बूंद-बूंद पानी के लिए तरसते सहारा रेगिस्तान में उम्मीद जगाते कुएं

सहारा रेगिस्तान

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पश्चिमी अफ्रीकी देश माली के उत्तरी इलाक़े में लंबे समय से पानी संघर्ष के केंद्र में बना हुआ है. माली का ये इलाक़ा लगभग सवा आठ लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है. इसके उत्तरी ओर तो सहारा का रेगिस्तान है. वहीं, दक्षिण में साहेल का इलाक़ा पड़ता है. माली के कुल क्षेत्रफल में ये हिस्सा दो तिहाई है.

माली में काम करने वाली एक स्वयंसेवी संस्था के सदस्य अलमहदी सिसे कहते हैं कि, 'कोई इंसान इस इलाक़े में दसियों या सैकड़ों किलोमीटर तक चले, तो भी शायद उसे एक बूंद पानी का दीदार न हों.'

जैसे-जैसे सहारा रेगिस्तान का दायरा बढ़ रहा है, वैसे-वैसे माली के इस हिस्से में पानी के नए स्रोत की तलाश मुश्किल होती जा रही है. पूरे सहारा इलाक़े में पानी के लिए जंग आम बात है. ये क़बीलों के बीच झगड़े की वजह भी है. दो इलाक़े इस पर भिड़ जाते हैं और दो देश भी आपस में पानी को लेकर टकराते रहते हैं.

पानी की कमी से निपटने के लिए माली में निजी संस्थाएं और स्थानीय लोग मिल कर छोटे छोटे कुएं खोदते हैं. हैंड पंप से उनसे पानी निकालते हैं, ताकि बढ़ती हुई आबादी की ज़रूरतें पूरी की जा सकें.

माली के कई इलाक़ों में साल में बमुश्किल एक बार बारिश होती है. ख़ास तौर से सहारा रेगिस्तान वाले हिस्से में. साहेल में तो एक से ज़्यादा बार बारिश होती है. लेकिन, कई बार इतनी हो जाती है कि बाढ़ आ जाती है. वहीं, कुछ इलाक़े ऐसे भी होते हैं, जो पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस जाते हैं.

उत्तरी माली में औद्योगिक गतिविधियों के चलते पानी की मांग बढ़ गई है. इससे पानी के सीमित संसाधनों पर दबाव भी बढ़ गया है.

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असल में उत्तरी माली के गांवों में या तो किसान आबाद हैं, या घुमंतू चरवाहे. ऐसे समुदायों के बीच पाने की सीमित संसाधनों को लेकर अक्सर झगड़े होते रहते हैं.

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2012 में माली में शुरू हुए विद्रोह के चलते हालात और ख़राब हो गए हैं. जिहादी संगठनों ने, माली की सरकार के विरोधी तुआरेग अलगाववादियों के साथ मिलकर गठबंधन बना लिया है. इस हिंसा के चलते अब बोरिंग करके पानी तलाशना भी मुश्किल हो गया है. क्योंकि आप दो गुटों की लड़ाई के बीच में आ सकते हैं. कई मानवाधिकार संगठनों ने इस डर से युद्ध वाले इलाक़ों में जाना ही छोड़ दिया है.

छोटे छोटे कुएं खोदना या हैंड पंप लगाना कहने में तो आसान बात है. मगर, ये काम बड़ा पेचीदा है और अक्सर इसमें नाकामी हाथ लगती है. 2009 में रूरल वाटर सप्लाई नेटवर्क की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट आई थी. जिसके मुताबिक़, अफ्रीका के 20 देशों में 10 से 65 प्रतिशत हैंड पंप काम ही नहीं कर रहे हैं.

इसके कई कारण हो सकते हैं. जैसे कि बोरिंग के लिए सही जगह का चुनाव न होना, डिज़ाइन की कमी, या कुएं बनाने में गड़बड़ी. सबसे बड़ी चुनौती तो ये होती है कि कुआं खोदने या हैंड पंप लगाने के लिए सही जगह का चुनाव. कई बार तो किसी बस्ती के एक ओर पानी का अच्छा स्रोत मिल जाता है. वहीं, कई बार हैंड पंप भूगर्भ जल के अच्छे स्रोत से कुछ मीटर की दूरी पर लगा दिए जाते हैं.

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आम तौर पर कुएं खोदने का काम हाथ से किया जाता है. एक नुकीली छेनी या कुदाल से लगातार ज़मीन में गहराई तक ठोकते हुए पानी के स्रोत तक पहुंचा जाता है. फिर पाइप डाल कर हैंड पंप लगाते हैं.

सिर्फ़ बोरिंग करके हैंड पंप लगाने भर से समस्या का हल नहीं होता. ज़रूरत होती है, इसके सही रख-रखाव की, जो स्थानीय लोगों के हवाले होता है. इसके लिए, कई स्वयंसेवी संगठन काम करते हैं. ये स्थानीय लोगों को हैंड पंप या कुएं की देख-भाल के तौर-तरीक़े बताते हैं.

सहारा की सीमा

माली का ये इलाक़ा, सहारा रेगिस्तान की सरहद पर है. जिसे ये मरुस्थल धीरे धीरे अपने आगोश में ले रहा है. इसीलिए, यहां पर हरियाली लगातार कम होती जा रही है और रेगिस्तान का दायरा बढ़ता जा रहा है. जहां आज से एक दशक पहले खेती हुआ करती थी, वहां आज रेत का बसेरा है. यानी इन इलाक़ों में अब खेती कर पाना भी आसान नहीं रहा. बारिश देर से होती है. और जब लोग अपने खेतों की सिंचाई कर चुके होते हैं, तो अचानक इतना पानी बरस जाता है कि बाढ़ से फ़सल बर्बाद हो जाती है. ये सीधे सीधे ग़रीबी की मार होती है.

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देश में छिड़े गृह युद्ध के चलते लोग अपना घर-बार छोड़ कर ऐसे इलाक़ों की ओर जा रहे हैं, जहां आजीविका के संसाधन मिल जाएं. मगर, पानी की कमी से ऐसी जगहें भी बेहद कम हैं. जहां पानी आसानी से मिल जाता है, वहां पर भी बढ़ती आबादी के दबाव से संघर्ष होने लगा है. जैसे कि माली का मोप्ती इलाक़ा. इस क्षेत्र में लगभग ढाई लाख लोग बाहर से आकर रहने लगे हैं. तो, पानी की मांग भी बढ़ गई है. मगर पानी के स्रोत तो सीमित ही हैं.

पानी की कमी के चलते, बच्चों का भविष्य ख़तरे में है. उन्हें न तो पीने का साफ़ पानी मिल पाता है और न ही साफ़-सफ़ाई के लिए. और पानी इकट्ठा करने के चक्कर में लड़कियां स्कूल भी नहीं जा पातीं.

माली के एक एनजीओ वाटर ऐड का कहना है कि देश की एक चौथाई आबादी को पीने का साफ़ पानी नहीं मिल पाता है. अब स्थानीय लोग, स्वयंसेवी संगठन और सरकार मिलकर, माइक्रो बोर वोल की मदद से इस समस्या का समाधान करने में लगे हैं. मगर, गृह युद्ध की विभीषिका ने उनकी चुनौती बढ़ा दी है.

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