ब्राज़ील में कोरोना से एक लाख से ज़्यादा लोग मरे, कुछ वैसी ही ग़लतियां भारत तो नहीं कर रहा?

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एक लाख तक की गिनती करने में कितना वक़्त लगता है? अगर इस महामारी की बात करें तो ब्राज़ील में पहली मौत से एक लाख मौतों तक पहुंचने में 164 दिन लगे.

शुरुआत में मौतों की रफ़्तार इतनी तेज़ नहीं थी. देश में 12 मार्च को पहली मौत दर्ज की गई थी और उसके बाद 9 मई तक कोरोना संक्रमण से दस हज़ार मौतें हो चुकी थीं.

इसके बाद महामारी का ग्राफ़ बढ़ता ही चला गया. इसके एक महीना बाद देश में कोरोना संक्रमण से मरने वालों की तादाद पचास हज़ार पार कर गई थी.

अब शनिवार तक ब्राज़ील में 100477 लोगों की मौत संक्रमण से हो चुकी है. भारत में भी कोरोना वायरस का संक्रमण तेज़ी से बढ़ता जा रहा है. हर दिन 50 हज़ार से ज़्यादा नए मामले सामने आ रहे हैं. 43 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत भी हो चुकी. यहां तक कि छोटे शहरों में भी कोरोना ने पाँव पसारना शुरू कर दिया है. दूसरी तरफ़ लॉकडाउन लगभग ख़त्म किया जा चुका है. ऐसे में सवाल उठता है कि भारत कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए कर क्या रहा है?

ब्राज़ील के साओ पाउलो में हुए एक विमान हादसे में 199 लोग मारे गए थे. ये ब्राज़ील का सबसे घातक हादसा था. अगर कोरोना महामारी से तुलना करें तो 26 फ़रवरी के बाद से ये हादसा 505 बार दोहराया जा चुका है.

ब्राज़ील में कोरोना संक्रमण के पहले मामले की अधिकारिक पुष्टि 26 फ़रवरी को ही हुई थी.

बीते पाँच महीनों से प्रति दिन इस विमान हादसे में मारे गए लोगों से तीन गुणा लोग कोविड-19 महामारी की वजह से मारे जा रहे हैं.

ब्राज़ील के कई शहरों की आबादी भी एक लाख से कम है. यानी कई शहरों की कुल आबादी से ज़्यादा लोग इस महामारी की वजह से मारे जा चुके हैं.

अमरीका के बाद दुनिया में अब ब्राज़ील एकमात्र देश है जहां एक लाख से अधिक मौतें हुई हैं. अमरीका में ये आँकड़ा एक लाख 61 हज़ार के पार है.

यदि कुल मामलों के मुक़ाबले मौतों की बात करें तो ब्राज़ील दुनिया में दसवें नंबर पर हैं. कम आबादी वाले देश सेन मैरिनो और एंडोरा का प्रतिशत यहां से ज़्यादा है. हालांकि इन देशों में कुछ दर्जन ही मामले हैं.

वहीं फ्रांस, इटनी, ब्रिटेन, बेल्जियम, स्वीडन की मृत्यु दर भी ब्राज़ील से ज़्यादा है. हालांकि इन देशों में इन दिनों कोरोना संक्रमण से कम ही मौतें दर्ज की जा रही हैं. कुछ देशों में संख्या प्रतिदिन दस से भी कम है.

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लेकिन अगर दुनिया के दस सबसे अधिक आबादी वाले देशों की बात की जाए तो ब्राज़ील में प्रति दस लाख लोगों पर मौत की संख्या दूसरे नंबर पर है. ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी के अवर वर्ल्ड इन डेटा के मुताबिक़ ब्राज़ील में प्रति दस लाख लोगों पर 473 मौतें कोरोना संक्रमण से हुई हैं. अमरीका में ये आँकड़ा 487 है.

लेकिन जहां दुनिया के कई देशों में कोरोना से हो रही रोज़ाना मौतों की संख्या गिर रही है, ब्राज़ील में रोज़ाना मौतों की संख्या काफ़ी अधिक है. उदाहरण के तौर पर दो अगस्त को 541 मौतें हुईं थीं जबकि 5 अगस्त को देश में 1437 मौतें दर्ज की गईं. जुलाई 29 को 1595 मौतें दर्ज की गईं थीं.

ब्राज़ील में एक लाख मौत के बाद भी हालात सुधरने के संकेत दिखाई नहीं दे रहे. ये बताता है कि ब्राज़ील इस अप्रत्याशित महामारी को रोकने में नाकाम रहा है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ साओ पाउलो से माइक्रोबॉयोलॉजी में पीएचडी डॉ. नातालिया पास्टरनेक कहती हैं, ''एक लाख मौत को पार करना हमारी अक्षमता का संकेत है. हम इससे बेहतर कर सकते थे.'

ब्राज़ील ने कोरोना के ख़िलाफ़ लड़ाई में क्या ग़लतियां की ये समझने के लिए बीबीसी न्यूज़ ब्राज़ील ने नेताओं, शोधकर्ताओं और स्वास्थ्य कर्मचारियों से बात की. उनका भी मत ऐसा ही था.

ब्राज़ील में कोरोना वायरस की जेनेटिक मैपिंग करने वाले समूह से जुड़े रहे इस्टर सेबीनो कहते हैं, ''ये आँकड़ा बताता है कि एक देश के तौर पर हम वायरस को रोकने में नाकाम रहे.''

यूनिवर्सिटी ऑफ़ साओ पाउलो में प्रोफ़ेसर डॉ. इस्टर कहते हैं कि ब्राज़ील में ये महामारी अभी समाप्त होने से बहुत दूर है. ''अगर हालात नहीं बदले और रोज़ाना एक हज़ार के लगभग मौतें होती रहीं तो अगले एक लाख मामलों तक हम सौ दिनों में ही पहुंच जाएंगे.'

ऐसे में ये समझना ज़रूरी है कि ब्राज़ील ने क्या ग़लतियां की और अब तक इस देश के लिए इस महामारी के क्या सबक हैं-

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1. महामारी के लिए पूरी तैयारी नहीं की

ब्राज़ील और दुनिया के कई देशों के इस महामारी के सामने नाकाम होने की एक सबसे बड़ी वजह ये है कि इस स्तर की महामारी के लिए दुनिया तैयार नहीं थी.

सेबीनो कहते हैं, 'इस तरह की महामारी की आशंका ज़ाहिर की जाती रही थी. बहुत से लोगों को लगता है कि ये कल्पना है, लेकिन ऐसा नहीं है. इसे रोकने के अंतरराष्ट्रीय प्रयास नाकाफ़ी रहे हैं.'

डॉ. सेबीनो कहते हैं कि इससे पहले आईं कोरोना वायरस महामारियां जैसे सार्स, मर्स और एच1एन1 उतनी गंभीर साबित नहीं हुईं थीं जितनी आशंका शुरू में ज़ाहिर की गई थी.

उदाहरण के तौर पर एच1एन1 के सोलह महीनों में 493000 मामले सामने आए थे और दुनिया भर में कुल 18 हज़ार मौतें हुई थीं.

वहीं सार्स के आठ हज़ार और मर्स के 2500 मामले सामने आए थे जबकि इसकी तुलना में अब तक कोरोना वायरस संक्रमण के एक करोड़ 95 लाख से अधिक मामले सामने आ चुके हैं और 7 लाख 23 हज़ार से अधिक मौतें हो चुकी हैं.

सेबीनो कहते हैं, चूंकि पहले कभी इस तरह का प्रभाव नहीं हुआ था, अधिकारियों को लग रहा था कि उनके पास इस नए वायरस से निबटने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं.

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2. कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ कोई राष्ट्रीय नीति नहीं थी

चीन के विश्व स्वास्थ्य संगठन को नए वायरस के बारे में जानकारी देने के दो महीने बाद ब्राज़ील में इसका पहला मामला सामने आया था. उस समय तक 38 देशों में 81 हज़ार मामले सामने आ चुके थे और दो हज़ार से अधिक मौतें हो चुकीं थीं.

महामारी के ब्राज़ील पहुंचने तक और उसके बाद भी इसके ख़िलाफ़ कोई राष्ट्रीय नीति नहीं थी. यहां तक क्षेत्रीय स्तर तक भी कोई योजना नहीं थी.

संघीय, प्रांतीय और नगर निगम प्रशासन के बीच कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ कोई साझा रणनीति या सामंजस्य नहीं थी. बल्कि एक दूसरे के उलट और विरोधी निर्णय लिए जा रहे थे. यही वजह है कि ब्राज़ील के कुछ हिस्सों में अब महामारी के हालात सुधर रहे हैं और कुछ हिस्सों में हालात और ख़राब हो रहे हैं.

किसी महामारी का नियंत्रण मुश्किल ज़रूर है लेकिन असंभव नहीं है. बशर्ते इसके लिए एक प्रभावी रणनीति बनाई जाए लेकिन ब्राज़ील में अभी तक कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है. आज ब्राज़ील वैक्सीन बनने का या महामारी के गुज़र जाने का इंतज़ार कर रहा है.

सेबीनो कहते हैं कि देश के स्वास्थ्य मंत्रालाय के प्रभारी को बदलने से भी वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई कमज़ोर हुई. राष्ट्रपति जाइर बोलसोनारो के साथ मतभेदों की वजह से लुइज़ हेनरीक़ मेनडेटा और नेल्सन टाइक़ ने इस्तीफ़ा दे दिया था और अभी तक इस मंत्री पद पर जूनियर मिनिस्टर जनरल एडुआर्डो पेज़ूलिये ही आसीन हैं.

सेबीनो कहते हैं, 'मेनडेटा ने एक योजना बनाई थी, वो आधे तक ही पहुंच पाई और फिर वो चले गए और इसकी वजह से ब्राज़ील का प्रतिक्रिया कमज़ोर हुई है क्योंकि स्वास्थ्य संबंधी नीति एक रात में ही तैयार नहीं की जा सकती हैं.'

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3. राष्ट्रपति बोलसोनारे ने महामारी को कम करके आंका

वायरस को लेकर दिए अपने पहले ही बयान में राष्ट्रपति बोलसोनारो ने कहा कि वायरस के डर को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है. उन्होंने इसे मामूली सर्दी ज़ुकाम बताते हुए सोशल डिस्टेंसिंग उपायों की भी आलोचना की थी.

बोलसोनारो ने ये भी कहा था कि एक दिन तो हम सबको मरना ही है. उन्होंने कहा था कि इस मुद्दे को लेकर लोगों में पागलपन है और ये एक कोरी कल्पना है.

जब उनसे मौतों के आँकड़े के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा था, ''तो क्या हुआ, मैं माफ़ी चाहता हूं. आप क्या चाहते हैं? मैं क्या करूं. मैं एक मसीहा हूं लेकिन मैं चमत्कार नहीं दिखाता हूं.''

अब जब उनसे एक लाख मौतों के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि हम ज़िंदगी की ओर बढ़ रहे हैं और हम सब इस समस्या से उबर जाएंगे.

नतालिया पास्टरनाक कहते हीं कि महामारी के प्रति राष्ट्रपति का ये नज़रिया बेहद घातक साबित हुए हैं.

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4. बड़े पैमाने पर कोरोना टेस्ट नहीं हुए

ओस्वाल्डो क्रुज़ फ़ाउंडेशन में शोधकर्ता मारगेरेथ डाल्कोल्मो कहती हैं, ब्राज़ील ने एक गलती की और जो अब भी हो रही है वो है बड़े पैमाने पर आबादी के टेस्ट न करना.

स्वास्थ्य मंत्रालय के ताज़ा डेटा के मुताबिक़ एक फ़रवरी से 31 जुलाई के बीच कोविड-19 के 2135487 टेस्ट किए गए. इन आँकड़ों में अस्पतालों और निजी क्लिनिकों में किए गए टेस्ट शामिल नहीं हैं.

ये ब्राज़ील की आबादी का बस एक ही प्रतिशत है और सरकार के 12 फ़ीसदी आबादी का लैब टेस्ट करने के लक्ष्य से काफ़ी दूर है.

टेस्ट किए बिना ये पता लगाना मुश्किल है कि कौन लोग संक्रमितों के संपर्क में आए हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन कई बार कह चुका है कि वायरस की चेन को तोड़ने के लिए संक्रमित लोगों और उनके संपर्क में आए लोगों को अलग थलग करना ज़रूरी है.

प्रोफ़ेसर डाल्कोमो कहते हैं कि जो देश वायरस को रोकने में कामयाब रहे हैं वहां यही मॉडल अपनाया गया है. वो कहते हैं, दक्षिण कोरिया ने भी यही मॉडल अपनाया है और मेरे हिसाब से यही सबसे बेहतरीन मॉडल भी है.

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5. पर्याप्त सामाजिक दूरी नहीं

डाल्कोमो कहती हैं कि इतनी बड़ी तादाद में लोगों के मरने की एक वजह ये भी है कि लॉकडाउन नहीं लगाया गया. किसी शहर या क्षेत्र को पूरी तरह बंद कर दिए जाने को ही लॉकडाउन कहते हैं.

उदाहरण के तौर पर सबसे ज़्यादा संक्रमित साओ पाउलो में लॉकडाउन हीं लगाया गया. अमेज़ोनास, जहां की स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गईं, में भी लॉकडाउन नहीं लगाया गया.

जिन शहरों या क्षेत्रों में अदालतों के आदेश के बाद लॉकडाउन लगाया भी गया वहां भी प्रशासन लोगों को पर्याप्त मात्रा में रोकने में नाकाम ही रहा. डब्ल्यूएचओ ने 70 फ़ीसदी आबादी की आवाजाही पर रोक की सलाह दी थी.

रियो, जहां कुछ नगर निगमों (राजधानी नहीं) में लॉकडाउन लागू किया गया था वहां भी अधिकतर 57 फ़ीसदी आबादी की ही रोकथाम की जा सकी. हालांकि यहां सख़्त लॉकडाउन लगाने के दिशानिर्देश जारी किए गए थे.

वहीं पास्टरनाक कहते हैं कि महामारी की शुरुआत में ही चीन और स्पेन जैसा सख़्त लॉकडाउन लगाने पर लोगों की जान बचाई जा सकती थी.

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6. क्लोरक्विन का विज्ञापन हुआ नुक़सानदेह

इम्यूनोलॉजिस्ट बारबारा बाटिस्टा का तर्क है कि सरकार और प्रशासन के क्लोरक्वीन और हाइड्रॉक्सिक्लोरोक्विन पर अति निर्भर होने की वजह से भी देश में इतनी बड़ी तादाद में लोग मारे गए.

राष्ट्रपति बोलसोनारो ने मलेरिया और लुपस जैसी बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली इस दवा का प्रचार शुरू से ही किया था.

स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसके इस्तेमाल की सलाह दी थी, कई शहरों में ये दवा मुफ़्त में बाँटी गई थी.

शुरुआत में कुछ शोध में कहा गया था कि ये दवा वायरस को रोक सकती है लेकिन बाद में हुए और व्यापक शोध में पता चला कि इसका ऐसा कोई प्रभाव नहीं है.

एक शोध में ब्राज़ील के बहुत से लोगों ने ये माना कि उन्हें विश्वास है कि इस दवा से कोविड-19 को रोका जा सकता है.

लोगों को लग रहा था कि वो इस दवा से बच जाएंगे, इस सोच ने उन्हें लापरवाह किया और संक्रमण की संख्या बढ़ गई.

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7. फ़ील्ड अस्पताल ही बन गए समस्या

मार्गारेट डाल्कोमो कहती हैं कि कई राज्यों ने फ़ील्ड अस्पतालों में भी निवेश किया और ये भी ग़लती ही थी क्योंकि कई जगह बिस्तर तो उपलब्ध थे लेकिन स्टाफ़ न होने की वजह से वो इस्तेमाल नहीं हो पा रहे थे.

वहीं कई जगह इन अस्पतालों के निर्माण में ही देरी हो गई. कई जगह ज़रूरत से ज़्यादा बिस्तर लगा दिए गए और अस्पतालों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो सका.

यहां तक इन अस्प्तालों के निर्माण और संचालन में भ्रष्टाचार के आरोप भी लग रहे हैं. रियो डे जनेरियो में जांच शुरू कर दी गई है.

डाल्कोमो कहती हैं, कई मामलों में, ये अस्पताल समाधान की जगह समस्या बन गए.

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8. मूलनिवासियों की रक्षा नहीं की जा सकी

ब्राज़ील में ये महामारी शहरों से शुरू हुई, लेकिन शुरुआत में ही ये चिंता ज़ाहिर की गई थी कि यदि ये आदिवासी इलाक़ों में पहुंची तो परिणाम घातक हो सकते हैं क्योंकि मूलनिवासियों के शरीर में कई तरह के वायरस को लेकर प्रतिरक्षा नहीं है.

लेकिन तमाम चेतावनियों के बावजूद मूलनिवासियों तक वायरस को पहुंचने से नहीं रोका जा सका. अभी तक 633 की मौत हो चुकी है और 22 हज़ार से अधिक संक्रमित हो चुके हैं.

महामारी ने ब्राज़ील के आदिवासियों के लिए समस्याओं को और बढ़ा दिया है. जिन क्षेत्रों में ये लोग रहते हैं वहां पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध नहीं हैं.

आदिवासियों की सुरक्षा का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और अदालत ने संघीय सरकार को इन लोगों की सुरक्षा के लिए क़दम उठाने का आदेश दिया.

आदिवासियों के लिए काम करने वाली एक संस्था से जुड़े पाउलो टूपिनक्विम कहते हैं, इनकी आबादी स्वास्थ्यकर्मियों से भी संक्रमित हो सकती है. जंगल काटने वाले, ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने वाले भी यहां वायरस ला सकते हैं. शहरों के पास बसे गाँवों के लोग भी शहर जाते हैं, वो भी संक्रमण ला सकते हैं.

वो कहते हैं, जब वायरस इन समुदायों में पहुंच जाता है, तो यहां सामाजिक दूरी बनाए रखना भी बड़ी चुनौती हो जाती है.

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9. ग़रीबों की सुरक्षा नहीं की जा सकी

ये वायरस ब्राज़ील में अमीरों को ज़रिए पहुंचा. वो लोग वायरस लेकर आए जो दुनिया घूमते हैं. लेकिन सब जानते थे कि ये वायरस तेज़ी से फैलता है और ये ग़रीब आबादी तक भी पहुंचेगा.

ओस्वाल्डो फाउंडेशन के एक शोध के मुताबिक शहरी ग़रीब क्षेत्रों में जहां स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है, ये वायरस और तेज़ी से फैला.

रियो डे जेनेरियो के झुग्गी बस्ती इलाक़ों में मृत्यु दर 19.47 प्रतिशत तक पहुंच गई जबकि बिना झुग्गी बस्ती वाले इलाक़ों में ये 9.23 प्रतिशत है.

ग़रीब इलाक़ों में लोग विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी दिशानिर्देशों का पालन भी नहीं कर पाए. सामाजिक दूरी या वर्क फ्रॉम होम का पालन भी नहीं किया जा सका.

कोविड-19 उन लोगों के लिए अधिक घातक साबित हुआ है जो पहसे से किसी न किसी बीमारी से ग्रसित थे. कमज़ोर सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों में पहले से बीमारियां भी अधिक थीं. इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं और बिस्तर भी उतनी सुलभता से उपलब्ध नहीं हैं.

महामारी के सबक क्या हैं?

ब्राज़ील में ये वायरस ऐसे समय में आया जब सरकार ही वैज्ञानिक शोध पर सवाल उठा रही थी और शोध क्षेत्र के फंड काटे जा रहे थे.

इस्टर सेबीनो कहते हैं, मुझे लगता है कि हम इस महामारी में ये दिखा पाएं हैं कि विज्ञान ज़रूरी है और जब लोग अपने नेता चुनें तो इस बात का भी ध्यान रखें.

नातालिया पास्टरनाक कहती हैं कि शोध और विज्ञान के क्षेत्र में अधिक निवेश की ज़रूरत है अन्यथा भविष्य में भी हम ऐसी आपातस्थिति के लिए तैयार नहीं हो पाएंगे.

वहीं मार्गेरेट डाल्कोमो कहती हैं कि ब्राज़ील का विज्ञान इस परिस्थिति से उबर जाएगा. वो कहती हैं कि तमाम मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद ज्ञान अर्जित किया गया है, वैज्ञानिकों ने पेटेंट पंजीकृत कराए हैं, कम खर्च पर चीज़ों का विकास किया गया है और शोध में हिस्सा लिया गया है.

डाल्कोमो कहती हैं कि विज्ञान समाज से इतना क़रीब पहले कभी नहीं था.

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