अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान: पाकिस्तान में कहीं मिठाइयाँ बँटी, तो कहीं चिंता भी

  • हुदा इकरम
  • बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद से
इमरान ख़ान

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अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का नियंत्रण हो जाने के बाद दक्षिण एशिया में फिर से राजनीतिक अनिश्चितता के बादल छा गए हैं. तालिबान के वहाँ के राष्ट्रपति भवन में प्रवेश करते ही अफ़ग़ान सुरक्षा बलों के प्रशिक्षण और साजो-सामान पर अमेरिका और उसके सहयोगियों के ख़र्च किए गए अरबों डॉलर बेकार हो गए.

काबुल का भी पतन होता देखने वाले अफ़ग़ानिस्तान के पड़ोसी अब सोच रहे हैं कि इसके बाद उनका क्या होगा. पाकिस्तान की बात करें, तो वहाँ बड़ी तादाद में अफ़ग़ान शरणार्थी रहते हैं. तालिबान के साथ पाकिस्तान के बड़े जटिल संबंध रहे हैं. वास्तव में, 90 के दशक की शुरुआत में तालिबान को बढ़ाने में पाकिस्तान ने प्रमुख भूमिका निभाई थी.

पाकिस्तान के एक अख़बार ट्रिब्यून ने लिखा है कि वहाँ के सिविल और सैन्य नेतृत्व ने अफ़ग़ानिस्तान के मामले में 'देखो और इंतज़ार करो' का नज़रिया अपनाया है.

अख़बार ने आधिकारिक सूत्रों के हवाले से कहा है कि वे काबुल में नई सरकार को मान्यता देने के लिए बेताबी नहीं दिखाएँगे.

उसने यह भी लिखा कि पाकिस्तान आगे की कार्ययोजना तय करने के लिए चीन, रूस और ईरान जैसे देशों के साथ मिलकर काम करने का निश्चय किया है.

पाकिस्तान सरकार की प्रतिक्रिया

अफ़ग़ानिस्तान की बदलती परिस्थितियों पर पाकिस्तान की शीर्ष सिविल-सैन्य संस्था राष्ट्रीय सुरक्षा समिति (एनएससी) की सोमवार यानी 16 अगस्त को एक बैठक आयोजित की गई. इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने की.

इसमें कैबिनेट के वरिष्ठ सदस्यों और सेना प्रमुख ने भाग लिया. बैठक में तय किया गया कि पाकिस्तान आगे भी अफ़ग़ानिस्तान के सभी जातीय समूहों को हिस्सेदार बनाने के लिए एक समावेशी राजनीतिक हल निकालने के लिए प्रतिबद्ध रहेगा.

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एनएससी ने अफ़ग़ानिस्तान के सभी पक्षों से क़ानून के शासन को मानने और सभी नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की अपील की है. इसके अलावा यह भी अपील की कि अफ़ग़ान ज़मीन का इस्तेमाल किसी भी देश के ख़िलाफ़ आतंकवादी गतिविधियों के लिए न हो पाए.

समिति ने अमेरिका की पूर्ववर्ती सरकार की सैन्य वापसी के फ़ैसले का सम्मान करने के लिए बाइडन प्रशासन के फ़ैसले का भी समर्थन किया और कहा कि यह क़दम वास्तव में इस संघर्ष का एक तार्किक नतीजा है.

हालाँकि इस बैठक से पहले प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के बारे में कहा कि असल में अफ़ग़ानों ने 'ग़ुलामी की बेड़ियों को तोड़ दिया है'.

पाकिस्तान में अंग्रेज़ी में शिक्षा देने की आलोचना करने वाला उनका बयान तालिबान के काबुल पर नियंत्रण करने के एक दिन बाद आया है. सोशल मीडिया पर इस बारे में बहस चल पड़ी है कि यह सरकार का आधिकारिक रुख़ है या यह केवल प्रधानमंत्री इमरान ख़ान का बयान है.

पाकिस्तान 1996 में अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार को मान्यता देने वाले तीन देशों में से एक था.

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शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा कि बातचीत से हासिल होने वाला राजनीतिक हल ही आगे बढ़ने का अकेला तरीका है

पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने अपनी सरकार के रुख़ को साफ करते हुए कहा, "पाकिस्तान अपने रुख़ पर मज़बूती से बना हुआ है. हमारा मानना है कि बातचीत से हासिल होने वाला राजनीतिक हल ही आगे बढ़ने का अकेला तरीक़ा है. हम लंबे समय तक चलने वाले गृहयुद्ध को देखना नहीं चाहते. हम चाहते हैं कि अफ़ग़ानी लोग फले-फूलें, न कि केवल जीवित रहें."

शाह महमूद क़ुरैशी का ये बयान अफ़ग़ान नेताओं के एक उच्चस्तरीय राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल से मुलाक़ात के बाद आया. उन्होंने आगे कहा, ''हमें उम्मीद है कि सभी अफ़ग़ान नेता देशहित के लिए मिलकर काम करेंगे. इसमें पाकिस्तान अपनी रचनात्मक भूमिका निभाता रहेगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी अफ़ग़ानिस्तान के साथ खड़े रहना चाहिए.''

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के राजदूत मुनीर अक़रम ने भी संयुक्त राष्ट्र न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक के बाद मंगलवार को बयान दिया. उन्होंने कहा, "यह समय अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक साथ काम करने का है ताकि अफ़ग़ानिस्तान की दीर्घकालिक शांति, सुरक्षा और विकास के लिए एक समावेशी राजनीतिक समझौता हो सके."

पाकिस्तानी सीनेट की रक्षा समिति ने भी 16 तारीख़ को एक प्रस्ताव जारी किया. इसमें अफ़ग़ानिस्तान के हालात पर विचार किया गया. समिति ने पाकिस्तान सरकार से अफ़ग़ानिस्तान के ताज़ा हालात पर चर्चा के लिए संसद के संयुक्त सत्र को तुरंत बुलाने का आग्रह किया है.

रक्षा समिति ने कहा है कि पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान कैसे शांति और प्रगति में भागीदार बनें, इसके लिए चर्चा हो और आगे का रास्ता तय करने के लिए संसद को विश्वास में लिया जाए.

पाकिस्तानी सेना की अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं

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पाकिस्तानी सेना ने अब तक अपना कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है

पाकिस्तानी सेना ने अब तक अपना कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है.

सेना अफ़ग़ानिस्तान के साथ लगती अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा करने और वहाँ से आने वाले शरणार्थियों को सुविधा देने में व्यस्त है.

तालिबान का पाकिस्तान के साथ लगे दो प्रमुख सीमा क्रॉसिंग पर भी नियंत्रण है.

तालिबानी लड़ाकों के नियंत्रण कर लेने के बाद तोरखम क्रॉसिंग को पैदल यात्रियों और व्यापार के लिए कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया. पाकिस्तान अभी किसी भी नए शरणार्थी को प्रवेश की अनुमति नहीं दे रहा है. यह ज़रूर है कि जो अफ़ग़ान शरणार्थी अपने देश जाना चाहते हैं, वे जा सकते हैं.

जानकारों और राजनीतिक पार्टियों की राय

पूरे मामले पर क़रीब निगाह रखने वाले जानकारों का मानना है कि इस बार तालिबान की प्राथमिकता केवल सत्ता हासिल करना नहीं है.

अंतरराष्ट्रीय संबंधों की विशेषज्ञ डॉ. हुमा बक़ाई, आईबीए कराची में सोशल साइंसेज़ और लिबरल आर्ट्स की एसोसिएट प्रोफ़ेसर और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन फ़ैकल्टी की पूर्व एसोसिएट डीन हैं.

वे कहती हैं, ''पाकिस्तान के लिए यह सही समय है कि वे किताबी सलाह का अनुसरण करें. उसे ख़ुद को बलि का बकरा बनने से बचाना चाहिए. एक पड़ोसी के रूप में पाकिस्तान को ज़रूरी काम करना चाहिए लेकिन रणनीतिक मामलों में वह अकेले आगे न बढ़े.''

उनकी राय में अफ़ग़ानिस्तान सभी देशों की एक साझा जिम्मेदारी है, लिहाजा दुनिया को अपनी भूमिका निभाने के लिए आगे आना चाहिए.

मुनीज़े जहांगीर, पाकिस्तान की एक पत्रकार और डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता हैं. वह मशहूर वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता स्वर्गीय असमा जहांगीर की बेटी हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के ताज़ा बदलाव पर कई वर्गों के खुश होने वालों को संबोधित करते हुए मुनीज़े जहांगीर कहती हैं, "तालिबान के नियंत्रण का जश्न मनाने वाले, क्या एपीएस के बच्चों को भूल गए हैं? क्या आप अपने बच्चों को तालिबान के शासन में पालेंगे? तालिबान की जीत की कड़ी निंदा की जानी चाहिए. अतिवाद किसी सीमा-रेखा को नहीं पहचानता. मुझे डर है कि पाकिस्तान में भी इसके गंभीर हिंसक नतीजे देखने को मिल सकते हैं.''

तालिबान की वापसी पर संयम बरतने वाली अकेली राजनीतिक पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) रही है. पीपीपी को पाकिस्तान की एक उदारवादी पार्टी माना जाता है. पीपीपी की केंद्रीय कार्यकारी समिति की बैठक मंगलवार को कराची के बिलावल हाउस में हुई. पीपीपी अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी और पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली जरदारी इसमें शामिल हुए.

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पीपीपी ने अफ़ग़ानिस्तान के सभी वर्गों पर पड़ने वाले असर पर चिंता जताई.

पार्टी ने अफ़ग़ानिस्तान के ताज़ा हालात और अफ़ग़ानिस्तान के सभी वर्गों पर पड़ने वाले इसके असर पर चिंता जताई.

पीपीपी ने वहाँ के धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के साथ कमज़ोर वर्गों पर तालिबानी शासन के पड़ने वाले असर पर अपनी चिंता व्यक्त की. पार्टी ने पाकिस्तान और इलाक़े के दूसरे देशों की शांति, स्थिरता और सुरक्षा को होने वाली परेशानियों पर भी चिंता जताई है.

अमेरिका में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत और पीपीपी की सीनेटर शेरी रहमान ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था, ''अब अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय त्रासदी सामने आने वाली है. यह केवल पाकिस्तान या ईरान की ग़लती कैसे हो सकती है? क्या यह सही वक़्त नहीं है कि नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अपने ही नियमों का पालन करे?''

हालाँकि पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के वरिष्ठ राजनेता और सीनेटर मुशाहिद हुसैन सैयद की राय है कि इस बार का तालिबान पहले से अधिक परिपक्व है.

उनके अनुसार, तालिबान अतीत में अनुभव कर चुका है कि केवल सत्ता मिलने से ही दुनिया में अच्छी जगह नहीं मिलने वाली. अब वे अधिक सहिष्णु हैं. और समावेशी सरकार बनाने में विश्वास रखने के साथ इलाक़े के दूसरे देशों के साथ चलना चाहते हैं.

मुशाहिद हुसैन ने कहा कि तालिबान यह समझता है कि अब 90 का वक़्त नहीं है, बल्कि आज 2021 चल रहा है. आज की दुनिया में मानवाधिकार और महिला मुद्दों को उठाया जाता है और इस पर दुनिया भर में चर्चा होती है.

उनका मानना है कि इस क्षेत्र में शक्ति और शांति का बेहतर संतुलन बनाने के लिए रूस, चीन, भारत और यहाँ तक कि ईरान जैसे देशों को भी अफ़ग़ानिस्तान की बेहतरी के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहिए.

मीडिया और सोशल मीडिया में सामान्य प्रतिक्रिया

पाकिस्तान की पारंपरिक या सोशल मीडिया में तालिबानी की वापसी को लेकर दो तरह की भावनाएँ देखी जा सकती हैं.

पहला, वह आशावाद है जो तालिबान के नेताओं के बयानों के बाद आया है. ऐसे बयानों में कहा गया कि वे काबुल में अफ़ग़ान लोगों, राजनयिक मिशनों, संस्थानों और विदेशी नागरिकों को भरोसा दिलाते हैं कि वे सुरक्षित हैं.

शुरू में, इन बयानों से लोगों में उम्मीद जगी थी कि वास्तव में तालिबान की सोच बदल गई है. लेकिन काबुल से आ रहे चौंकाने वाले वीडियो और हवाई अड्डे की दर्दनाक स्थिति ने पाकिस्तानियों में डर और चिंता की एक नई लहर फैला दी.

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काबुल से आ रहे चौंकाने वाले वीडियो और हवाई अड्डे की दर्दनाक स्थिति ने पाकिस्तान में डर और चिंता की एक नई लहर फैला दी.

सोशल मीडिया पर लोग #Kabul और #Afghanistan हैशटैग के साथ अपने विचार साझा कर रहे हैं. उनमें से कुछ कह रहे हैं कि इस मानवीय संकट का असर पाकिस्तान पर भी पड़ सकता है. लेकिन एक अर्थव्यवस्था या देश के रूप में हम अब और शरणार्थियों या एक अशांत पड़ोसी देश का भार लेकर चलने को तैयार नहीं हैं.

लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं की समानता की पैरोकार, संयुक्त राष्ट्र शांतिदूत, 2014 की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता और मलाला फंड की संस्थापक मलाला यूसुफ़जई ने अपने एक ट्वीट में चिंता व्यक्त की.

उन्होंने कहा, ''हम पूरी तरह सदमे में हैं, क्योंकि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण कर रहा है. मुझे महिलाओं, अल्पसंख्यकों और मानवाधिकारों का समर्थन करने वालों की गहरी चिंता है. वैश्विक, क्षेत्रीय और स्थानीय शक्तियों को तत्काल युद्धविराम की अपील करनी चाहिए. उन्हें तत्काल मानवीय सहायता प्रदान करने के साथ शरणार्थियों और नागरिकों की रक्षा करनी चाहिए.''

धार्मिक और राजनीतिक समूहों में ख़ुशी

पाकिस्तान की प्रमुख धार्मिक-राजनीतिक पार्टियों जमात-ए-इस्लामी और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-एफ़ (जेयूआई-एफ़) ने अफ़ग़ान तालिबान को उनकी हालिया "सफलता" पर बधाई देते हुए इस मुहिम को अपना पूर्ण समर्थन और सहयोग दिया है.

इन धार्मिक समूहों के कुछ सदस्यों ने तालिबान की जीत का जश्न मनाने के लिए मिठाइयाँ भी बाँटीं.

पाकिस्तान में जमात ए इस्लामी के अमीर ने अपने ट्वीट में कहा: ''अफ़ग़ानिस्तान के लोगों ने अपने दरवाज़े खोलकर तालिबान का स्वागत किया है. अगर वहाँ एक अच्छा इस्लामी अमीरात उभरा, तो उसकी ख़ुशबू और चमक जल्द ही हर जगह फैल जाएगी.''

वहीं पाकिस्तान उलेमा काउंसिल ने भी एक बयान जारी किया है. इस बयान में उन्होंने कहा है कि वे सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण का स्वागत करते हैं. जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-एफ़ के फ़ज़लुर रहमान ने तहरीक़-ए-इस्लामी तालिबान, अफगानिस्तान को सत्ता पर उनके सफल नियंत्रण के लिए बधाई पत्र भेजा है.

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