तुर्की और ग्रीस के बीच भूमध्यसागर में क्यों है तनाव

  • जोआना सबा
  • बीबीसी मॉनिटरिंग
तुर्की और ग्रीस

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हालिया हफ्तों में पूर्वी भूमध्यसागर में तनाव तेजी से बढ़ा है. नैटो सदस्य ग्रीस और तुर्की के बीच ऊर्जा संसाधनों पर कब्जे को लेकर युद्ध जैसे हालात पैदा पैदा हो गए हैं.

हाल में तुर्की के मीडिया में खबर आई कि ग्रीस ने एक छोटे से मगर रणनीतिक रूप से बेहद अहम द्वीप कास्टेलोरिजो में अतिरिक्त सैन्य बल भेज दिए हैं. इसके चलते तुर्की ने अंतरराष्ट्रीय संधियों के मुताबिक एक असैनिक क्षेत्र के तौर पर इसके दर्जे में बदलाव का दोष ग्रीस पर डाल दिया.

ग्रीस ने इन आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि उसके सैन्य बलों का मूवमेंट एक रूटीन कामकाज का हिस्सा था.

यह छोटा सा ग्रीक आइलैंड तुर्की के तट से करीब दो किलोमीटर दूर पड़ता है. यह दोनों देशों के बीच चल रही हालिया तनातनी का एक अहम बिंदु बन गया है क्योंकि यह तुर्की के समुद्र तट के सबसे नजदीक मौजूद टापुओं में से एक है.

साल 1982 के 'यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी' में सार्वभौमिक देशों को अपने तटों से 200 नॉटिकल मील (समुद्री मील) तक की दूरी तक एक्सक्लूसिव इकनॉमिक ज़ोन (ईईजेड) बनाने का अधिकार दिया गया है. हालांकि, तुर्की इस समझौते का हिस्सा नहीं है.

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समुद्री सीमाओं की परिभाषा

तुर्की ने आक्रामक रूप से इस तरह की समुद्री सीमाओं की परिभाषा का विरोध किया है. इस संधि के तहत ग्रीस को दोनों देशों के बीच के और विवादित द्वीप साइप्रस के इर्दगिर्द भूमध्यसागर में ज्यादा हिस्सा मिलता है.

तुर्की का तर्क है कि इस समुद्र को बराबरी के आधार पर बांटा जाना चाहिए. अपने इस दावे के समर्थन के लिए तुर्की ने अपने जंगी जहाजों की गतिविधियां इस विवादित इलाके में बढ़ा दी हैं.

6 अगस्त को ग्रीस और मिस्र ने एक मैरीटाइम बॉर्डर एग्रीमेंट पर दस्तखत किए. इसके बाद तुर्की ने एक ड्रिलिंग सर्वे जहाज़ ओरुक रीस को विवादित समुद्र में भेज दिया. ओरुक रीस ने हालिया हफ्तों में साइप्रस के करीब पूर्वी भूमध्यसागर में अपना काम जारी रखा है.

यह विवाद तुर्की और ग्रीस के बीच समुद्री विवाद से आगे निकल गया है. अब इसमें इस पूरे इलाके और इससे बाहर की शक्तियों के साथ गठजोड़ भी होने लगे हैं.

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क्या तुर्की के सख्त बयान कार्रवाई के रूप में नजर आएंगे?

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समाप्त

तुर्की और ग्रीस के बीच में तनाव सबसे पहले 2019 के आखिर में बढ़ना शुरू हुआ था. तुर्की और यूएन की मध्यस्थता वाली लीबिया की गवर्नमेंट ऑफ नेशनल अकॉर्ड (जीएनए) के बीच हुए मैरीटाइम बॉर्डर एग्रीमेंट के बाद यह विवाद शुरू हुआ था.

इस डील में लीबिया और तुर्की के बीच सामुद्रिक क्षेत्र की बात की गई थी. इसमें ग्रीस के दावे वाले ज्यादातर समुद्र और सायप्रस को भी बांट लिया गया था. यूरोपीय देशों, मिस्र और यूएई समेत कई दूसरे देशों ने इस पर आपत्ति जताई थी.

कूटनीति के मुकाबले कार्रवाई को ज्यादा तरजीह देने वाली 'ब्लू होमलैंड' डॉक्ट्रिन से प्रेरित तुर्की अधिकारी कह रहे हैं कि वे अपने देश को दक्षिणी तट तक सीमित नहीं रहने देंगे.

राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन और अन्य अधिकारियों ने लगातार एक उचित समाधान के लिए सौदेबाजी करने की हुंकार भरी है. अर्दोआन ने 26 अगस्त को कहा था, "हम चाहते हैं कि हर कोई ये देखे कि तुर्की अब वो देश नहीं रहा जिसके धैर्य, प्रतिबद्धता और साहस की परीक्षा ली जा सकती है."

उन्होंने कहा था, "हम राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य रूप से जो भी ज़रूरी होगा वह करने के लिए प्रतिबद्ध हैं." उन्होंने कोई भी रियायत नहीं देने का आह्वान किया.

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तुर्की के बाद सऊदी अरब को मिला तेल-गैस भंडार

तुर्की के क्षेत्रीय विरोधी

तुर्की के सर्वे जहाज़ ओरुक रीस ने नेवी की सुरक्षा में विवादित सागर में कामकाज शुरू किया. तुर्की ने पूर्वी भूमध्यसागर में 26 अगस्त से 11 सितंबर के बीच शूटिंग ड्रिल करने का ऐलान किया था.

दोनों नैटो सदस्य देशों के बीच शत्रुता बढ़ने के साथ उन्होंने अपने स्थिति को मजबूत करने के लिए कई क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ गठजोड़ करने की कोशिशें तेज कर दी हैं. ग्रीस और सायप्रस ने यूरोपीय संघ के समर्थन की मांग की है और इनके साथ तुर्की के क्षेत्रीय विरोधी भी शामिल हो गए हैं.

ऐसे में तुर्की की सरकार को डर है कि पूर्वी भूमध्यसागर का इस्तेमाल तुर्की को अलग-थलग करने की कोशिशों में किया जा रहा है.

नैटो के महासचिव जीन्स स्टोल्टनबर्ग के 3 सितंबर को यह एलान करने के बाद कि दोनों देश विवाद खत्म करने के लिए तकनीकी बातचीत के लिए तैयार हो गए हैं, तुर्की ने कहा कि वह ग्रीस के साथ बातचीत करने को राजी है. हालांकि, माना जा रहा है कि ग्रीस ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है.

ग्रीस को फ्रांस के समर्थन से भी तुर्की चिढ़ गया है. वहां के अधिकारी और मीडिया का कहना है कि फ्रांस ग्रीस को ज़्यादा आक्रामक रवैया अपनाने के लिए उकसा रहा है.

हालात तब और जटिल हो गए जब अमरीका ने रिपब्लिक ऑफ सायप्रस को हथियारों की बिक्री पर लगे एक दशक पुराने प्रतिबंध को आंशिक रूप से हटाने का फैसला कर लिया. तुर्की ने इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है. हालांकि, अमरीका का कहना है कि इस फैसले का मौजूदा संकट से कोई लेनादेना नहीं है.

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तुर्की और ग्रीस की लड़ाई में फ़्रांस किस तरह उतरा?

ग्रीस का उदासीन रवैया

ग्रीस ने बार-बार तुर्की के कदमों को अवैध बताया है और भूमध्यसागर के इलाके पर अपने दावों को मिस्र और इटली जैसे पड़ोसी देशों के साथ सामुद्रिक संधियों के जरिए पुख्ता बताया है.

ग्रीस के विदेश मंत्री निकोलस डेंडियास का यह बयान शायद किसी विवाद के वक्त में उनके देश की आधिकारिक डॉक्ट्रिन को ठीक तरह से बयान करता है, "ग्रीस संवाद चाहता है...हमारा तुर्की के साथ विवाद केवल एजियन और पूर्वी भूमध्यसागरीय और इससे लगे हुए समुद्र तक सीमित है. इसके अलावा कोई और विवाद नहीं है."

दशकों तक ग्रीस कूटनीतिक कोशिशों का फ़ोकस अपनी पोजि़शन का बचाव करना और ज्यादा बड़े एजेंडे के साथ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जाने से बचने पर रहा है. लेकिन, ये कोशिशें अब बेमानी साबित होती दिख रही हैं.

जर्मनी और फ्रांस के इस विवाद में सीधे तौर पर शामिल होने को ग्रीक मीडिया में वरिष्ठ विश्लेषक एक ऐसे स्पष्ट संकेत के तौर पर देख रहे हैं जिसके तहत ग्रीस को द्विपक्षीय विवादों के लिए बैठकर बातचीत से मसले हल करना जरूरी है.

तुर्की-लीबियाई समुद्री सीमांकन डील

ग्रीस को लगता है कि ये बातचीत होना तय है और इस वजह से उसने अपने केस को तैयार करना शुरू कर दिया है. मिस्र के साथ हालिया समझौता इसी संदर्भ में देखा जा सकता है. तुर्की के एक वरिष्ठ राजनयिक ने भी तुर्की की ड्रिलिंग गतिविधियों का मैप ट्वीट किया है.

मिस्र के साथ डील की ग्रीस में काफी आलोचना हुई है. दोनों देशों के राजनयिकों का कहना है कि उनकी सरकारों ने तुर्की की महत्वाकांक्षा के सामने हड़बड़ाहट में बहुत ज्यादा गंवा दिया है.

ग्रीस के पूर्व विदेश मंत्री निकोव कोट्जियास ने कहा है कि ग्रीस ने मिस्र की सभी "अधिकतमवादी मांगों" को जल्दबाजी में इसलिए मान लिया है ताकि तुर्की-लीबियाई समुद्री सीमांकन डील के सामने एक "सवालिया" एग्रीमेंट खड़ा किया जा सके.

फ्रांस ने किया तुर्की की बढ़ती महत्वाकांक्षा का विरोध

ग्रीस ने पूर्वी भूमध्यसागर पर अपने दावे को मजबूत करने के लिए अहम यूरोपीय संघ के देशों से समर्थन की मांग की है, लेकिन अभी तक फ्रांस की तरह से कोई भी देश उसके इतने मुखर समर्थन में नहीं आया है.

इस इलाके में तुर्की की बढ़ती ताकत को फ्रांस ने न सिर्फ पूर्वी भूमध्यसागर बल्कि लीबिया में भी चुनौती दी है. फ्रांस के कई मीडिया आउटलेट्स यह कह रहे हैं कि मामला ऊर्जा संसाधनों पर कब्जे से आगे निकल चुका है.

मिसाल के तौर पर फ्रांस के सरकारी रेडियो चैनल फ्रांस इंटर ने कहा है, "हम इस लड़ाई को केवल हाइड्रोकार्बन तक ही सीमित नहीं मान सकते हैं, जबकि हमने देखा है कि यूएई के ल़ड़ाकू जहाज ग्रीस में इन गतिविधियों में हिस्सा ले रहे हैं."

फ्रांस ने राफाल जेट्स और जंगी जहाज भेजे हैं ताकि ग्रीस और सायप्रस को सपोर्ट दिया जा सके. ये जहाज इनके साथ युद्धाभ्यास में हिस्सा ले रहे हैं.

कई लोगों का यह भी मानना है कि तुर्की नैटो में अमरीका के छोड़े गए रिक्त स्थान पर दांव लगा रहा है और कमजोर यूरोपीय और पश्चिमी गठजोड़ों पर हमला कर रहा है और फ्रांस इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देना चाहता है.

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मुश्किल होती प्रवासियों की ज़िंदगी

इस इलाके में अन्य यूरोपीय हित

जर्मनी ने इस इलाके में तनाव कम करने की मांग की है और कहा है कि तुर्की और ग्रीस दोनों को बातचीत के लिए बैठना चाहिए. एथेंस और अंकारा के पिछले हफ्ते के दौरे में जर्मनी के विदेश मंत्री हीको मास ने चेतावनी दी है कि दोनों ही देश "आग के साथ खेल" रहे हैं.

इटली भी मामूली रूप से इस विवाद में शामिल हो गया है. यह ग्रीस के साथ एक समुद्री समझौता पहले कर चुका है. लेकिन, इटली की अभी तक की नीति ग्रीस का दूर से ही समर्थन करने की रही है.

इटली के विदेश मंत्री लुइगी डी मायो ने तुर्की के अपने समकक्ष मेवलुट कावुसोगलु को 14 अगस्त को यह स्पष्ट कर दिया कि इटली के पास तुर्की के साथ तनाव बढ़ाने की कोई वजह नहीं है. उन्होंने कहा कि "सभी पक्षों को एक उदार और आपसी सहयोग वाला रवैया अपनाना चाहिए."

हालांकि, इटली की तेल और गैस कंपनी ईएनआई फिलहाल ग्रीस और सायप्रस की कंपनियों के साथ नए ऊर्जा स्रोतों की खोज में लगी हुई है. रूस भी हालिया वक्त में नौसेना अभ्यास में शामिल हुआ है. आधिकारिक रूप से रूस ने इस संकट में किसी का भी पक्ष लेने से इनकार किया है.

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अर्दोआन ने कहा, तुर्की एक क़दम भी नहीं हटेगा पीछे

रूस का रवैया

रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जाखारोवा ने 3 सितंबर को बताया, "इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई एक विवादित पक्ष एक सैन्य और राजनीतिक सहयोगी है."

लेकिन, रूस के सितंबर में पूर्वी भूमध्यसागर में दो नौसेना अभ्यास करने की खबरों से सभी क्षेत्रीय खिलाड़ियों को एक साफ संदेश जाता हैः रूस की ताकत को दरकिनार नहीं किया जा सकता है, और रूस चाहता है कि उसके हितों का ध्यान रखा जाए.

पूर्वी भूमध्यसागर में तुर्की का एक अहम रुख पूर्वी भूमध्यसागरीय गैस फोरम (ईएमजीएफ) से इसे बाहर रखने जाने को लेकर है. इस फोरम का गठन जनवरी 2019 में कायरो में हुआ था और इसे "भूमध्यसागरीय गैस के ओपेक" की संज्ञा दी गई थी.

इस फोरम में ईजिप्ट, ग्रीस, सायप्रस, इजरायल, इटली, जॉर्जन और फिलिस्तीन शामिल हैं. इस फोरम की महत्वाकांक्षा पूर्वी भूमध्यसागर में गैस का पता लगाना है ताकि ईंधन के लिए रूस पर निर्भरता को घटाया जा सके.

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तुर्की और ग्रीस के बीच बढ़ते झगड़े में कौन देश किसके साथ है?

तुर्की की महत्वाकांक्षा को चोट

लेकिन, मिस्र का तुर्की के खिलाफ खड़ा होना केवल भूमध्यसागरीय गैस संसाधनों की जंग तक सीमित नहीं है. लीबिया भी इसमें एक भूमिका निभा रहा है. ईजिप्ट और यूएई पूर्व स्थित लीबियाई नेशनल आर्मी (एलएनए) के मुख्य समर्थक हैं. इस संगठन का तुर्की के समर्थन वाले जीएनए के साथ विवाद है.

मिस्र और यूएई दोनों ही तुर्की के कदमों को एक विस्तारवादी नीति के हिस्से के तौर पर देखते हैं. वे इस पर लगाम लगाना चाहते हैं. इसके अलावा, दोनों ही देश तुर्की को राजनीतिक इस्लाम के अहम स्पॉन्सर के तौर पर भी देखते हैं, जिसकी इन दोनों ही देशों में कोई रुचि नहीं है.

ग्रीस और मिस्र के बीच हुआ समुद्री सीमा समझौता तुर्की की इन्हीं महत्वाकांक्षाओं पर प्रहार था. एक स्वतंत्र वेबसाइट मादा मस्र ने मिस्र के अधिकारियों के हवाले से लिखा है कि मिस्र ने बड़ी रियायतें दी हैं ताकि इस डील में कोई अड़ंगा न अटके.

खबर के मुताबिक एक अधिकारी ने कहा, "आखिरी मिनट तक तुर्की हमें सीधे संदेश भेजता रहा जिसमें हमसे ग्रीस के साथ डील नहीं करने के लिए कहा गया था. हमसे कहा गया था कि हमें पहले लीबिया के साथ डील करनी चाहिए जिससे हमें ज्यादा समुद्री इलाका मिलेगा."

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कोरोनावायरस: ग्रीस में शरणार्थी शिविरों में कैसे रह रहे हैं लोग

लीबिया का विरोध

दूसरी ओर, लीबियाई जीएनए ने लगातार ग्रीस और मिस्र के बीच हुए समझौते का विरोध किया है. जीएनए ने कहा है कि वह "किसी भी पार्टी को अपने समुद्री अधिकारों में दखल नहीं देने देगा. और तुर्की के साथ समुद्री जोन के संबंध में हुए सहमति पत्र को हर हाल में लागू किया जाएगा."

जीएनए लीडर फायेज अल सर्राज की लगातार तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन से बातचीत होती रही है. जुलाई में दोनों की एक मुलाकात भी हो चुकी है. इनमें समुद्री समझौतों को लागू करने पर चर्चा हुई है.

जून की शुरुआत में जीएनए के विरोधी हाउस ऑफ रेप्रेजेंटेटिव्स (एचओआर) ने इटली और ग्रीस के बीच हुए समुद्री समझौतों का समर्थन किया था. एचओआर को मिस्र और यूएई का समर्थन हासिल है.

ऐसे में अर्दोआन का लीबिया में दखल उनकी पूर्वी भूमध्यसागर में महत्वाकांक्षा से अलग कर नहीं देखा जा सकता है. इसी तरह से मिस्र और यूएई की भूमिकाएं भी देखनी होंगी.

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(विलियम आर्मस्ट्रॉन्ग, सर्टर आयकोल, लौरा गोज्जी, मारिया कोंड्राचक, कैरोलिन लैंबोले और विटैली शेवचेंको की जानकारियों के साथ)