पाकिस्तान के पत्रकार: हाथों में हथकड़ी और आँखों पर पट्टी, कैसे उठाएंगे आवाज़?

  • शुमाइला जाफ़री
  • बीबीसी संवाददाता, पाकिस्तान से
पाकिस्तानी पत्रकार

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पाकिस्तान में बीते कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी सेना को बदनाम करने के लिए तीन पत्रकारों पर केस दर्ज किया गया है. उनके ख़िलाफ़ 'हेट स्पीच'(नफ़रत भरी) भड़काऊ बातों, मानहानि और राजद्रोह क़ानून के तहत मामले दर्ज किए गए हैं.

पाकिस्तानी अख़बार 'एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के पत्रकार बिलाल फ़ारूक़ी को शुक्रवार को कराची स्थित उनके घर के बाहर से पुलिस ने हिरासत में लिया था.

उनके ख़िलाफ़ एक फ़ैक्ट्री के कर्मचारी ने मामला दर्ज कराया था जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने सोशल मीडिया पर पाकिस्तान की सेना के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक बातें लिखी थीं. बिलाल पर सोशल मीडिया के ज़रिए धार्मिक उन्माद भड़काने का आरोप भी लगाया गया.

बिलाल के ख़िलाफ़ डिफ़ेंस पुलिस स्टेशन में एफ़आईआर दर्ज कराने वाले जावेद ख़ान ने ख़ुद को लांधी इलाक़े की एक फ़ैक्ट्री में मशीन ऑपरेटर बताया. जावेद का कहना था कि वो 'मास्टर जूस शॉप' में गए और उन्होंने बिलाल फ़ारूक़ी की फ़ेसबुक और ट्विटर पोस्ट खंगाली, जिसे उन्होंने 'बेहद भड़काऊ' पाया.

एफ़आईआर के मुताबिक़ बिलाल की सोशल मीडिया पोस्ट्स ने 'पाकिस्तानी सुरक्षाबलों की बदनामी की. ये पोस्ट्स लोगों को देश की सेना के ख़िलाफ़ विद्रोह करने और देश के दुश्मनों को उनके ग़ैरक़ानूनी मक़सद पूरा करने के लिए उकसा सकती थीं. इसलिए पत्रकार के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई होनी ही चाहिए."

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'ईमानदार प्रधानमंत्री' और 'फ़ख़्र के लायक़' सेना की बदनामी

एफ़आईआर में 'प्रिवेंशन ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम' (पीआईसीए) की धारा 11 और 2 को भी शामिल किया गया था जिनके तहत 'हेट स्पीच' के मामलों से निबटा जाता है.

ऐसे मामलों में अपराध सिद्ध होने पर सात साल की जेल या जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं. हालाँकि सोशल मीडिया पर बिलाल पर एफ़आईआर की ख़ूब आलोचना हुई और इसके अगले ही दिन उन्हें ज़मानत पर रिहा कर दिया गया.

मगर जिस दिन बिलाल फ़ारूक़ी रिहा हुए, ठीक उसी दिन झेलम ज़िले के दीना पुलिस स्टेशन में वरिष्ठ पत्रकार अबसार आलम पर एफ़आईआर दर्ज करा दी गई.

ये एफ़आईआर सत्ताधारी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) के जस्टिस लॉयर्स फ़ोरम के स्थानीय प्रमुख चौधरी नवीद अहमद ने कराई थी.

एफ़आईआर में शिकायतकर्ता ने अबसार आलम पर प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और पाकिस्तानी सेना के ख़िलाफ़ 'बेहद गंदी' भाषा इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि ऐसा करना राजद्रोह की श्रेणी में आता है.

एफ़आईआर में कहा गया था कि 'पाकिस्तानी सेना एकमात्र ऐसी सेना है जिस पर पूरी दुनिया को गर्व है.'

एफ़आईआर में ये भी कहा गया था कि इतिहास में ये पहली बार है जब पाकिस्तान में एक 'ईमानदार और निष्ठावान' प्रधानमंत्री सत्ता में आया है, ऐसा प्रधानमंत्री जो देश के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा है और अबसार आलम उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं.

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भगत सिंह पर लगाए गए आरोप अब पत्रकारों पर

कुछ क़ानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि राजद्रोह के मामलों मे सिर्फ़ सरकार ही शिकायकर्ता हो सकती है.

अबसार आलम ने भी ट्विटर पर इस एफ़आईआर का विरोध किया. उन्होंने ब्रिटिश राज में भगत सिंह पर चले राजद्रोह के मुक़दमे का ज़िक्र किया और कहा कि न तो ज़मानत के लिए अर्ज़ी देंगे और न ही अपने ट्वीट डिलीट करेंगे. आलम ने कहा कि वो अदालत में लड़ेंगे और मूल संवैधानिक अधिकारों से समझौता नहीं करेंगे.

उन्होंने लिखा, "राजद्रोह और विद्रोह के यही प्रावधान ब्रिटिश राज में भगत सिंह पर लगाए गए थे जो अभी मौजूदा 'मिलीजुली' फासीवादी शासन ने मुझ पर लगाए हैं. शिकायत में अनुच्छेद 6 और उम्रक़ैद का भी ज़िक्र किया गया था. मेरा गुनाह क्या है? सवाल पूछना! मैं न तो ज़मानत के लिए याचिका दायर करूँगा और न ही अपने ट्वीट डिलीट करूँगा. मैं ये केस लड़ूँगा. मैं अपने मौलिक और संवैधानिक अधिकारों से समझौता नहीं कर सकता."

अबसार आलम को अब तक गिरफ़्तार तो नहीं किया गया है लेकिन सोमवार को एक अन्य पत्रकार असद अली तूर ने ट्विटर पर बताया कि उनके ख़िलाफ़ गुजर ख़ान इलाक़े के पुलिस स्टेशन में 'पाकिस्तान विरोधी' और 'पाकिस्तानी सेना के ख़िलाफ़ भड़काने' के आरोप में मामला दर्ज कर लिया गया है.

अली के ख़िलाफ़ रावलपिंडी के निवासी हाफ़िज़ एहतेशाम ने 'हेट स्पीच' 'मानहानि' और 'प्रिवेंशन ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम्स' के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज कराया है.

उन्होंने एफ़आईआर की कॉपी ट्वीट की और लिखा, "रावलपिंडी पुलिस ने हाफ़िज़ एहतेशाम की शिकायत पर 12 सितंबर को मेरे ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है. ये दुखद है क्योंकि एक पत्रकार के तौर पर मैं ख़ुद कभी ख़बर नहीं बनना चाहता."

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पत्रकारों ने सरकार को चेताया

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पाकिस्तान में पत्रकारों के संगठन 'फ़ेडरल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स' ने इन कार्रवाइयों की निंदा की है. संगठन ने एक बयान जारी कर कहा, "ये प्रशासन का दंभ साबित करता है और बताता है कि कैसे वो मीडिया की आवाज़ दबाना चाहते हैं."

बयान में ये भी कहा गया है कि पत्रकारों के ख़िलाफ़ दर्ज किए गए ये मामले सरकारी एजेंडा मालूम पड़ते हैं. संगठन ने चेताया कि अगर ये मामले निरस्त नहीं किए गए तो पत्रकार पूरे देश में विरोध प्रदर्शन करेंगे जिससे पाकिस्तान की छवि 'और ज़्यादा धूमिल' होगी.

बिलाल फ़ारूक़ी का पक्ष रखने वाले जानेमाने वकील जिब्रान निसार ने एक फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा कि पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 505 (लोगों को भड़काने वाले बयान) के लिए किसी केंद्रीय या प्रांतीय अधिकारी की इजाज़त के बिना एफ़आईआर दर्ज नहीं की जा सकती.

उन्होंने लिखा, "ये मीडिया के दमन की एक और कार्रवाई है. सरकार जानती है कि ये एफ़आईआर कमज़ोर है और आख़िरकार ये मामला निरस्त हो जाएगा. लेकिन बिलाल को गिरफ़्तार करने से उनके और उनके परिवार के उत्पीड़न का मक़सद पूरा हो जाएगा.''

पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार अब्बास नासिर ने पत्रकारों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामलों को 'फासीवादी सरकार का नया हथियार' बताया.

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पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान

मैं असुरक्षित हो सकता हूँ लेकिन मीडिया नहीं: इमरान ख़ान

पाकिस्तान के कई आम लोग भी पत्रकारों के समर्थन में उतर आए हैं.

मुबश्शिर नाम के एक ट्विटर यूज़र ने लिखा, "पिछले कुछ दिनों में मुख्यधारा के पत्रकारों पर सेना के ख़िलाफ़ बोलने के लिए मामले दर्ज किए जा रहे हैं. एक पाकिस्तानी नागरिक के तौर पर मैं इसे तुरंत रोके जाने की अपील करता हूँ. इससे देश और सेना की और ज़्यादा बदनामी होगी."

पाकिस्तान में पत्रकारों पर लगातार होने वाले हमलों, दर्ज किए जा रहे आपराधिक मामलों और उनके अपहरण के बावजूद प्रधानमंत्री इमरान ख़ान दावा करते हैं कि पाकिस्तान में मीडिया पर कोई रोक नहीं है.

पिछले साल अपने अमरीका दौरे पर उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में प्रेस की आज़ादी पर रोक की ख़बरें एक 'चुटकुला' भर हैं.

हाल ही में अल-जज़ीरा चैनल को दिए एक इंटरव्यू में इमरान ख़ान ने कहा था कि वो पाकिस्तान में और उनकी कैबिनेट भले 'असुरक्षित' महसूस कर सकती है लेकिन मीडिया नहीं.'

इमरान ख़ान ने कहा था, "अगर ब्रितानी प्रधानमंत्री को वो सब बातें सुननी पड़तीं, जो मुझे सुननी पड़ती हैं तो उनके पास लाखों मिलियन डॉलर ज़्यादा संपत्ति होती क्योंकि वो मानहानि के ढेरों मामले जीत चुके होते."

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बिलाल फ़ारूक़ी

पत्रकारों की आपबीती: हाथों में हथकड़ी, आँखों पर पट्टी

मगर पत्रकारों की बातें सुनकर हालात की बिल्कुल अलग तस्वीर नज़र आती है.

रिहाई के बाद पत्रकार बिलाल फ़ारूक़ी ने समाचार वेबसाइट समा डिजिटल से अपनी गिरफ़्तारी के बारे में विस्तार से बताया था.

बिलाल के मुताबिक़ उनके मकान मालिक ने उन्हें बताया कि पुलिस एक सर्वे कर रही है और उन्हें अपने मूल पहचान पत्र के साथ नीचे बुलाया गया है.

बिलाल ने बताया, "जब मैं अपने घर से बाहर निकला, पुलिस ने मुझे पकड़ लिया और अपनी गाड़ी में बैठा लिया. उन्होंने मुझे हथकड़ी लगा दी और मेरे चेहरे को एक कपड़े से ढंक दिया."

लगभग ऐसी ही कहानी वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार मतीउल्लाह जान ने सुनाई थी. उन्हें जुलाई में इस्लामाबाद में एक स्कूल के बाहर अज्ञात हमलावरों ने उठा लिया था.

मतीउल्लाह का कहना है कि अपहरणकर्ताओं ने दंगारोधी पुलिस की यूनिफ़ॉर्म पहन रखी थी. उन्होंने बताया कि हमलावरों ने उन्हें उनकी कार से खींचकर बाहर निकाला, गर्दन और बांह पकड़कर हथकड़ी लगा दी और आँखों पर पट्टी बाँध दी.

मतीउल्लाह ने अपने एक लेख में इस घटना का ज़िक्र करते हुए लिखा है, "चुप रहो. तुम ये सब क्यों करते हो? अब हम तुम्हें सबक़ सिखाएंगे."

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'पाकिस्तान में न पत्रकार आज़ाद न पत्रकारिता'

मानवाधिकार संगठनों को डर है कि पाकिस्तान में प्रेस की आज़ादी जिस तरह कम हो रही है, वैसे पहले कभी नहीं हुई थी.

मीडिया एक्टिविस्ट इक़बाल खट्टक के अनुसार, "अख़बारों में काम करने वाले पत्रकार निडर होकर लिख नहीं सकते और टीवी चैनलों में काम करने वाले पत्रकार बेख़ौफ़ होकर बोल नहीं सकते. इसलिए वो सही मायनों में पत्रकारिता करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन अब पाकिस्तान सरकार प्रिवेंशन ऑफ़ इलेक्ट्रॉनिक क्राइम एक्ट की आड़ में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर भी लगाम लगा रही है और देश में विरोध के सुरों को पूरी तरह ख़ामोश करने की कोशिश कर रही है."

ह्यूमन राइट्स वॉच के डायरेक्टर (एशिया) ब्रैड ऐडम ने 'पाकिस्तान्स हिपोक्रेसी ऑन प्रेस फ़्रीडम' (प्रेस की आज़ादी पर पाकिस्तान का पाखंड) नाम के अपने लेख में पत्रकारों के ख़िलाफ़ सरकार के रवैये की तीखी आलोचना की है.

उन्होंने लिखा है, "पाकिस्तान में अधिकारी मुक़दमे से पहले ही पत्रकारों को लंबे समय तक गिरफ़्तार करके उन्हें धमकाते और सज़ा देते हैं."

कोरोना महामारी के दौर में आर्थिक संकट का सामना कर रहे पत्रकारों के लिए अब ऐसे दहशत भरे माहौल में रहना बेहद मुश्किल हो रहा है.

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'जो विरोध में बोलेगा, उसे सज़ा मिलेगी'

पाकिस्तान से छपने वाले अंग्रेज़ी अख़बार डॉन ने 13 सितंबर को इसी मुद्दे पर एक संपादकीय प्रकाशित किया था, जिसका शीर्षक था-'मीडिया इन द लाइन ऑफ़ फ़ायर'.

संपादकीय के मुताबिक़, "पाकिस्तान में पत्रकार लगातार धमकियों और दहशत के साये में जी रहे हैं. उन पर नज़र रखी जा रही है, उनका पीछा किया जा रहा है और उन्हें डराया-धमकाया जा रहा है. अगर वो सरकार की 'गुज़ारिशों' पर ध्यान नहीं देते तो उन्हें या तो गिरफ़्तार कर लिया जाता है या फिर अग़वा. सरकार का संदेश साफ़ है- जो विरोध में बोलेगा, उसे सज़ा मिलेगी."

अलग-अलग देशों में प्रेस की स्वतंत्रता का विश्लेषण करने वाली संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की वार्षिक रिपोर्ट में इस साल पाकिस्तान 180 देशों की सूची में 145वें नंबर पर था. साल 2019 में पाकिस्तान की 142वीं रैंक थी."

पत्रकारों की हत्या, सोशल मीडिया पर लगी पाबंदियों, सरकार की धमकियों, पत्रकारों के उत्पीड़न, स्वतंत्र पत्रकारिता पर रोक, पत्रकारों के ख़िलाफ़ मुक़दमे, उनकी गिरफ़्तारी और उनके अपहरण जैसे कारणों से प्रेस की आज़ादी के मामले में पाकिस्तान की रैंकिंग बहुत नीचे है.

वहीं साल 2020 में रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट में प्रेस की आज़ादी के मामले में भारत 142वें स्थान पर था. यानी पाकिस्तान से थोड़ा ही ऊपर.

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