आर्मीनिया के साथ संघर्ष के दौरान अज़रबैजान में भारतीय क्या कर रहे हैं?

  • तारेंद्र किशोर
  • बीबीसी हिंदी के लिए
आर्मीनिया-अज़रबैजान

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आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच नागोर्नो-कारबाख को लेकर दशकों पुराना सीमा विवाद एक बार फिर भड़क गया है और इसने युद्ध की शक्ल ले ली है. दोनों तरफ़ से गोलीबारी, बमबारी और आरोप-प्रत्यारोप जारी है.

इसे लेकर अब दुनिया भर के देशों की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं. पाकिस्तान, ईरान और तुर्की ने खुलकर अज़रबैजान का समर्थन किया है लेकिन भारत ने अपनी प्रतिक्रिया में हालात पर चिंता जताते हुए शांति और बातचीत से ही मसले को हल करने पर जोर दिया है.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने अपनी प्रेस ब्रीफिंग में कहा, "हम आर्मीनिया-अज़रबैजान की सीमा पर नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र में फिर से तनाव की रिपोर्ट मिलती दिख रहे हैं जिसकी 27 सितंबर को तड़के ही शुरुआत हो गई थी.''

''दोनों ही पक्षों से जान-माल के नुकसान की ख़बर आ रही है. भारत क्षेत्र में शांति और सुरक्षा को लेकर चिंतित है. हम फौरन इस तनाव को ख़त्म करने की ज़रूरत को दोहराते हैं और इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सीमा पर शांति बहाल करने को लेकर सभी संभव क़दम उठाए जाएँ."

हालाँकि तुर्की और पाकिस्तान ने जिस तरह से अज़रबैजान के साथ देने की बात कही है, उस पर भारत ने आधिकारिक तौर पर अब तक कोई टिप्पणी नहीं की है.

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तत्कालीन आर्मीनियाई राष्ट्रपति रॉबर्ट कोचारिन तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से 31 अक्टूबर, 2003 में भारत दौरे के दौरान मिलते हुए.

भारत से सम्बन्ध

अज़रबैजान में मौजूद भारतीय दूतावास के मुताबिक़ वहाँ फ़िलहाल 1300 भारतीय रहते हैं. वहीं आर्मीनिया के सरकारी अप्रवासन सेवा के मुताबिक़ क़रीब 3,000 भारतीय अभी आर्मीनिया में रहते हैं.

दोनों ही देशों के साथ भारत के अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन अज़रबैजान के मुक़ाबले पिछले कुछ सालों में आर्मीनिया और भारत के संबंधों में गर्मजोशी देखी गई है.

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1991 में सोवियत संघ के बिखराव तक आर्मीनिया इसका हिस्सा था. इसके बाद भी भारत के साथ आर्मीनिया के संबंधों में लगातार ताज़गी रही है. विदेश मंत्रालय के मुताबिक़ 1991 के बाद अब तक आर्मीनिया के राष्ट्रपति तीन बार भारत की यात्रा पर आ चुके हैं. आर्मीनिया के राष्ट्रपति की आख़िरी भारत यात्रा साल 2017 में हुई थी.

वहीं अज़रबैजान की बात करें, तो वो तुर्की की तरह कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान के पक्ष का समर्थन करता है. इससे अज़रबैजान को लेकर मौजूदा हालात में भारत की कूटनीतिक स्थिति में पर क्या कोई असर पड़ सकता है?

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज के चेयरपर्सन प्रोफेसर अश्विनी कुमार महापात्रा बताते हैं, "भारत की आधिकारिक स्थिति तो गुट निरपेक्षता की ही रहेगी. लेकिन अज़रबैजान के साथ देने का तो सवाल ही नहीं उठता है क्योंकि अज़रबैजान का मुख्य तौर पर समर्थक तुर्की है.''

'तुर्की और अज़ेरी (अज़रबैजान में रहने वाले) एक दूसरे को भाई-भाई समझते हैं. अज़ेरी अपने आप को मूल तौर पर तुर्की का ही मानते हैं. नस्लीय और भाषायी तौर पर वो एक ही है. इसलिए दोनों देशों के बीच ये रिश्ता दोस्ती से कहीं बढ़कर भाई वाला है."

वो आगे बताते हैं, "और जिस तरह से तुर्की हर जगह पर कश्मीर के मुद्दे पर भारत की आलोचना कर रहा है, तो इस हालात में शायद ही भारत अज़रबैजान का किसी भी तरह से साथ दे."

अज़रबैजान में रहने वाले भारतीयों पर असर

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आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच युद्ध में झोंके जा रहे युवाओं की कहानी

भारत के रुख़ का क्या वहाँ रहने वाले भारतीयों पर कुछ प्रतिकूल असर पड़ सकता है?

प्रोफेसर महापात्रा बताते हैं कि अभी तो ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि भारत सीधे तौर पर अब तक इस मामले में शामिल नहीं हुआ है. आम तौर पर वहाँ भारत की एक मेलजोल वाली छवि भी है. हिंदी सिनेमा भी वहाँ काफ़ी लोकप्रिय है.

किन हालात में हैं अज़रबैजान में भारतीय

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अज़रबैजान में रहने वाली ज़्यादातर भारतीय आबादी राजधानी बाकू में ही रहती है. अज़रबैजान में रहने वाले भारतीय डॉक्टर, टीचर या फिर बड़े पैमाने पर गैस और तेल कंपनियों में काम करते हैं.

डॉक्टर रजनी चंद्र डिमेलो की राजधानी बाकू में अपनी क्लिनिक है. वो आंध्र प्रदेश की विजयवाड़ा की रहने वाली हैं.

बीबीसी से बातचीत में वो बताती हैं, "भारतीयों के लिए ज़्यादा चिंता की बात नहीं है. जहाँ लड़ाई हो रही है, वो जगह राजधानी बाकू से क़रीब 400 किलोमीटर दूर है और ज़्यादातर भारतीय बाकू में ही रहते हैं. लेकिन अभी दो दिन पहले बाकू से क़रीब 60-70 किलोमीटर की दूरी पर नागरिक क्षेत्र में आर्मीनिया की तरफ से हमला हुआ था."

डॉक्टर रजनी बताती हैं कि भारतीय समुदाय के लोग वहाँ मदद के तौर पर ब्लड डोनेशन कैंप चला रहे हैं. वो पैसों से भी मदद करने की कोशिश कर रहे हैं.

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डॉक्टर रजनी कहती हैं कि आर्मीनिया की ओर से नागरिक क्षेत्रों में भी हमला हुआ है, लेकिन अज़रबैजान की ओर से नागरिक क्षेत्रों में हमले नहीं हो रहे हैं.

वो यह भी कहती हैं कि संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् के प्रस्ताव मुताबिक़ नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र अज़रबैजान का ही है और अपने ही क्षेत्र को लेने के लिए अज़रबैजानी ये लड़ाई लड़ रहे हैं.

डॉक्टर रजनी बताती हैं कि 18 साल की उम्र के बाद हर पुरुष अज़रबैजान में दो साल के लिए फ़ौज में भर्ती होता है. अभी युद्ध के समय तो आम नागरिक भी फ़ौज में भर्ती हो रहे हैं.

उनके पड़ोस में रहने वाले एक लड़के की भी ताज़ा लड़ाई में मौत हो गई, जिसे लेकर वो काफ़ी भावुक हैं.

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विवाद की वजह

नागोर्नो-काराबाख 4,400 वर्ग किलोमीटर में फैला इलाक़ा है, जहाँ आर्मीनियाई ईसाई और मुस्लिम तुर्क रहते हैं.

सोवियत संघ के समय यह अज़रबैजान के भीतर ही एक स्वायत्त क्षेत्र बन गया था.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे अज़रबैजान के हिस्से के तौर पर ही जाना जाता है, लेकिन यहाँ की अधिकतर आबादी आर्मीनियाई है.

1980 के दशक से अंत में शुरू होकर 1990 के दशक तक चले युद्ध के दौरान 30 हज़ार से अधिक लोगों को मार दिया गया और 10 लाख से अधिक लोग यहाँ से विस्थापित हुए.

उस दौरान अलगावादी ताक़तों ने नागोर्नो-काराबाख के कुछ इलाक़ों पर कब्ज़ा जमा लिया. 1994 में यहाँ युद्धविराम की घोषणा हुई थी, उसके बाद भी यहाँ गतिरोध जारी है और अक्सर इस क्षेत्र में तनाव पैदा हो जाता है.

ताज़ा विवाद की शुरुआत भी दोनों देशों की तरफ से एक-दूसरे हमला करने के दावे के साथ हुई. ताज़ा लड़ाई में अब तक 100 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.

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