प्रथम विश्व युद्ध के दौर की मौत की सुरंग को कैसे ढूँढा गया

  • ह्यूग स्कोफील्ड
  • बीबीसी न्यूज़, पेरिस
मौत की सुरंग

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1970 के दशक के बाद से फ़्रांस में प्रथम विश्व युद्ध से जुड़ी इतनी अहम खोज नहीं हुई है.

रीम्स शहर से कुछ दूर पर्वतश्रेणी के एक जंगल में 270 से ज़्यादा जर्मन सैनिकों के शव एक सदी से ज़्यादा वक़्त से दफ़न मिले. जिनकी मौत ऐसी भयानक परिस्थितियों में हुई, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती.

युद्ध की अव्यवस्था में भूला दिए गए इन सैनिकों की सही लोकेशन अब तक एक रहस्य थी. फ़्रांस और जर्मनी की सरकार को इस बारे में बताने की कोई जल्दबाज़ी भी नहीं थी.

लेकिन स्थानीय इतिहासकर पिता-पुत्र की एक जोड़ी की बदौलत चैमन डा डेम्स युद्ध-भूमि की विंटरबर्ग सुरंग के प्रवेश द्वार का पता चल सका.

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विंटरबर्ग सुरंग में जान गंवाने वाले 270 में से कुछ सैनिकों की पहचान की जा चुकी है

अब सवाल है कि आगे क्या करना होगा. क्या शवों को जल्दी से लाकर जर्मन क़ब्रिस्तान में दफ़ना दिया जाना चाहिए? क्या व्यापक स्तर पर पुरातात्विक खुदाई होनी चाहिए, ताकि युद्ध के तरीक़े और उसे लड़ने वाले लोगों की ज़िंदगियों के बारे में अधिक पता लगाया जा सके?

क्या एक स्मारक या म्यूज़ियम बनाया जाना चाहिए?

दोनों सरकारें अब भी विचार-विमर्श कर रही हैं, लेकिन अब ज़्यादा वक़्त नहीं है. क्योंकि अगर सैद्धांतिक रूप से सुरंग की लोकेशन अब भी रहस्य है, तो ये एक ऐसा रहस्य है जिसे बहुत बुरी तरह से छुपाया गया है.

जब कुछ दिन पहले मैं उस जगह गया, तो पता चला कि एक रात पहले वहाँ कुछ लुटेरे आए थे. प्रवेश द्वार के नज़दीक तीन मीटर गहरा एक गड्ढा खोदा गया था, और युद्ध के वक़्त की कुल्हाड़ियों, कुदाल और सुरंग बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें और गोलों का ढेर लगा हुआ था. वो इन्हें वहीं छोड़ गए थे.

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लुटेरों ने तीन मीटर तक खुदाई थी, लेकिन सुरंग इससे काफ़ी नीचे है

हमें एक इंसानी हड्डी भी दिखी, जो कुहनी की हड्डी थी.

लुटेरे सुरंग के अंदर नहीं जा पाए, जो काफ़ी गहरी है. उन्हें सिर्फ़ सुरंग पर फेंके गए विस्फोटकों के टुकड़े मिले, जिनकी वजह से ये सुंरग बंद हो गई थी.

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लुटेरों ने जो चीज़ें वहां से निकालीं

लेकिन सभी को लगता है कि वो वापस आएँगे, क्योंकि जो भी विंटरबर्ग सुरंग में सबसे पहले जाएगा, उसे ख़ज़ाना मिलेगा.

1917 के वसंत में फ़्रांस ने एन नदी के उत्तरी हिस्से से कुछ मील दूर एक पश्चिम-पूर्वी लाइन पर स्थिति पहाड़ियों को फिर से हासिल करने के लिए हमले शुरू किए थे. जर्मन सैनिकों ने चैमन डा डेम्स के नज़दीक की चोटी को दो साल से ज़्यादा वक़्त से अपने कब्ज़े में ले रखा था, और उन्होंने ज़मीन के नीचे अपने ठिकाना बनाया हुआ था.

खोनो गाँव के नज़दीक स्थित विंटरबर्ग सुरंग की लंबाई पहाड़ी के उत्तरी ओर से 300 मीटर थी, फ़्रांस इसे नहीं देख सकता था.

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युद्ध के वक़्त के एक जर्मन मैप में देखा जा सकता है कि सुरंग खोनो गांव के बिल्कुल बाहर थी

5 मई 1917 को फ़्रांस ने सुरंग के दोनों छोर को निशाना बनाते हुए बमबारी शुरू की, उन्होंने एक ऑब्ज़र्वेशन बलून भेजा, ताकि उत्तर की तरफ वाली ढलान को देख सके.

उनका एक निशाना एकदम सटीक लगा. एक नेवल गन से दागा गया शेल प्रवेश द्वार पर गिरा, इससे वहाँ रखे गए गोला-बारूद में भी धमाके हो गए और शाफ्ट से तेज़ धुएँ का गुबार निकला. दूसरे शेल से बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया.

अंदर 111वीं रिज़र्व रेजिमेंट की 10वीं और 11वीं कंपनियों के लोग फँसे हुए थे. अगले छह दिनों में ऑक्सीजन ख़त्म हो गई, या तो उनका दम घुट गया या उन्होंने ख़ुद अपनी जान ले ली. कुछ ने कॉमरेडों को आत्महत्या कर लेने को कहा.

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

बात सरहद पार

समाप्त

अपनी सहनशक्ति की बदौलत तीन आदमी ज़्यादा दिन तक ज़िंदा रहे और बचाव दल ने उन्हें बाहर निकाल लिया. उन्हें फ्रांस के लिए छोड़ देने के बिल्कुल एक दिन पहले निकाला गया. कार्ल फिशर ने आपबीती बताई:

"हर कोई पानी मांग रहा था, लेकिन सब बेकार था. इसलिए कोई वहाँ से नहीं निकल सका. कोई बचाव के लिए पागलों की तरह चिल्ला रहा था, कोई पानी माँग रहा था. एक कॉमरेड ज़मीन पर मेरे पास लेटा था और बिखरी आवाज़ में कह रहा था कि कोई मेरी पिस्तौल में गोलियाँ भर दो."

जब फ़्रांस ने पर्वतश्रेणी को अपने नियंत्रण में लिया, तो सुरंग के बाहर हर तरफ़ तबाही का मंज़र था. सुरंग की खुदाई उनकी प्राथमिकता नहीं थी, इसलिए उन्होंने इसे छोड़ दिया. जर्मनी ने बाद में भी चैमन डा डेम्स को अपन नियंत्रण में लिया था, लेकिन उस वक़्त उनके पास भी शवों को ढूँढने का वक़्त नहीं था.

युद्ध के अंत तक कोई भी ठीक-ठीक नहीं बता सकता था कि विंटरबर्ग सुरंग असल में कहाँ थी. अंदर फ़्रांस के सैनिकों के शव नहीं थे, इसलिए उन्हें वहीं छोड़ देने का फ़ैसला किया गया. अब भी पश्चिमी मोर्चे पर अनगिनत लापता शव पड़े हुए हैं.

वहाँ पेड़ दोबारा उग आए और अब लोग वहाँ अपने कुत्ते घुमाने के लिए आते हैं.

लेकिन एलेन मालिनोवस्की नाम के एक स्थानीय के दिमाग़ से सुरंग कभी नहीं निकल सकी. उनके दिमाग़ में हमेशा रहा कि सुरंग पर्वतश्रेणी में कहीं ना कहीं ज़रूर होगी.

1990 के दशक में पेरिस मेट्रो के लिए काम करते हुए वो रोज़ राजधानी जाया करते थे और वक़्त निकालकर शेतू दे वेंकसेने के सैन्य अभिलेखागार भी जाया करते थे. 15 साल तक उन्होंने डिसक्रिप्शन और नक्शे जमा किए, साथ ही क़ैदियों से पूछताछ की. लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. बमबारी की वजह से वो जगह इस तरह तबाह हो चुकी थी कि उसको ढूँढना आसान नहीं था.

2009 में उन्हें एक समकालीन नक्शा मिला, जिसमें सिर्फ़ सुरंग ही नहीं दिख रही थी बल्कि एक बिंदु पर मिलने वाले दो रास्ते भी थे, जो आज भी वहीं हैं. उस नक्शे को देखते हुए उन्होंने एंगल और दूरी नापकर वो जगह ढूँढ ही ली.

एलेन मालिनोवस्की ने एक फ़्रेंच अख़बार से कहा, "मैंने उसे महसूस किया. मैं जानता था कि मैं नज़दीक ही हूँ. मैं जानता था कि सुरंग मेरे पैर के नीचे ही कहीं है."

10 साल तक कुछ नहीं हुआ. उन्होंने प्रशासन को अपनी खोज के बारे में बताया, लेकिन प्रशासन ने इसपर काम करने से इनकार कर दिया, शायद क्योंकि उन्होंने एलेन पर भरोसा नहीं किया या क्योंकि वो सामूहिक युद्ध क़ब्र को खोदना नहीं चाहते थे.

इसके बाद कहानी में उनके 34 साल के बेटे पियरे मालिनोवस्की ने क़दम रखा. वो एक पूर्व सैनिक हैं और अब मॉस्को में नेपोलियन और अन्य युगों के युद्ध में मारे गए सैनिकों के बारे में पता लगाने के लिए काम करने वाली एक संस्था चलाते हैं.

अधिकारियों के रवैए से नाराज़ पियरे ने फ़्रांस और जर्मन सरकार पर दबाव बनाने के लिए ख़ुद ही सुरंग खोलने का फै़सला किया. ये ग़ैर-क़ानूनी था, लेकिन उन्हें लगा कि इसके लिए सज़ा भी मिले, तो चलेगा.

बीते साल जनवरी की एक रात वो एक टीम लेकर उस जगह पहुँचे, जिसकी पहचान उनके पिता ने की थी. उनके पास ज़मीन खोदने वाली मशीनें भी थीं. उन्होंने चार मीटर तक खुदाई की और उन्हें जो मिला उससे साबित हो गया कि वो सुरंग के प्रवेश द्वार पर हैं.

वहाँ एक घंटी थी, जिसे अलार्म बजाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था. सैकड़ों गैस-मास्क कनस्तर, युद्ध-सामग्री लाने के लिए रेलें, दो मशीन गन, एक राइफल, बेनट और शवों के अवशेष.

टीम के एक सदस्य ने कहा, "हर चीज़ वहीं के वहीं थी."

पियरे मालिनोवस्की ने फिर गड्ढे को ढँक दिया, ताकि किसी को पता ना चले. इसके बाद उन्होंने प्रशासन से संपर्क किया. 10 महीने बाद प्रशासन के ढीले रवैए से दोबारा तंग आकर उन्होंने इसे सार्वजनिक कर दिया और एक फ़्रेंच अख़बार को सबकुछ बता दिया.

कुछ लोगों का मानना है कि उन्होंने सिर्फ़ क़ानून नहीं तोड़ा. बल्कि उस तर्क को भी किनारे कर दिया कि मर चुके लोगों को वहीं रहने देना चाहिए, जहाँ वो हैं. साथ ही उन्होंने सरकार पर भी दबाव बनाया कि या तो वो सुरंग को खोलें या कम से कम उसे संरक्षित करें.

उनके उदाहरण को देखकर कई और लोगों ने भी इस तरह की खुदाइयाँ की. जिनमें से अधिकतर सिर्फ़ भावनात्मक मक़सद से की गई थी.

ये स्पष्ट है कि अधिकारी जाँच आगे नहीं बढ़ाना चाहते हैं. जर्मन वार ग्रेव कमिशन (वीडीके) की प्रवक्ता डायने टेम्पेल-बार्नेट ने जर्मन रेडियो से कहा, "सच कहें तो हम इस खोज से बहुत ज़्यादा उत्साहित नहीं हैं. असल में हम इसे बहुत दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं."

ये सोचना मुश्किल है कि अगर 270 ब्रितानी सैनिकों के शव मिलते, तो कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव कमिशन ऐसी बात कहता? लेकिन जर्मनी अक्सर प्रथम विश्व युद्ध को अपने एक "भूला दिए गए युद्ध" के तौर पर बताता है.

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भारी बमबारी के दौरान विंटरबर्ग सुरंग की ये तस्वीर ली गई थी

दरअसल सुरंग में मारे गए सैनिकों के वंशजों को ढूँढने के लिए कोशिशें की जा रही हैं और उनमें कुछ सफलता भी मिली है.

111वीं रेजिमेंट ने स्वाबियाई आल्प्स के बाडेन क्षेत्र से नियुक्तियाँ की थीं, और अब नौ सैनिकों की पहचान कर ली गई है, जिनकी मौत 4 और 5 मई 1917 को हुई थी.

वंशविज्ञानी और ग्रेट वॉर के रिसर्चर मार्क बेयरर्ट कहते हैं, "अगर मैं एक भी परिवार की सुरंग में मारे गए उनके पूर्वज का पता लगाने में मदद कर पाता हूँ, तो ये बड़ी बात होगी."

"मैं उम्मीद कर रहा हूँ कि शवों को बाहर निकाला जाए और उनके डॉग-टैग से उनकी पहचान की जाए. इससे होगा ये कि वो इस अनचाही क़ब्र को छोड़कर वो एक साथ कॉमरेड की तरह दफ़नाए जा सकेंगे."

1973 में मिले 400 से ज़्यादा जर्मन सैनिकों के साथ भी ऐसा ही किया गया था, जो रीम्स के मॉन्ट कॉर्निलेट पूर्व में ऐसी ही एक सुरंग में मारे गए थे.

पियरे मालिनोवस्की ये भी चाहते हैं कि इन लोगों को पूरा सम्मान दिया जाए. वो कहते हैं, "ये किसान, हेयरड्रेसर, बैंक-क्लर्क थे, जो युद्ध लड़ने के लिए आए थे, और उनकी जान इस तरह गई कि हम समझ भी नहीं सकते."

वो मानव अवशेषों के प्रति सम्मान को लेकर गंभीर हैं. जो शव उन्हें मिले, उन्होंने उन्हें दोबारा ग्राउंड पर पहुँचा दिया और वो उनकी तस्वीरें नहीं लेने देते हैं. लेकिन सैनिक के प्रति एकजुटता की भावना के साथ-साथ उनके लिए एक दिलचस्पी भी बनी हुई है.

"शवों को संरक्षित किया जाएगा, उन्हें त्वचा, बाल और वर्दी के साथ ममी की तरह रखा जाएगा."

"याद करिए सुरंग वहीं थी, जहाँ सैनिक रोज़ रहा करते थे, इसलिए उनकी सब चीज़ें वहीं होंगी. हर सैनिक की एक कहानी होगी. ये प्रथम विश्व युद्ध के वक़्त का लोगों का मिला सबसे बड़ा भंडार होगा."

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