कोरोना से दोबारा संक्रमित हुआ शख़्स, वैक्सीन के भविष्य को लेकर आशंकाएं

कोरोना वायरस से दोबारा संक्रमित होने वाले शख़्स की कहानी

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कोविड-19 से ठीक हो चुके दुनिया भर के लाखों लोगों की सबसे बड़ी चिंता है कि कहीं वो दोबारा कोरोना वायरस से संक्रमित तो नहीं हो जाएंगे. इसी से जुड़ा एक सवाल ये भी है कि अगर संक्रमित होने के बाद मरीज़ों में इम्यूनिटी विकसित हो गई है तो वह कब तक बनी रहेगी?

हो सकता है आपने सुना भी हो कि कोई ठीक होने के बाद दोबारा संक्रमित हो गया. लेकिन वैज्ञानिकों के पास पहले इस बारे में कोई पुष्ट जानकारी नहीं थी.

अब किसी के दोबारा कोरोना से संक्रमित होने का 'पहला' मामला दर्ज कर किया गया है. ये मामला हॉन्ग कॉन्ग का है.

दरअसल, हॉन्ग कॉन्ग में 33 साल का एक शख़्स साढ़े चार महीने बाद दोबारा कोरोना वायरस से संक्रमित हो गया.

हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि सिर्फ एक मरीज़ के मामले से सीधे निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं है. विशेषज्ञों का कहना है कि दोबारा संक्रमण होना बेहद दुर्लभ है और ये ज़्यादा गंभीर बात हो, ऐसा भी नहीं है.

हॉन्ग कॉन्ग यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों के एक पेपर के मुताबिक़, ये शख़्स ठीक होने से पहले 14 दिन अस्पताल में रहा था, लेकिन एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग के दौरान वो दोबारा कोरोना वायरस संक्रमित पाया गया. हालांकि, उसमें इस बार कोविड-19 के कोई लक्षण नहीं थे. ये शख़्स स्पेन से लौटा था.

इस पेपर को अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल, क्लीनिकल इंफेक्शियस डिजीज़ ने स्वीकार कर लिया है.

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जब पहले संक्रमण हुआ था

हॉन्ग कॉन्ग विश्वविद्यालय की माइक्रोबायोलॉजी टीम के पेपर के मुताबिक़, मरीज़ 33 साल के एक पुरुष हैं जो हॉन्ग कॉन्ग के रहने वाले हैं. उन्हें पहले से कोई बीमारी नहीं थी.

जब वो पहली बार कोरोना से संक्रमित हुए थे तो उन्हें तीन दिन तक खांसी, बलगम, ख़राब गला, बुख़ार और सिरदर्द जैसे लक्षण रहे थे.

26 मार्च 2020 को उनका आरटी-पीसीआर टेस्ट पॉज़िटिव आया था. 29 मार्च 2020 को वो अस्पताल में भर्ती हो गए. तब तक उनके अंदर कोरोना के लक्षण भी दिखने बंद हो गए थे.

दो आरटी-पीसीआर टेस्ट नेगेटिव आने के बाद मरीज़ को 14 अप्रैल 2020 को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी.

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चार महीने बार दोबारा संक्रमित

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उनके कोरोना से दोबारा संक्रमित होने का पता तब चला जब वो ब्रिटेन से होते हुए स्पेन से हॉन्ग कॉन्ग लौट रहे थे. हॉन्ग कॉन्ग एयरपोर्ट पहुंचने पर 15 अगस्त 2020 को स्क्रीनिंग के दौरान उनका आरटी-पीसीआर टेस्ट किया गया.

उन्हें दोबारा अस्पताल में भर्ती कर लिया गया और पूरे वक़्त उन्हें कोई लक्षण नहीं रहा. उनके शरीर का तापमान 36.5°C था यानी उन्हें बुखार नहीं था. उनका पल्स रेट 86 बीट प्रति मिनट था, उनका ब्लड प्रेशर भी ठीक था. अस्पताल में उन्हें कोई एंटीवायरल ट्रीटमेंट नहीं दिया गया.

लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन और ट्रोपिकल साइंस के प्रोफ़ेसर ब्रेंडन रेन कहते हैं कि "दोबारा संक्रमण का ये बेहद दुर्लभ मामला है."

वैज्ञानिकों का कहना है कि जीनोम सीक्वेंसिंग बताती है कि वायरस के दोनों स्ट्रेन 'बिल्कुल अलग' हैं.

हालांकि, वेलकम सेंगर इंस्टिट्यूट में कोविड-19 जीनोम प्रोजेक्ट के वरिष्ठ वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. जेफरी बैरेट कहते हैं, "संक्रमण के अब तक के वैश्विक मामलों को देखते हुए दोबारा संक्रमण का एक मामला सामने आना कोई हैरानी की बात नहीं है. भले ही ये एकदम दुर्लभ मामला क्यों ना हो."

वो कहते हैं, "हो सकता है कि ये दूसरा इन्फेक्शन हो, जो होने पर ज़्यादा गंभीर नहीं होता. हालांकि, हम नहीं जानते कि दूसरी बार संक्रमण होने पर ये शख़्स कितना संक्रामक था."

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बड़े अध्ययन की ज़रूरत - डब्ल्यूएचओ

जो लोग कोरोना वायरस से संक्रमित होते हैं उनके शरीर में वायरस से लड़ने के लिए इम्यून सिस्टम विकसित हो जाता है जो वायरस को दोबारा लौटने से रोकता है.

सबसे मज़बूत इम्यून उन लोगों का पाया जाता है जो गंभीर रूप से कोविड-19 से बीमार हुए हों. हालांकि, अभी ये साफ़ नहीं है कि ये सुरक्षा कितनी मज़बूत है और इम्यूनिटी कब तक रह सकती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इस बारे में और पता लगाने की ज़रूरत है. इसके लिए कोरोना संक्रमण से ठीक हो चुके लोगों पर बड़े स्तर पर स्टडी करनी होगी.

ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पॉल हंटर कहते हैं "इस मसले को ठीक से समझने से पहले हमें इस मामले और दोबारा संक्रमण के अन्य मामलों के बारे में अधिक जानकारी की ज़रूरत होगी."

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पुराने अध्ययन क्या कहते हैं

हॉन्ग कॉन्ग यूनिवर्सिटी के पेपर के मुताबिक़, पहले और दूसरे संक्रमण के बीच 142 दिनों का अंतर था.

वहीं, अब तक के पुराने अध्ययनों में सामने आया है कि ज़्यादातर मरीज़ों में लक्षण शुरू होने के एक महीने बाद वायरल आरएनए डिटेक्ट नहीं हो पाता.

पेपर के मुताबिक़, एक महीने बाद भी वायरल शेडिंग के मामले सामने आए हैं, लेकिन ऐसे मामले दुर्लभ थे.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़, एक गर्भवती महिला का पहला टेस्ट पॉज़िटव आने के 104 दिन बाद तक उनमें वायरस पाया गया था.

हॉन्ग कॉन्ग यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट में इस ओर भी ध्यान दिलाया गया है कि ये मरीज़ हाल में यूरोप से ट्रेवल करके लौटा है. जहां जुलाई 2020 के आख़िर से कोविड-19 के मामले दोबारा बढ़ने लगे थे. शख़्स के दूसरी बार संक्रमित होने पर उनमें वायरस का जो स्ट्रेन पाया गया है वो यूरोप में जुलाई-अगस्त के दौरान मिले स्ट्रेन से मिलता-जुलता है.

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दुनिया के वो 10 देश जहां कोरोना वायरस नहीं है

चीन में भी ऐसे कुछ मामले सामने आए थे कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद लोग दोबारा कोविड-19 के टेस्ट में पॉज़िटिव पाए गए थे. हालांकि उन मामलों में ये साफ़ नहीं था कि हॉन्ग कॉन्ग वाले मरीज़ की तरह क्या वो पूरी तरह ठीक होने के बाद दोबारा वायरस की चपेट में आए थे या पहले वाले संक्रमण का वायरस ही उनके शरीर में था.

कोविड-19 के इलाज को लेकर बनाए गए चीनी विशेषज्ञों के समूह का हिस्सा रहे संक्रामक रोग विशेषज्ञ वांग गुईकियांग ने मई में एक प्रेस ब्रीफ्रिंग में कहा था कि अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद दोबारा पॉज़िटिव पाए जाने वाले चीन के मरीज़ों की प्रारंभिक संख्या 5%-15% के बीच थी.

उन्होंने कहा था कि इसकी एक वजह ये हो सकती है कि वायरस मरीज़ों के फेफड़ों में मौजूद था, लेकिन जब श्वसन तंत्र के ऊपरी हिस्से से सैंपल लिया गया तो वायरस पकड़ में नहीं आया.

उन्होंने कहा कि दूसरा संभावित कारण ये हो सकता है कि टेस्ट कम संवेदनशील हो और इम्यूनिटी कमज़ोर हो, जिसकी वजह से दोबारा पॉज़टिव रिज़ल्ट आ रहा हो.

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शोधकार्ताओं की आशंकाएं

दोबारा संक्रमण के इस मामले की जानकारी देते हुए हॉन्ग कॉन्ग यूनिवर्सिटी ने कई आशंकाएं भी जताई हैं. जो इस प्रकार हैं -

  • हो सकता है हर्ड इम्यूनिटी, SARS-CoV-2 को पूरी तरह ख़त्म ना कर सके. हालांकि, ये संभव है कि दोबारा होने वाला संक्रमण मरीज़ को पहली बार हुए संक्रमण से हल्का हो.
  • हो सकता है कोविड-19 इंसान की आबादी में घूमता रहे.
  • कुछ मामलों में निश्चित एंटीबॉडी लेवल के बावजूद दोबारा संक्रमण हो सकता है.
  • हो सकता है वैक्सीन ज़िंदगी भर के लिए कोविड-19 से बचाव ना कर सके.

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चीन के वुहान में अप्रैल में किए गए वैक्सीन ट्रायल में हिस्सा लेती एक वॉलन्टियर

हॉन्ग कॉन्ग यूनिवर्सिटी ने ये सुझाव भी दिया है कि वैक्सीन से जुड़े अध्ययनों में कोविड-19 से ठीक हो चुके मरीज़ों को भी शामिल किया जाना चाहिए.

हालांकि पेपर लिखने वालों में शामिल डॉक्टर काई-वॉन्ग ने रॉयटर्स से कहा , "इस फ़ाइंडिंग का ये मतलब नहीं है कि वैक्सीन लेने से कोई फ़ायदा नहीं होगा."

वो कहते हैं कि "जो इम्यूनिटी वैक्सीन से मिलती है, वो नेचुरल इन्फेक्शन के बाद मिलने वाली इम्यूनिटी से अलग हो सकती है. वैक्सीन कितनी असरदार होगी, ये देखने के लिए हमें तमाम वैक्सीन ट्रायल के नतीजों का इंतज़ार करना चाहिए."

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