अफ़ग़ानिस्तान की बिसात पर कहां खड़े हैं अमेरिका, चीन, रूस, ईरान और पाकिस्तान

  • नोर्बेर्टो पारेडेस
  • बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड
अफ़ग़ानिस्तान

इमेज स्रोत, Getty Images

अफ़ग़ानिस्तान एक ज़माने से विदेशी ताक़तों के लिए मैदान-ए-जंग रहा है, जहां वे अपनी ताक़त आजमाते रहे हैं.

19वीं सदी में मध्य एशिया पर नियंत्रण के लिए ब्रिटेन और रूस की दुश्मनी जिसे 'द ग्रेट गेम' भी कहा जाता था. उस ग्रेट गेम का ये मुल्क गवाह रहा है.

लेकिन दो सौ साल बाद अफ़ग़ानिस्तान एक बार फिर भयावह दौर से गुजर रहा है और शायद पहले से कहीं ज़्यादा.

जिस लम्हे अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू की, उसी घड़ी से तालिबान ने अपने आगे बढ़ने की रफ़्तार तेज़ कर दी.

और इस रविवार को राष्ट्रपति ग़नी के पतन के साथ ही तालिबान के लड़ाके राजधानी काबुल में दाखिल हो गए.

ये तालिबान इस्लाम के शरिया क़ानून को मानता है, अपने इलाकों में उसे लागू करता है और जब उनका राज आता है तो टेलीविज़न, संगीत, सिनेमा, साज-श्रृंगार और दस साल से बड़ी उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी जाती है.

'द ग्रेट गेम' सौ साल पहले ख़त्म हो गया लेकिन अफ़ग़ानिस्तान को नियंत्रित करने के लिए एक अलग तरह का संघर्ष आज भी जारी है.

अफ़ग़ान मामलों के जानकार इस बात पर एक मत हैं कि पिछले चार दशकों से अफ़ग़ानिस्तान में जो संघर्ष चल रहा है, उसमें क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय हितों के समीकरण बदल गए हैं.

अफ़ग़ानिस्तान पर दबदबा बनाने को लेकर भारत और पाकिस्तान की प्रतिद्विंद्विता के अलावा पश्चिमी देशों और रूस के बीच भी होड़ रही है.

इमेज स्रोत, Getty Images

रूस और तालिबान

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
पॉडकास्ट
दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर (Dinbhar)

देश और दुनिया की बड़ी ख़बरें और उनका विश्लेषण करता समसामयिक विषयों का कार्यक्रम.

दिनभर: पूरा दिन,पूरी ख़बर

समाप्त

शीत युद्ध के दिनों में सोवियत संघ ने साल 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर धावा बोला था और उसके सामने अफ़ग़ान मुजाहिदीन थे जिन्हें अमेरिका, ब्रिटेन और पाकिस्तान का समर्थन हासिल था.

लेकिन अब रूस का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान में उसकी दिलचस्पी मध्य एशिया में अपने सहयोगी देशों की सीमाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करने तक है. लेकिन पर्दे के पीछे मॉस्को के इरादे बहुत साफ़ नहीं हैं.

साल 2003 में तालिबान को 'आंतकवादी संगठन' करार देने के बावजूद हाल के सालों में रूस ने तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान के दूसरे सरकार विरोधी धड़ों के साथ कई दौर की बातचीत की है जिनमें अफ़ग़ान हुकूमत के नुमाइंदे शामिल नहीं थे.

अफ़ग़ानिस्तान की 'निर्वासित सरकार' के नेताओं को केवल इस साल मार्च में मॉस्को में आयोजित एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए बुलाया गया था. इस कॉन्फ्रेंस में अमेरिका, चीन, रूस और पाकिस्तान ने भी हिस्सा लिया था.

वाशिंगटन के थिंकटैंक 'सेंटर फ़ॉर इंटरनेशनल स्टडीज़' (सीएसआईएस) के निदेशक सेठ जोन्स कहते हैं, "रूस तालिबान की मदद कर रहा है. उसकी मदद केवल कूटनीतिक नहीं है बल्कि पैसे और इंटेलीजेंस के द्वारा भी तालिबान की मदद की जा रही है."

सेठ जोन्स इस ओर ध्यान दिलाते हैं कि लगभग एक दशक से रूस अपने 'पिछवाड़े' में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.

वे कहते हैं, "अफ़ग़ानिस्तान में रूस की दिलचस्पी की एक वजह तो इस क्षेत्र में अमेरिकी प्रभाव के सामने खुद को खड़ा करना चाहता है. रूस की नज़र में दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और पूर्वी यूरोप में उसके जो हित हैं, अफ़ग़ानिस्तान उसी कड़ी का हिस्सा है."

लेकिन रूस अतीत में जिहादी हमलों को भुक्तभोगी रहा है. इस क्षेत्र में उसकी चिंताएं चरमपंथ बढ़ने को लेकर भी है.

सेठ जोन्स का कहना है, "रूस को इस्लामिक स्टेट से ज़्यादा परेशानी रही है. आईएस को रूस और तालिबान दोनों से दुश्मनी रही है."

बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के अफ़ग़ान पत्रकार मोहम्मद बशीर कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं कि अफ़ग़ानिस्तान रूस के लिए एक अहम देश है. अफ़ग़ानिस्तान इस जियोपॉलिटिकल गेम के बीच में खड़ा है. ये जिस जगह पर है, वो इसे एक साथ दिलचस्प और ख़तरनाक बना देती है क्योंकि इसकी सीमाएं रूस के सहयोगी देश ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान से लगती हैं. रूस नहीं चाहता है कि इस्लामिक स्टेट उत्तर अफ़ग़ानिस्तान तक पहुंचे जिससे उसके सहयोगियों और उसके अपने हितों पर ख़तरा आए."

चीन की आर्थिक हितों से ज़्यादा दिलचस्पी

अफ़ग़ानिस्तान में आर्थिक हितों के लिहाज से देखें तो चीन की दिलचस्पी मेस अयनाक रीज़न में तांबे के खनन को लेकर है.

चीन इस बात को लेकर भी चिंतित है कि पश्चिमी शिनजियांग में सक्रिय इस्लामी गुट मजबूत हो सकते हैं.

सेठ जोन्स बताते हैं, "शिनजियांग में वीगर समुदाय के चरमपंथी गुटों और इस्लामिक पार्टी और तुर्कीस्तान की गतिविधियों चीनियों की दिलचस्पी अफ़ग़ानिस्तान में चरमपंथ विरोधी अभियानों को लेकर है."

हालांकि चीन की अपनी सीमा अफ़ग़ानिस्तान से कम ही लगती है कि लेकिन उसके लिए ये परेशानी की बात है कि तालिबान पूरे मुल्क को अपने नियंत्रण में लेने जा रहा है. उसे डर है कि इस्लामी गुट और मजबूत हो सकते हैं, सीमा पार कर सकते हैं और शिनजियांग में उसकी मुसीबत बढ़ा सकते हैं.

सुरक्षा चिंताओं के अलावा चीन इस क्षेत्र में अमेरिका की मौजूदगी को लेकर भी संतुलन साधना चाहता है.

सेठ जोन्स कहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका के जाने की ख़बरें चीन में सुर्खियां बटोर रही हैं और ऐसा लग रहा है कि उसकी एक चिंता कम हो गई है.

वीडियो कैप्शन,

तालिबान पर चीन ने दिया बड़ा बयान

अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी भूमिका

सेठ जोन्स भी ये मानते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान से पीछे हटने का अमेरिकी फ़ैसला एक बड़ी गलती है. अफ़ग़ान मामलों के दूसरे जानकार भी यी कहते रहे हैं.

सेठ कहते हैं, "हमने देखा है कि अमेरिकी सैनिकों का एक छोटा सा दस्ता भी तालिबान को आगे बढ़ने से रोकने के लिए काफी था. लेकिन जैसे ही अमेरिकियों ने पीछे हटना शुरू किया, तालिबान तेज़ी से आगे बढ़ने लगे."

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी हितों के कई पहलू हैं. एक तरफ़ अमेरिका को इस बात का एहसास भी है कि तालिबान के हाथ में पूरे निज़ाम के जाने के क्या ख़तरे हो सकते हैं. इसका मतलब ये होगा कि अफ़ग़ानिस्तान चरमपंथी गुटों का अभयारण्य बन सकता है और पश्चिमी देशों को इससे निपटना होगा.

सेठ जोन्स इस ओर ध्यान दिलाते हैं कि तालिबान के अल-कायदा के साथ रणनीतिक रिश्ते बने हुए हैं. लेकिन दूसरी तरफ़ अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में रूस, चीन और ईरान की दखलंदाज़ी को भी सीमित करना चाहता है.

वो ये भी चाहेगा कि अफ़ग़ानिस्तान को किसी बड़ी मानवीय त्रासदी से रूबरू न होना पड़े. लेकिन हालात इसी ओर बढ़ते हुए दिख रहे हैं.

तालिबान के काबुल में दाखिल होने के बाद शहर के इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर देश छोड़ने के लिए उमड़े लोगों की अफरातफरी इसका संकेत दे रही थीं.

वीडियो कैप्शन,

तालिबान क्या है, क्या चाहता है?

ईरान की 'अदृश्य उपस्थिति'

ईरान की सीमाएं अफ़ग़ानिस्तान से लगती हैं. इस रास्ते से लोगों, नशीले पदार्थों और सशस्त्र गुटों की आमदरफ्त होती है. तेहरान और तालिबान के रिश्ते इन्हीं चीज़ों से तय होते हैं.

अफ़ग़ान और अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान पर तालिबान को मदद पहुंचाने का कई बार आरोप लगाया है. उनके आरोपों के केंद्र में ईरान का रिवॉल्यूशनरी गार्ड रहा है.

सेठ जोन्स का कहना है कि ईरान की क़ुद्स फोर्स अफ़ग़ानिस्तान में अपनी 'अदृश्य उपस्थिति' का विस्तार कर रहा है. उसका मक़सद मिलिशिया और राजनीतिक गुटों के बीच समर्थन हासिल करना और ईरानी हितों को बढ़ावा देना है.

क़ुद्स फोर्स ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स का एक हिस्सा है जिसे अमेरिका चरमपंथी संगठन मानता है.

ईरान और तालिबान का सुरक्षा सहयोग ब्रिटेन और अमेरिका जैसे पश्चिमी ताक़तों से उनके उतार-चढ़ाव भरे रिश्तों से प्रभावित होता आया है.

तालिबान और ईरान के रिश्तों की हद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि तालिबान नेता मुल्ला अख्तर मंसूर अमेरिकी ड्रोन हमले में उस वक्त मारे गए थे जब वे ईरान से पाकिस्तान लौट रहे थे.

साल 2018 के आखिर में ईरान ने पहली बार सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार किया था कि उसने तालिबान के प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी की है.

तब ईरान ने ये कहा था कि उसने अफ़ग़ान हुकूमत की जानकारी में ऐसा किया है और तालिबान के साथ बातचीत का मक़सद अफ़ग़ानिस्तान की सुरक्षा समस्याओं का हल निकालना है.

वीडियो कैप्शन,

24 घंटे में बदली तस्वीर, क्या बोला तालिबान?

पाकिस्तान क्या चाहता है?

अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी ने पाकिस्तान को एक अजीबोगरीब स्थिति में डाल दिया है. दोनों मुल्कों की 2430 किलोमीटर लंबी सीमा है जिसे डुरंड लाइन कहा जाता है. अतीत में दोनों के संबंध बेहद उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं.

अगर अफ़ग़ानिस्तान के संकट का कोई स्पष्ट राजनीतिक समाधान नहीं निकला तो पड़ोसी देश के घटनाक्रम से पाकिस्तान अछूता नहीं रह पाएगा.

अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध की स्थिति पैदा हुई तो पाकिस्तान को एक नए शरणार्थी संकट का भी सामना करना पड़ सकता है.

जून के आखिर में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा था कि उनके देश में इस समय तीस लाख अफ़ग़ान शरणार्थी हैं और वो अब ज़्यादा शरणार्थियों को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है.

लेकिन पाकिस्तान में कई लोगों को ये भी डर है कि अफ़ग़ानिस्तान में गृह युद्ध की सूरत पैदा होने से उसके सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी. लेकिन कई लोग पाकिस्तान हुकूमत के अस्पष्ट नीतियों की भी आलोचना करते हैं.

अप्रैल में शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा था कि अफ़ग़ानिस्तान की सभी समस्याओं के लिए आप तालिबान को कसूरवार नहीं ठहरा सकते हैं क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान के अंदर और बाहर ऐसी कई ताक़तें हैं जो अमन नहीं चाहती हैं.

दूसरी तरफ़ तालिबान ने उन आरोपों से बार-बार इनकार किया है कि तालिबान को खड़ा करने में उसने कोई मदद पहुंचाई है. लेकिन इस बात में कम ही लोगों को संदेह है कि तालिबान का हिस्सा बनने वाले कई अफ़ग़ानों ने पाकिस्तान के मदरसों में तालीम ली है.

पाकिस्तान, यूएई और सऊदी सरब समेत उन तीन देशों में शामिल था जिसने तालिबान की पिछली हुकूमत को मान्यता दी थी और वो तालिबान से कूटनीतिक रिश्ते तोड़ने वाला आख़िरी देश था.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)