पत्रकार जो चार बार चरमपंथी हमलों में बचकर निकला

बीबीसी के पूर्व रिपोर्टर मोहम्मद मोआलिमु

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बीबीसी के पूर्व रिपोर्टर मोहम्मद मोआलिमु

बीबीसी के पूर्व रिपोर्टर मोहम्मद मोआलिमु 16 अगस्त को सोमालिया की राजधानी मोगादिशु में एक होटल पर हुए हमले में बाल-बाल बचे. ये चौथी बार है जब पिछले सात सालों में वो इस्लामी अल शबाब चरमपंथियों के चंगुल में फंस गए थे.

मोहम्मद मोआलिमु अभी फेडरेशन ऑफ़ सोमालिया जर्नलिस्ट्स के प्रमुख हैं. उन्होंने बीबीसी के बेसिलियो मुताही को अपनी आपबीती सुनाई और बताया कि कैसे एलिट होटल में हुए हमले में मारे गए 20 लोगों में उनका दोस्त भी था.

"मैं कांप रहा था. मेरा दिल ड्रम की तरह जोर-जोर से धड़क रहा था. मेरा शरीर कांप रहा था. धुएं का गुबार ऊपर की ओर जा रहा था. उसमें पूरे इलाके़ को देखना मुश्किल हो रहा था.

लोग चिल्ला रहे थे. मैं धमाके का असर देख सकता था. कुछ लोग को टूटे हुए शीशों से चोट लगी थी. कुछ खून में लथपथ थे तो कुछ मदद की गुहार लगा रहे थे.

मेरा दोस्त अब्दीरज़ाक अब्दी तुरंत भागना चाहता था. मैं उसे रोकना चाहता था क्योंकि भारी गोलीबारी हो रही थी. लेकिन वो मुझसे दूर दरवाजे की ओर भागा.

मैं वहां रूका रहा जहाँ से मैं यह समझ पा रहा था कि गोली कहाँ से आ रही है. मुझे ऐसे माहौल में क्या करना है इसकी ट्रेनिंग मिली हुई है.

मैं खुद को लेकर बहुत सजग था. इसने वाकई में मेरी मदद की, क्योंकि मैं यह देख पा रहा था कि क्या चल रहा है. इसलिए मैं बच पाया.

मैं जानता था कि कहाँ भागना है और मैं टेढे-मेढ़े रास्ते से भाग रहा था. मैं उस दीवार को फांद गया जिस तरफ होटल समुद्र की तरफ था.

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एलिट होटल

'अपनी टी-शर्ट खोल दी'

मैं दीवार फांदने के बाद तुरंत नहीं दौड़ सका. जो लोग भागते दिख जा रहे थे, वो गोली का शिकार बन रहे थे.

मैं जानता था कि कोई भी चीज जो आपने रंगीन पहनी हुई है जैसे की शर्ट, उससे हमलावरों का ध्यान फौरन उस तरफ खिंचेगा. मैंने हरे रंग की टी-शर्ट पहन रखी थी. मैंने उसे उतार दिया और फिर समुद्र किनारे दौड़ना शुरू किया. मैं नंगे पांव था. मैंने अपने जूते निकाल दिए थे.

गोलीबारी अब भी जारी थी. लेकिन मैं भाग्यशाली था कि मैं बच गया. तब मैंने अपने दोस्त को कॉल करने की कोशिश की लेकिन कॉल नहीं जा रहा था.

मैंने उसे जिंदा या मुर्दा खोजने की कोशिश की. मैंने देखा कि धमाके ते बाद कई सारे लोग जमीन पर पड़े हुए हैं. उसमें से कई कराह रहे थे. वो बहुत दर्दनाक दृश्य था.

एम्बुलेंस आने शुरू हो गए थे. लेकिन उस वक़्त भी गोलीबारी हो रही थी. किसी ने मुझसे कहा कि अब्दीरिजाक जख्मी है और उसे अस्पताल ले जाया गया है.

दुर्भाग्य से उसे सीने और पैर में गोली लगी हुई थी.

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समुद्र किनारे स्थित लिडो होटल को सील कर दिया गया

'मैं अस्पताल की तरफ भागा'

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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समाप्त

जब तक सैनिक आतेऔर हालात काबू में लेते तब तक बहुत गोली चल चुकी थी.

मेरा दोस्त अब्दीरज़ाक जो कि सूचना मंत्रालय में काम करता था, वो खुद मुझे घर से लेकर ड्राइव करते हुए होटल में लाया था.

चूंकि कार ले जाने की इजाज़त नहीं थी इसलिए मैं अस्पताल उसे देखने पैदल ही भागा. लेकिन जब तक मैं पुहँचता उसे मृत घोषित कर दिया गया था.

वह एक भयावह दिन था और चौथी बार मैंने मोगादिशु में इस तरह के हालात का सामना किया था.

यह पहली बार है जब मुझे कोई चोट नहीं आई और मैं जख्मी नहीं हुआ.

2013 में मैं संयुक्त राष्ट्र के परिसर के सामने था जब अल शबाब ने हमला किया था और एक आत्मघाती हमलावर मेरी कार से टकराया था.

दूसरी बार 2016 में समुद्र किनारे लिडो होटल में हमला हुआ था. उस वक़्त मेरा चेहरा बुरी तरह से जख़्मी हो गया था. मैं दो घंटे तक खून में लथपथ पड़ा रहा था. नौरोबी और लंदन के अस्पताल में महीनों मेरा इलाज चला था तब कहीं जाकर मेरे जख़्म भरे थे.

पिछले साल फरवरी में होटल माका-अल-मुकारामा में धमाका हुआ था. यह धमाका बहुत विध्वंसकारी था.

मुझे हल्की चोट आई थी और मैं दीवार में बने उसे छेद से निकलकर बचने में कामयाब रहा था जो आत्मघाती कार हमलावर ने बनाया था.

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लिडो बीच

परिवार को ज़िंदा होने का नहीं हुआ यक़ीन

लेकिन कल्पना कीजिए कुछ देर पहले आप जिस दोस्त के साथ बैठकर कॉफी पी रहे हों, वो अचानक से हुए हमले में मारा जाता है.

आप सोच सकते हैं कि यह कितना तकलीफ़देह है. मुझे नींद नहीं आ रही थी. मैंने बहुत कोशिश की सोने की लेकिन सो नहीं सका. इसका मुझ पर बहुत बुरा असर पड़ा है.

लगभग 20 लोग इस हमले में मारे गए थे. इसके अलावा चार हमलावर और एक आत्मघाती हमलावर की मौत हुई.

मेरे परिवार को यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं ज़िंदा हूँ.

मोगादिशु में काम करने वाले लोग अक्सर दोपहर के वक़्त चाय पीते हैं.

मैं हमले को लेकर बहुत चिंतित हूँ. मुझे उम्मीद थी कि चीजें अब सुधरेंगी. मेरी पत्नी और मेरा परिवार हमेशा मुझे सलाह देता है कि मैं रेस्तरां में नहीं जाऊँ. अब मुझे लगता है कि उनकी सलाह सुननी चाहिए क्योंकि यह रुकने वाला नहीं है.

इस बार मेरा परिवार बहुत चिंतित था क्योंकि उन्हें पता था कि अब्दीरज़ाक की मौत हो गई है. जब मैंने उन्हें अस्पताल से फ़ोन किया तो उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं ज़िंदा हूँ जब तक कि उन्होंने मुझे खुद देख नहीं लिया.

मेरे लिए भी इस पर यकीन करना मुश्किल है कि मैं चौथी बार बच गया हूँ."

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