पाकिस्तान के पंजाब में नए धार्मिक विधेयक पर क्यों हो रहा विवाद

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पाकिस्तान विधेयक

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पाकिस्तान की प्रांतीय विधानसभा में पारित एक विधेयक से पाकिस्तान में विवाद बढ़ रहा है. चिंता ज़ाहिर की गई है कि देश में धार्मिक सहिष्णुता और आज़ादी के लिए जगह सिमट रही है.

22 जुलाई को पंजाब विधानसभा में 'तहफ़्फ़ुज़ ए बुनियाद ए इस्लाम' विधेयक पारित किया गया. इसका मक़सद इस्लाम धर्म के आधारस्तंभों की सुरक्षा करना है.

अभी ये विधेयक क़ानून नहीं बना है लेकिन देश के धार्मिक समूहों ने इसे लागू करवाने की क़वायद शुरू कर दी है.

सुन्नी बहुल देश पाकिस्तान में ये विधेयक ख़ासा विवादित है. चिंता ज़ाहिर की गई है कि इसके निशाने पर देश का शिया और अहमदिया समुदाय है.

विधेयक है क्या?

स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक़ अगर ये विधेयक क़ानून बना, तो धार्मिक पुस्तकों और पैगंबर मोहम्मद के परिवार और साथियों का अपमान करने पर पाँच साल तक की सज़ा हो सकेगी और तीन हज़ार अमरीकी डॉलर तक का जुर्माना हो सकेगा.

इसके अलावा चरमपंथियों की तारीफ़ करने, फ़िरकापरस्ती और धार्मिक नफ़रत को बढ़ावा देने पर भी सज़ा होगी.

पंजाब सरकार के जनपसंपर्क विभाग के पास कई नई शक्तियाँ आ जाएँगी.

विभाग ऐसी सामग्री के प्रकाशन को रोक सकेगा, जिन्हें वो राष्ट्रहित, संस्कृति, धर्म या सांप्रदायिक सौहार्द के ख़िलाफ़ समझे.

यही नहीं प्रकाशकों और प्रकाशित सामग्री मंगाने वालों को सामग्री की कॉपी डीजीपीआर के पास जमा करानी होगी और ऐसा न करने पर भी सज़ा का प्रावधान है.

क़ानून लागू होने के बाद पैगंबर मोहम्मद के नाम से पहले ख़त्म-अन-नबीइन (आख़िरी पैगंबर) लिखना भी अनिवार्य होगा.

ये इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

ये क़ानून राज्य के अधिकारियों को उन किताबों और धार्मिक सामग्री को प्रतिबंधित करने के अधिकार देता है, जिन्हें वो विवादास्पद या सरकार के राजनीतिक और धार्मिक एजेंडे के ख़िलाफ़ समझते हैं.

प्रभावी तौर पर, ये क़ानून पंजाब की सरकार को धार्मिक और राजनीतिक मामलों में दख़ल देने का विशेषाधिकार देगा.

ख़ासकर, सांप्रदायिक मामलों में विशेष संदर्भ और नाम से पहले किताब लिखने की बाध्यता पाकिस्तान की राजनीति और समाज में गहरा रहे धार्मिक मतभेदों को दर्शाती है.

विधेयक के लिए शब्दों का चयन बताता है कि सरकार कट्टरपंथी सुन्नी समूहों की ओर झुक रही है. सुन्नी समूह लंबे समय से धार्मिक अल्पसंख्यकों की आज़ादी को नियमित करने की मांग करते रहे हैं.

हाल ही में पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली ने विश्वविद्यालयों में क़ुरान और उसके अनुवाद को पढ़ाने की मांग करने वाले प्रस्ताव को एकमत से मंज़ूरी दी थी.

पंजाब के पाठ्यक्रम और टेक्स्ट बुक बोर्ड ने हाल ही में 100 से अधिक किताबों को राष्ट्रविरोधी और धर्मविरोधी बताते हुए प्रतिबंधित कर दिया था.

गणित की एक किताब को तो सूअर की तस्वीर प्रकाशित होने के कारण प्रतिबंधित कर दिया था.

पाकिस्तान में पहले से ही ईशनिंदा के ख़िलाफ़ सख़्त क़ानून हैं जो इस्लाम के ख़िलाफ़ भाषण, सांप्रदायिकता, देश और सेना के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी को प्रतिबंधित करते हैं.

कौन समर्थक, कौन विरोधी?

पाकिस्तान के कई चर्चित नेताओं ने इस विधेयक का समर्थन किया है.

विधानसभा के अध्यक्ष चौधरी परवेज़ इलाही ने विधेयक पारित होने पर सरकार और विपक्ष के नेताओं का शुक्रिया अदा किया. उनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग क्यू ने ही विधेयक पेश किया था.

सत्ताधारी पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ़ के क़ानून मंत्री राजा बशारत ने इस विधेयक को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के मदीना की ऐतिहासिक ज़मीन के विज़न को फिर से लागू करने की दिशा में उठाया गया क़दम बताया.

माना जा रहा है कि ये विधेयक कट्टरपंथी विधायक मुआविया आज़म के प्रयासों का नतीजा है जो एक नाटकीय घटनाक्रम में विधेयक की कॉपी को अपने पिता मौलाना आज़म तारीक़ की क़ब्र पर लेकर गए. मौलाना तारीक़ ने शिया विरोधी चरमपंथी संगठन सिपाह-ए-सहाबा बनाया था.

पाकिस्तान के कई चरमपंथी समूहों ने भी पंजाब विधानसभा में पारित हुए इस ईशनिंदा विरोधी विधेयक का स्वागत किया है. वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अधिवक्ताओं का कहना है कि इस विधेयक का इस्तेमाल किताबों को प्रतिबंधित करने के लिए किया जा सकता है.

ह्यूमन राइट्स कमिशन ऑफ़ पाकिस्तान और वीमेंस डेमोक्रेटिक फ्रंट जैसे समूहों का कहना है कि ये विधेयक पाकिस्तान के संविधान के ख़िलाफ़ है.

वहीं इस विधेयक का सबसे ज़ोरदार विरोध शिया समूहों की ओर से हो रहा है जो इसे अपनी धार्मिक आज़ादी के लिए ख़तरा मान रहे हैं.

शिया राजनीतिक दल मजलिस-ए-वहादत मुसलेमीन का कहना है कि ये विधेयक उसके कई विधायकों की गैरमौजूदगी में पारित किया गया है. शिया धार्मिक समूहों ने भी इस नए राजनीतिक बिल का विरोध किया है.

विरोध के बीच पंजाब के गवर्नर चौधरी मोहम्मद सरवर ने कहा है कि विधेयक पर आम सहमति बन जाने के बाद ही वो इस पर हस्ताक्षर करेंगे. उन्होंने कई धार्मिक समूहों से इसे लेकर मुलाक़ातें भी की हैं.

पाकिस्तान की मीडिया क्या कह रही है?

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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पाकिस्तान के मीडिया में इसे लेकर विचारधारा के आधार पर विरोधाभास है. 29 जुलाई को डॉन में प्रकाशित एक संपादकीय में कहा गया था कि इस विधेयक की धार्मिक असहिष्णुता के लिए आलोचना की जा सकती है.

नज़म सेठी ने एक लेख में कहा है कि विधेयक पेश करने वालों और इसे पारित करवाने वालों ने इसे पढ़ा तक नहीं होगा.

उन्होंने अपने लेख में लिखा कि अधिकतर धार्मिक किताबों के साथ भी ऐसा ही होता है. उन्होंने कहा कि इस विधेयक का पारित होना और इसके लागू होने को लेकर ठहराव एक तरह से सभी को ख़ुश करने की रणनीति है और ये मामला अनिश्चिकाल के लिए लंबित ही रहेगा.

वहीं ओरया मक़बूल जान ने सेना समर्थक चैनल नियो टीवी पर प्रसारित होने वाले अपने टीवी शो हर्फ़ ए राज़ में इस विधेयक के सांप्रदायिक पक्ष को कम करके आँकते हुए कहा कि ये विधेयक देश को ग्रसित कर रही धर्मनिरपेक्षता और उदारवाद की प्लेग के जवाब में है.

उन्होंने कहा कि धर्मनिरपक्षेता और उदारवाद ने देश में इस्लामी शिक्षा को कमज़ोर किया है और नास्तिकता को बढ़ावा दिया है.

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