वो कौन हैं जो बन जाते हैं 'जिहादी'?- दुनिया जहान

  • टीम बीबीसी हिन्दी
  • नई दिल्ली
सोमालिया की राजधानी मोगादिशु में हुए धमाके के बाद की तस्वीर

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वो साल 2016 के अप्रैल का महीना था.

जगह थी सोमालिया की राजधानी मोगादिशु. चरमपंथी संगठन अल शबाब का एक सदस्य विस्फोटक से भरी कार लेकर एक रेस्तरां में दाखिल हो गया. वहाँ हुए धमाके में पाँच लोगों की मौत हो गई.

उसी दिन अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के एक आत्मघाती हमलावर ने अपनी मोटर बाइक से एक बस को निशाना बनाया. ज़ोरदार धमाका हुआ और 12 लोगों की मौत हो गई.

लगभग तभी सीरिया से लेकर पाकिस्तान और लीबिया तक में हमले हुए. इन सभी हमलों में 'हिंसक जिहादियों' का हाथ बताया गया.

हर हमले के बाद एक ही सवाल पूछा गया- आख़िर वो किस तरह के लोग होते हैं, जो इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते हैं?

दुनिया भर के तमाम विश्लेषक दशकों से इस सवाल की पड़ताल में जुटे हैं.

वो जानना चाहते हैं कि किसी की शख़्सियत में ऐसी क्या बात होती है कि वो 'जिहादी' बन जाता है.

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मनोरोगी होते हैं 'जिहादी'?

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

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समाप्त

ब्रिटेन में अपराध शास्त्र के प्रोफ़ेसर एंड्रूयू सिल्क आतंकवादियों के मनोविज्ञान को लेकर दुनिया के कई देशों की सरकारों को सलाह दे चुके हैं. एंड्रयू बताते हैं कि 1970 के दशक में चरमपंथ से जुड़ी घटनाएँ अचानक बढ़ गईं थीं और तमाम लोग एक ही सवाल पूछ रहे थे कि ये लोग ऐसा क्यों करते हैं?

वो कहते हैं कि ऐसे सवालों के बीच ही ये सोच बनने लगी कि आतंकवादी बाक़ी लोगों के मुक़ाबले अलग होते हैं. उनकी शख्सियत अलग होती है और वो मनोविकार से जूझ रहे होते हैं. एंड्रयू के मुताबिक़ इस तरह की बातों का स्रोत मनोचिकित्सक थे, लेकिन उनके पास ऐसे दावों की पुष्टि करने वाले सबूतों की कमी थी.

इस मामले में शोध कर रहे लोगों के पास भी जानकारियाँ बहुत कम थी और वो आतंकवादियों की आत्मकथाओं और मीडिया में आए उनके इंटरव्यू से काम चला रहे थे. इस दौरान वो दिमाग़ी बीमारी का पहलू भी देखने लगे.

1970 के सबसे कुख्यात चरमपंथी गैंग्स में से एक था वेस्ट जर्मन बाडर माइनहॉफ गैंग. एक वक़्त इसके नेता थे एंड्रेस बाडर, जो शोध करने वालों के लिए एक प्रिय विषय की तरह थे. एक शोधार्थी की राय में वो मनोरोगी थे. इसका आधार बाडर के बारे में अख़बारों में छपे कुछ लेख थे.

एंड्रयू सिल्क बताते हैं, "ये कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं थी, लेकिन कई लोगों को ऐसी बात तर्कसंगत लगती थी कि किसी अनजान आदमी की जान लेने के लिए आपके अंदर पागलपन होना चाहिए."  

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सही जानकारी का अभाव

इसका एक पक्ष ये भी है कि अगर आतंकवादी पागल है, तो माना लिया जाता है कि दिक़्क़त पर काबू किया जा सकता है. आपको ये फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं है कि कोई आम आदमी आतंकवादी बन जाएगा. ऐसी स्थिति में ये दिमाग़ से जुड़ी समस्या बन जाती है राजनीतिक नहीं.

प्रामाणिक सबूत नहीं होने के बाद भी इस बारे में किए गए शुरुआती अध्ययन के नतीजों पर सरकारों ने गौर किया और अख़बारों ने उन्हें लेकर ख़बरें छापीं. लेकिन हक़ीक़त ये थी कि आतंकवादियों के बारे में अध्ययन करना आसान नहीं था.

एंड्रयू सिल्क कहते हैं, "ये बहुत मुश्किल काम था. गंभीर अपराध को लेकर अध्ययन करना हो, तो सशस्त्र डकैती और हत्याओं के रिकॉर्ड बड़ी संख्या में मिल जाएँगे, लेकिन आतंकवादियों के बारे में बहुत कम जानकारियाँ हैं. उन तक पहुँचना भी मुश्किल है."

वक़्त बदला और 1980 के दशक की शुरुआत में शोध करने वालों ने चरमपंथियों के साथ वक़्त बिताना शुरू किया. वो जेल में उनसे मुलाक़ात करने लगे और घंटों-घंटों बातें करने लगे.

ऐसा करते हुए शोधकर्ताओं ने पाया कि सरकारें और इस मामले में अध्ययन करने वाले लोग आतकंवादियों को लेकर जो सोचते हैं, उनमें से ज़्यादातर बातें सही नहीं हैं. सारे आतंकवादी मनोरोगी नहीं हैं.

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क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

एंड्रयू कहते हैं कि इसके बाद आतंकवादियों की शख़्सियत और उनके मानसिक तौर पर बीमार होने जैसी धारणाएँ धुंधली पड़ने लगीं. मनोविज्ञान के एक प्रोफ़ेसर ने बंदी बनाए गए 11 आतंकवादियों से बात की.

उनकी राय थी कि उन्हें ऐसा कुछ नहीं मिला जिसके आधार पर आतंकवादियों को मनोरोगी कहा जाए. जब दो जानकारों ने उत्तरी आयरलैंड में आतकंवादियों द्वारा की गई हत्याओं की तुलना ग़ैर राजनीतिक हत्याओं से की, तो उन्होंने पाया कि आतंकवादियों की मनोस्थिति हत्या करने वाले दूसरे लोगों से बेहतर थी.

एंड्रयू सिल्क कहते हैं, "ये नहीं कहा जा सकता है कि जिन लोगों की मानसिक स्थिति ठीक नहीं होती है, वो चरमपंथी समूह में शामिल नहीं होते हैं. ऐसे सबूत है कि वो भी अलग-अलग तरह की भूमिकाएँ निभाते हैं, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है."

अब सवाल है कि अगर सारे 'जिहादी' मनोरोगी नहीं हैं, तो उन्हें लेकर जो सबूत मिले हैं, वो क्या कहते हैं?

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तालमेल की कमी

आंतकवाद से जुड़े मामलों में विशेषज्ञता को लेकर दुनिया भर में मशहूर मनोचिकित्सक मार्क सेजमैन ने हिंसा में शामिल रहे 'जिहादियों' के साथ वक़्त बिताया है. 1980 के दशक में उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में सीआईए के लिए काम किया. तब वो सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ रहे मुसलमान 'जिहादियों' का समर्थन कर रहे थे.

उसके बाद वो अमेरिकी सरकार के ख़ुफ़िया मामलों से जुड़े सलाहकार बन गए. वो 11 सितंबर 2001 को अमेरिका में हुए हमले के बाद आए बदलावों को बख़ूबी जानते हैं.

मार्क सेजमैन बताते हैं, "इस हमले के बाद पूरा देश एक नई स्थिति के लिए तैयार होने लगा. तब राष्ट्रवादी नौजवानों की तलाश की जा रही थी, जो देश के लिए कुछ कर सकें. इसी दौरान सरकार जानकारों को इस दुश्मन को बेहतर तरीक़े से समझने के काम में लगाना चाहती थी. हर किसी के लिए ये समझना मुश्किल है कि क्यों कुछ लोग अपनी जान देकर तीन हज़ार लोगों को मारने की कोशिश करते हैं."

सेजमैन कहते हैं कि इस काम में रकम तो ख़ूब झोंकी गई लेकिन नतीजे माकूल नहीं मिले. वो बताते हैं कि तमाम ऐसे लोग, जिन्हें आतंकवादियों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, उन्हें भी हिस्सेदारी मिली. इसका नतीजा ये हुआ कि अटकलबाज़ी तो ख़ूब हुई, लेकिन कोई ठोस आँकड़े नहीं मिले.

2003 में अमेरिकी सरकार ने आतंकवाद से जुड़े मामलों के विशेषज्ञों की एक आंतरिक टीम तैयार करने का फ़ैसला किया. शोध के लिए नए लोगों को सीधे यूनिवर्सिटी स्तर से भर्ती किया गया.   

मार्क सेजमैन बताते हैं, "स्थिति ये थी कि ख़ुफिया विभाग के विश्लेषकों के पास जानकारी तो तमाम थी, लेकिन उन्हें समझ कुछ नहीं आता था. वहीं जो विद्वान इस काम में जुटे थे, उनके पास सबकुछ समझने का तरीक़ा और काबिलियत थी, लेकिन दुर्भाग्य से उनके पास कोई तथ्य यानी जानकारी नहीं थी."

कट्टर होते हैं आतंकवादी?

इनमें से किसी भी पक्ष को ये भी पता नहीं था कि दूसरा पक्ष क्या कर रहा है. सेजमैन ऐसे सम्मेलनों में गए, जहाँ शिक्षा जगत से जुड़े विद्वान सरकारी विश्लेषकों के सामने प्रेजेंटेशन दे रहे थे.

वो बताते हैं कि वहाँ सरकारी लोग कोई सवाल नहीं पूछ सकते थे. डर ये था कि अगर वो कोई सवाल पूछते हैं, तो ख़ुफिया जानकारी बाहर आ सकती है. आँकड़े कमज़ोर थे, तो इसका असर विश्लेषण और शोध पर हुआ. प्रामाणिक जानकारी के अभाव में आतंकवादियों को लेकर नई परिकल्पना सामने आईं कि वो सब धार्मिक विचारधारा से प्रेरित हैं.

मार्क सेजमैन कहते हैं, "आतंकवादियों को लेकर ये बताया गया कि जो इस्लाम को लेकर जितना ज़्यादा आस्थावान है, उनके किसी चरमपंथी घटना को अंजाम देने की संभावना उतनी ज़्यादा है, जबकि हक़ीक़त में मामला ऐसा नहीं था."

सरकारें आंतकवाद रोकने के लिए तमाम रणनीति ये सोचते हुए बनाती हैं कि आतंकवादी धार्मिक तौर पर कट्टर होते हैं. लेकिन मार्क सेजमैन और आतंकवादियों के साथ वक़्त बिताने वाले तमाम दूसरे विशेषज्ञों की राय है कि ये सच नहीं है. वो सभी मजहबी तौर पर कट्टर नहीं हैं.

मार्क सेजमैन कहते हैं कि तमाम दूसरे लोगों की तरह आतंकवादियों को भी किसी खाँचे में नहीं बांधा जा सकता है. आतंकवादी वो व्यक्ति है, जिससे समुदाय को ख़तरा है और कोई भी आतंकवादी हो सकता है.

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क्या कहते हैं आतंकवादी?

नफ़ीस हमीद नए दौर के शोधकर्ता हैं और सोशल मीडिया के ज़रिए लगातार आतंकवादियों के संपर्क में रहते हैं.

वो बताते हैं, "मैंने सीरिया में उन लोगों से बात की है, जो अल नुसरा और इस्लामिक स्टेट के सदस्य रहे हैं. मैंने उनसे स्काइप और दूसरे मैसेजिंग ऐप के ज़रिए बात की है." 

नफ़ीस ने बताया कि आतंकवादियों से बात करते समय वो उनसे आम सवाल पूछते हैं. मसलन 'आपका बैकग्राउंड क्या है. अपने परिवार के बारे में बताइए. क्या बचपन में आपको लगता था कि आपको कोई अहमियत नहीं दी जा रही है.'

नफ़ीस की भी राय है कि ये नहीं कहा जा सकता है कि आतंकवादियों की शख़्सियत दूसरों से अलग होती है. लेकिन कुछ स्थितियों को लेकर सवाल बने रहते हैं. 

बेल्जियम के मोलेनबीक उपनगर को 'जिहादियों का स्वर्ग' कहा जाता है.

नफ़ीस कहते हैं, "ऐसी बातें करने की एक प्रवृति बन गई है. तमाम आलेखों में पूछा जाता है कि मोलनबीक में दिक़्क़त क्या है? क्या वहाँ के माहौल में कुछ ऐसा है कि लोग कट्टर बन जाते हैं? इन सवालों के बाद आप वहाँ के सामाजिक और आर्थिक हालात पर गौर करने लगते हैं. आप देखते हैं कि क्या वहाँ किसी की उपेक्षा की जा रही है? क्या वहाँ कोई हेट क्राइम हो रहा है? आप सभी तरह के मुद्दों पर गौर करते हैं. लेकिन आपको समझना होगा कि दूसरे देशों में भी ऐसे ही इलाक़े हैं, लेकिन वहाँ लोगों के विचारों में कट्टरपन हावी होता नहीं दिखता हैं. ऐसे में मुझे नहीं लगता कि माहौल अपने आप में लोगों को इस दिशा में धकेलता है."

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'हर वर्ग से आते हैं जिहादी'

नफ़ीस कहते हैं कि सामाजिक परिवेश और आतंकवादियों को जोड़कर नहीं देखा जा सकता है. 'हिंसा करने वाले जिहादी' अमीर, ग़रीब, मध्यवर्ग, कामकाजी वर्ग, अच्छे ख़ासे पढ़े लिखे या फिर कम पढ़े, कैसे भी हो सकते हैं. अगर आप कथित इस्लामिक स्टेट में शामिल होने वाले लड़ाकों को देखते हैं, तो उनके तर्क में दम नज़र आएगा.

नफ़ीस हमीद कहते हैं, "यूरोप के लोगों को आम तौर पर ऐसे तैयार किया जाता है कि वो ख़ुद को किसी मक़सद के लिए लड़ने वाला योद्धा मान लेते हैं. जब मैंने उनका इंटरव्यू किया, तो उन्होंने कहा कि वो पूरी दुनिया में शरिया लागू करना चाहते हैं. लेकिन वो ये नहीं बता सके कि शरिया क्या है? पूछने पर उन्होंने गूगल से जानकारी जुटाई और कट, कॉपी, पेस्ट करके मुझे भेज दिया.?"

लेकिन जब नफ़ीस हमीद के साथी इराक़ गए और वहाँ पकड़े गए आईएस के लड़ाकों से बात की, तो उन्होंने अपने 'जिहादी' बनने के बिल्कुल अलग कारण बताए.  

नफ़ीस हमीद बताते हैं, "वहाँ ऐसे लोग मिलते हैं, जिनके लिए आर्थिक कारण अहम हैं. वो किसी विचारधारा से प्रेरित नहीं हैं. इस्लामिक स्टेट जैसे समूह उन्हें नौकरी की पेशकश करते हैं. उनसे स्थिरता और सुरक्षा का वादा किया जाता है. ये एक प्रस्ताव था और उन्होंने इसे मंज़ूर कर लिया."

अमेरिका के अटलांटा में रहने वाले मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर जॉन हॉर्गन कहते हैं कि आतंकवादी हमलों को अंजाम देने वाले लोग किस तरह के होते हैं, ये सवाल अगर उनसे पूछा जाता है तो वो कहते हैं, "हम नहीं जानते." वो कहते हैं कि कोई भी इस बारे में पुख़्ता तौर पर कुछ नहीं कह सकता. 40 साल से इस मामले में हुई रिसर्च यही बताती है.

यही नहीं, जॉन हॉर्गन ये भी कहते हैं कि अगर आप किसी आतकंवादी से ये रास्ता चुनने की वजह पूछते हैं, तो उनके जवाब अलग-अलग समय अलग-अलग हो सकते हैं.

जॉन हॉर्गन की राय है, "किसी आदमी की ख़ुद को लेकर राय बदलती रहती है और ये आम बात है. मैंने पाया कि कुछ ऐसे लोग, जिनका मैंने करीब एक दशक पहले इंटरव्यू किया था, उनसे जब दूसरे लोगों ने बात की, तो उन्होंने उन्ही सवालों के अलग जवाब दिए. ये कोई असामान्य बात नहीं है. ये हो सकता है कि ख़ुद को लेकर उनकी समझ वक़्त के साथ बदल रही हो. या हो सकता है कि वो एक और इंटरव्यू देने को लेकर ऊब हो गए हों."

यानी अगर आपको 'जिहादियों' से बात करने का मौक़ा मिल भी जाए, तो भी वो आपके सवालों के जो जवाब देंगे, उसमें सच्चाई कितनी है, ये बात भरोसे के साथ नहीं कही जा सकती है.    

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सही जवाब की तलाश

जॉन हॉर्गन कहते हैं, "आतंकवाद से जुड़ी कहानी में विविधता दिखती है. यहाँ नौजवान हैं, बूढ़े हैं, महिलाएँ हैं और पुरुष हैं. अब तो इस्लामिक स्टेट जैसे संगठनों में बच्चे और पूरा परिवार ही शामिल होने लगा है. 10 साल या पाँच साल पहले हमें जो कहानी सुनने को मिलती थी, वो आज की दास्ताँ से बिल्कुल अलग हो सकती है." 

ऐसी स्थिति में क्या हमें पहचान से जुड़ा सवाल छोड़ देना चाहिए. इस पर जॉन हॉर्गन कहते हैं, "हक़ीक़त में इसका जवाब नहीं दिया जा सकता है. अगर आतंकवाद से जुड़े मामलों के 10 विशेषज्ञों से बात की जाए, तो संभावना इस बात की है कि आपको एक ही मामले में छह या सात तरीक़े के जवाब मिलें. मेरी राय में अगर आपको विश्वसनीय जानकारी चाहिए, तो आपको पूछना होगा कि लोग इसमें शामिल कैसे होते हैं. टेररिस्ट साइकॉलजी में वैज्ञानिक पहल के दौरान ये पहला क़दम है." 

अब तक आप पूछते रहे हैं क्यों? इस सवाल को भूल जाइए. ये भी मत पूछिए कि किस तरह के इंसान ऐसा करते हैं. इसकी जगह पूछिए कि कैसे? आखिर कैसे लोग इसमें शामिल होते हैं? कैसे कोई शख़्स हिंसा करने वाला 'जिहादी' बन जाता है?

हमारे चारों विशेषज्ञों की राय है कि ये सवाल पूछने पर आपको सही जवाब मिल जाएगा.

वो मानते हैं कि शख़्सियत को लेकर सवाल करने से सही जवाब नहीं मिलेगा. बात प्रक्रिया की करनी होगी. इस बीच अगर भविष्य में कहीं आतंकवादी हमला होता है और ये पूछा जाता है कि किस तरह के लोग ऐसा करते हैं, तो आपको मालूम है कि हमारे विशेषज्ञ क्या कहेंगे. वो कहेंगे कि ऐसा कोई भी कर सकता है.

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