे वो इन शब्दों में बयां करती हैं, "पहले हम ये सोचते थे कि दुनिया को कुछ पता ही नहीं है. लेकिन वीगर लोगों के लिए ये समझना बहुत मुश्किल है कि उनकी हालत पर दुनिया को ग़ुस्सा आख़िर क्यों नहीं आता."

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