रूस में विरोधियों को ज़हर देने का लंबा इतिहास रहा है

एलेक्सी नवेलनी

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रूस की नीतियों के कई प्रमुख आलोचकों, जिनमें पूर्व जासूस, पत्रकार और राजनेता तक शामिल हैं, को बीते दो दशकों में ज़हर दिया जा चुका है.

रूस की सीक्रेट सर्विस के दो एजेंटों को ब्रिटेन में निशाना बनाया गया.

एलेक्ज़ेंडर लित्वीनेंको पर रेडियोएक्टिव पोलोनियम-210 से साल 2006 में हमला हुआ था और सर्गेई स्क्रीपाल को ज़हरीले नर्व एजेंट नोविचोक से साल 2018 में निशाना बनाया गया.

दोनों ही घटनाओं में रूस ने अपनी भूमिका होने से इनकार किया था.

एलेक्सी नावालनी, जिन पर पहले हमला भी हो चुका है, अब ताज़ा शिकार लगते हैं. लेकिन उनके मामले में अभी बहुत कुछ स्पष्ट होना बाक़ी है.

रुस से जुड़ी ज़हर दिए जाने की रहस्यमयी घटनाएं अक्सर रहस्यमयी ही रहती हैं.

रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट से जुड़े रूस मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर मार्क गेलियोटी कहते हैं, "ज़हर की दो विशेषताएं होती हैं- सूक्ष्मता और नाटकीयता. ये इतना सूक्ष्म होता है कि आप इससे इनकार कर सकते हैं और इसे साबित करना मुश्किल होता है. ये असर करने में भी वक़्त लेता है, हर तरह की यातना होती है, और फिर ज़हर देने वाला आसानी से आंख मारते हुए इनकार कर सकता है ताकि सभी को इशारा भी मिल जाए."

उड़ान से पहले ज़हर

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नावालनी को एयरलिफ्ट करके बर्लिन लाया गया

एलेक्सी नावालनी रूस के सबसे चर्चित भ्रष्टाचार विरोधी और विपक्षी कार्यकर्ता हैं. सरकार की आलोचा करते हुए और सवाल उठाते हुए उनके वीडियो को दसियों लाख लोग देखते हैं. वो रूस की सत्ता के लिए एक कांटे की तरह हैं.

एक लंबी उड़ान से पहले यदि किसी पीड़ित को ज़हर दिया जाता है तो वह देर तक हवा में ही फंसा रहता है और ज़हर देने वाले के पास फ़रार होने के लिए पर्याप्त समय होता है.

44 साल के नावालनी की साइबेरिया के टोम्स्क से चली एक उड़ान में तबीयत ख़राब हो गई. विमान का रास्ता बदलकर उसे ओम्स्क में उतारना पड़ा.

रूस की खोजी पत्रकार और पुतिन की आलोचक एना पोलितकोव्सकाया की साल 2006 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. दावा किया जाता है कि उन्हें भी साल 2004 में एक उड़ान के दौरान ज़हर दिया गया था.

वो भी बीमार पड़ी और बेहोश हो गईं.

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इसी तरह, धीमे ज़हर पोलोनियम-210 ने लित्वीनेंको को पीड़ादायक मौत दी थी. इस दुर्लभ ज़हर की पहचान करने में ही कई सप्ताह लग गए थे. इससे एल्फ़ा पार्टिकल रेडिएशन निकलता है और गीगर काउंटर से इसकी पहचान नहीं हो सकी थी.

ब्रिटेन में हुई जाँच में जिन दो संदिग्ध जासूसों का नाम आया था उनके पास बिना शक के दायरे में ये देश छोड़ने के लिए पर्याप्त समय था. ब्रिटेन का कहना था कि लित्वीनेंको की जान रूस के दो ख़ुफ़िया जासूसों ने ली थी.

नावालनी ने भी रूस में बहुत दुश्मन बना लिए हैं. इनमें सिर्फ़ राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के समर्थक ही नहीं है. पुतिन की यूनाइटेड रूस पार्टी को वो चोरों और बेइमानों की पार्टी बताते रहे हैं.

पुतिन साल 2000 में रूस का राष्ट्रपति बनने से पहले रूस की ख़ुफ़िया एजेंसी केजीबी में काम करते थे.

जेलियोटी कहते हैं कि इस मामले में 'रूस की सरकार फिसलती नज़र आई जिससे पता चलता है कि इस ऑपरेशन की योजना बहुत अच्छे से नहीं बनाई गई. इससे ये भी संकेत मिलते हैं कि इसके पीछे कोई ताक़तर रूसी नागरिक हो सकता है लेकिन ज़रूरी नहीं कि रूस की सरकार ही इसके पीछे हो.'

नावालनी इस समय जर्मनी की राजधानी बर्लिन के एक अस्पताल में हैं और कोमा में हैं.

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बर्लिन के अस्पताल के बाहर कड़ी सुरक्षा है

क्या करता है ज़हर

अस्पताल का कहना है कि उन्हें कौन सा ज़हर दिया गया है अभी ये पता नहीं चला है. इसकी पहचान के लिए टेस्ट किए जा रहे हैं.

लेकिन स्वतंत्र लैबों में किए गए कई टेस्टों से पता चला है कि उनके शरीर में कोलीनस्ट्रीज़ एंज़ाइम मिला है.

ये सैन्य स्तर के नर्व एजेंट सरीन, वीएक्स या फिर और भी ज़हरीले नोवीचोक एजेंट का प्रभाव हो सकता है.

ये ज़हर दिमाग़ के मांसपेशियों के लिए रसायनिक सिग्नलों में गड़बड़ी करके शरीर में ऐंठन पैदा करता है, सांस टूटने लगती है, दिल की धड़कन गिरने लगती है.

नावालनी की प्रवक्ता ने शक ज़ाहिर किया है कि उन्हें ये ज़हर टोम्स्क एयरपोर्ट पर ब्लैक टी के उस कप में दिया गया होगा जो उन्होंने फ्लाइट में सवार होने से कुछ देर पहले एक कैफ़ै में पी थी.

उन्होंने फ्लाइट में बैठने से पहले कुछ और नहीं खाया था.

लित्वीनेंको ने भी लंदन के एक होटल में ज़हर मिलाई गई चाय पी ली थी. ये मामला भी उस जैसा ही लगता है.

अमरीका में रह रहे एक चर्चित पुतिन विरोधी एक्टिविस्ट व्लादीमिर कारा मुर्ज़ा ने भी दावा किया था कि उन्हें साल 2015 और 2017 में ज़हर दिए जाने जैसे लक्षण हुए. उनके ज़हर दिए जाने के दावे एक रहस्य बने हुए हैं.

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उन्होंने बीबीसी से कहा, "ज़हर रूस की ख़ुफ़िया सेवाओं का सबसे पसंदीदा हथियार बनता जा रहा है."

'ज़हर के प्रभाव से गुज़रना बहुत पीड़ादायक होता है. पहली बार ज़हर दिए जाने और फिर कोमा के बाद मुझे फिर से चलना सीखना पड़ा.'

20 अगस्त को नावालनी जिस जहाज़ में थे जब वो ओम्स्क में उतरा तो वो कोमा की हालत में ही थे. उन्हें तुरंत वेंटिलेटर पर डाला गया.

क्या पहले ही मिटा दिए ज़हर के निशान

राष्ट्रपति पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोफ़ का कहना है कि बर्लिन के अस्पताल की नावालनी को ज़हर दिए जाने की जाँच अभी पूरी नहीं हुई है, इसलिए अभी अधिकारिक जाँच शुरू करना जल्दबाज़ी होगी.

नावालनी को बर्लिन लाने की अनुमति मिलने के बाद पेस्कोफ़ ने कहा था कि वो उनकी बेहतर सेहत की कामना करते हैं.

इस बात का शक भी ज़ाहिर किया जा रहा है कि बर्लिन लाए जाने से पहले नावालनी के शरीर से ज़हर के निशान मिटा दिए गए होंगे.

ओम्स्क के डॉक्टरों ने पहले ये कहा था कि नावालनी का ब्लड शुगर स्तर गिर गया था. नर्व एजेंट के संकेत न पहचानने को लेकर उनकी आलोचना भी हो रही है.

अमरीका में काम करने वाले एनेस्थीसियोलॉजिस्ट डॉ. कोंस्टेंटिन बालानोफ़ ने बीबीसी रूसी सेवा से कहा कि ये नाकामी हैरान करने वाली है.

मॉस्को के ज़हर विशेषज्ञों ने ओम्स्क के डॉक्टरों से बात की थी और उन्होंने 'ज़रूर ये कहा होगा कि ये उस रसायन समूह का कोई ज़हर है.'

मामले की लीपापोती करने का शक भी ज़ाहिर किया जा रहा है. बिना पहचान वाले पुलिसकर्मी जल्द ही वारदात स्थल पर पहुंच गए थे और वहां लोगों को आने से रोक दिया था.

डॉक्टरों ने इस बात पर भी ज़ोर दिया था कि नावालनी के मूत्र में ज़हर के लक्षण नहीं थे.

अब ये भी पता चला है कि नावालनी को ओम्स्क के अस्पताल में नर्व एजेंट की एंटीडोट एट्रोपाइन भी दी गई थी.

सैंट पीटर्सबर्ग में इंटेन्सिव केयर विशेषज्ञ रह चुके मिख़ाइल फ्रेमडरमैन का कहना है, "ज़हर दिए जाने के ऐसे मामलों में एट्रोपाइन को लंबे समय तक नसों के द्वारा चढ़ाया जाना चाहिए."

नावालनी का मेडिकल डाटा जारी नहीं किया गया है. फ्रेमडरमैन कहते हैं कि हो सकता है ओम्स्क में ऐसा न किया गया हो.

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ओम्स्क का आपातकालीन अस्पताल

रसायनों का स्पेक्ट्रम

ब्रिटेन के शीर्ष रसायन हथियार और ज़हर विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर एलिस्टेयर हे का कहना है कि ओर्गेनोफोस्फेट्स की लंबी सूची में ऐसे नर्व एजेंट सबसे ज़्यादा ज़हरीले होते हैं.

संभावित ज़हरीले पदार्थों की लंबी सूची नर्व एजेंट की सटीक पहचान को मुश्किल बना देती है.

कुछ हल्के ज़हर वाले ओर्गेनोफ़ोस्फेट्स का इस्तेमाल कीटनाशकों और मेडिकल थेरेपी में भी किया जाता है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "किसी की जान लेने के लिए बहुत मामूली डोज़ चाहिए होती है. इसे आसानी से छुपाकर ड्रिंक में दिया जा सकता है."

अगर क़ातिल के नज़रिए से देखें तो इसके कई और फ़ायदे भी हैं. प्रोफ़ेसर हे कहते हैं, "ब्लड टेस्ट से ये पता नहीं चलता कि एजेंट क्या था. इसका पता लगाने के लिए और जटिल टेस्ट करने होते हैं. जिनमें बहुत महंगे उपकरण लगते हैं. बहुत से अस्पतालों की लैब में ये सुविधा नहीं होती है."

ब्रिटेन में ये क्षमता अति सुरक्षित जैव और रसायन रिसर्च सेंटर पोर्टन डाउन तक ही सीमित है.

दुनियाभर में 190 देशों ने वैश्विक रसायनिक हथियार कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं. इनमें रूस और ब्रिटेन दोनों शामिल हैं.

ये रसायनिक हथियारों के इस्तेमाल और इन पर शोध को प्रतिबंधित करती है. सिर्फ़ बहुत छोटे स्तर पर एंटिडोट और सुरक्षात्मक इस्तेमाल के लिए ही इसके उत्पादन की अनुमति है.

शीत युद्ध के बाद रूस ने अपने रसायनिक हथियारों के भंडार को नष्ट कर दिया था.

प्रोफ़ेसर हे बताते हैं कि ये क़रीब चालीस हज़ार टन रसायन थे.

शीत युद्ध के दौरान हुई कुछ हत्याओं में भी एक्ज़ोटिक केमिकल्स का इस्तेमाल किया गया था.

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मार्कोफ़ के पोस्टमार्टम के दौरान शरीर से एक ज़हरीला छर्रा निकला था

बुल्गारिया के वामपंथ विरोधी पत्रकार जॉर्जी मार्कोफ़ की लंदन में 1978 में छतरी से रसायन छिड़ककर हत्या कर दी गई थी.

उस समय बुल्गारिया सोवियत यूनियन का क़रीबी था.

माना गया था कि वो हत्या रीसिन से की गई थी. मार्कोफ़ के शव से एक छर्रा मिला था. माना गया कि ये ज़हर उस छर्रे से ही दिया गया.

क़ातिल ने छतरी से छर्रे को सीधे रक्त में पहुंचा दिया था.

ये इस ज़हर को निगलकर शरीर में दाख़िल होने से ज़्यादा ख़तरनाक तरीक़ा था.

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