चीन की 'देशभक्ति योजना': क्या हांग कांग में सब कुछ बदल जाएगा?

हांग कांग और चीन का झंडा

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हांग कांग और चीन का झंडा

हांग कांग पर शिकंजा कसने की कोशिश में चीन यहां के निर्वाचन संबंधी नियमों में बदलाव करने जा रहा है.

इन बदलावों को 'पैट्रियोटिक प्लान' यानी 'देशभक्ति योजना' कहा जा रहा है.

चीन का कहना है कि उसका उद्देश्य हांग कांग की राजनीति में 'देशभक्तों' को आगे बढ़ाना और 'ग़ैर राष्ट्रवादियों' को दूर रखना है.

वहीं, आलोचकों का मानना है कि इसके ज़रिए यहां विपक्ष का पूरी तरह सफाया कर दिया जाएगा और ये हांग कांग में गणतंत्र को नष्ट करने जैसा होगा.

क्या है इसकी पृष्ठभूमि?

हांग कांग कभी ब्रिटेन का उपनिवेश हुआ करता था. साल 1997 में ब्रिटेन ने 'एक देश और दो प्रणाली' समझौते के तहत इसे चीन को सुपुर्द किया. ये समझौता हांगकांग को वो आज़ादी और लोकतांत्रिक अधिकार देता है, जो चीन की मुख्यभूमि के लोगों को हासिल नहीं हैं.

इसके तहत यहां लोगों को मिलने और इकट्ठा होने की आज़ादी, अभिव्यक्ति की आज़ादी और स्वतंत्र न्याय व्यवस्था जैसे गणतांत्रिक अधिकार दिए गए.

ये अधिकार हांगकांग के उस छोटे-से संविधान 'मिनी कॉन्स्टीट्यूशन' यानी क़ानूनों का हिस्सा बने जो यहां साल 2047 तक लागू रहना था.

11 मार्च को चीन की नीतियां तय करने वाली मुख्य संस्था नेशनल पीपल्स कांग्रेस ने 'पैट्रियोट गवर्निंग हांग कांग' नाम का एक नया प्रस्ताव पास किया. इसके ज़रिए अब चीन यहां के क़ानूनों में बदलाव कर सकता है.

नेशनल पीपल्स कांग्रेस की स्थायी समिति ने ये प्रस्ताव 30 मार्च को पारित कर दिया है जिसके बाद इसे कुछ सप्ताह के भीतर हांग कांग में लागू किया जा सकता है.

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हांग कांग के लोकतंत्र पर चीन ने कसा 'शिकंजा'

कैसे काम करेगा ये क़ानून?

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हांग कांग की संसद, द लेजिस्लेटिव काउंसिल के लिए सद्स्यों का चुनाव समिति करती है.

ये एक ताकतवर संस्था है जो अब तक शहर की सबसे वरिष्ठ अधिकारी को यहां के चीफ़ एक्सीक्यूटिव के तौर पर चुनती है.

चुनाव समिति में फिलहाल 1,200 सदस्य होते हैं. नए 'पैट्रियोटिक प्लान' के तहत इस चुनाव समिति के सदस्यों की संख्या में 300 और सदस्य जोड़े जाएंगे जिसके बाद इसमें 1,500 सदस्य होंगे.

किसी भी संभावित सांसद, चुनाव समिति के सदस्य या फिर चीफ़ एक्सीक्यूटिव पद के उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगाने का काम एक अलग स्क्रीनिंग कमिटी करेगी.

इस प्रक्रिया के ज़रिए चीन की आलोचना करने वालों को अहम पदों पर पहुँचने से रोकना आसान हो जाएगा.

द लेजिस्लेटिव काउंसिल में भी बदलाव किये जाएंगे ताकि संसद में सीधे चुनकर आने वाले सदस्यों का प्रभाव कम हो जाए.

काउंसिल में कुल सीटों की संख्या को 70 से बढ़ाकर 90 तक किया जाएगा, लेकिन संसद में सीधे चुनकर आने वाले सदस्यों की मौजूदा संख्या में लगभग 50 प्रतिशत की कटौती कर इसे 35 से 20 कर दिया जाएगा.

इनमें 40 सांसद वो होंगे जिन्हें चुनाव समिति चुनेगी, व्यापार, बैंकिंग और व्यवसाय के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में से 30 सांसद चुने जाएंगे. माना जा रहा है ये वो लोग होंगे जो चीन की नीतियों के समर्थन में होंगे.

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साल 2019 में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हुईं

क्यों लागू किया जा रहा है ये क़ानून?

हाल में हुए घटनाक्रम को देखते हुए माना जा रहा है कि चीन, हांग कांग पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाना चाहता है.

साल 2019 में हांग कांग में बज़े पैमाने पर गणतंत्र के समर्थन में रेलियां हुई थीं. कुछ रैलियों में हिंसा भी हुई थी. इस साल जब स्थानीय डिस्ट्रिक्ट काउंसिल चुनाव हुए उनमें गणतंत्र का समर्थन करने वाले कार्यकर्ताओं को बड़ी जीत मिली.

इसके बाद साल 2020 में चीन ने हांग कांग को लेकर विवादित राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून पास किया. इसके ज़रिए हांग कांग की स्वायत्तता को कम कर चीन के आलोचकों को सज़ा देना आसान बना दिया गया.

इस क़ानून के तहत संबंध तोड़ने यानी चीन से अलग होने, केंद्रीय सरकार के शासन को न मानने या उसकी ताकत को कमज़ोर करने की कोशिश करने, आतंकवाद या लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा करने या फिर उन्हें डराने धमकाने और विदेशी ताकतों से सांठगांठ करने को अपराध की श्रेणी में रखा गया.

इसमें ये भी प्रावधान था कि चीन, हांग कांग में एक नया राष्ट्रीय सुरक्षा कार्यालय बनाएगा, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के ख़िलाफ़ ख़ुफ़िया जानकारी इकट्ठा करेगा और यहां होने वाले "अपराधों को देखेगा."

इस क़ानून के तहत दर्जनों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया गया है.

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चुनावी व्यवस्था में बदलाव से संबंधित प्रेस कॉन्फ्रेस में हांग कांग की चीफ़ एक्सीक्यूटिव कैरी लैम

नवबंर 2020 में कई नेताओं को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा मानते हुए पद से बर्खास्त कर दिया गया. इसके बाद देश के कई गणतंत्र समर्थक नेताओं ने अपने इस्तीफ़े सौंप दिए.

चीन के इस कदम की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आलोचना की गई है.

ब्रितानी सरकार ने कहा है कि इस तरह के बदलाव लाकर चीन 'एक देश और दो प्रणाली' समझौते की अवमानना कर रहा है. लेकिन चीन का कहना है कि वो अपनी संप्रभुता की रक्षा कर रहा है.

हांग कांग के मसले को लकर चीनी प्रधानमंत्री ली केचियांग पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि हांगकांग के मसलों में दखल देने वाली बाहरी ताकतों से चीन पूरी दृढ़ता से निपटेगा.

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