अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान भारत के लिए बड़ी चुनौती, कूटनीति की होगी अग्निपरीक्षा

  • विकास पांडे
  • बीबीसी संवाददाता
जलालाबाद में तालिबानी लड़ाके

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बेहद तेज़ गति से सैन्य अभियान चला कर तालिबान ने महज़ कुछ सप्ताह में पूरे अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया है

जिस तेज़ी से सैन्य अभियान चला कर तालिबान ने महज़ कुछ सप्ताह में अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा किया है, उसने दुनियाभर के सुरक्षा और कूटनीति मामलों के विशेषज्ञों को परेशानी में डाल दिया है.

राजधानी काबुल के तालिबान के कब्ज़े में जाने के बाद कई देश जल्द से जल्द अपने राजनयिकों और आम नागरिकों को अफ़ग़ानिस्तान से निकालने के लिए विशेष अभियान चला रहे हैं. लेकिन इसके साथ जो चीज़ पीछे छूट रही है, वो है अफ़ग़ानिस्तान में बीते दो दशकों में किया गया विकास का काम और निवेश.

माना जा रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सत्ता आने के साथ ही दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव आ गया है. इसके साथ ही भारत के लिए अब स्थिति पहले से अधिक मुश्किल हो गई है.

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COVER STORY: अफ़ग़ानिस्तान में 20 साल के युद्ध से क्या हासिल?

पाकिस्तान का उद्देश्य

पाकिस्तान और चीन के साथ लंबे वक़्त से भारत के सीमा से जुड़े विवाद हैं. माना जा रहा है कि भविष्य में अफ़ग़ानिस्तान में इन दोनों की भूमिका अहम होने वाली है.

पाकिस्तान से सटी अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पूरी तरह से लोगों के लिए बंद नहीं हैं, इसके आर-पार जाना लोगों के लिए बेहद आसान है. पाकिस्तान लंबे वक्त से अफ़ग़ानिस्तान से जुड़े मामलों भी सक्रिय भूमिका निभाता आया है.

अब व्यापारिक रूप से पाकिस्तान का सहयोगी चीन भी अफ़ग़ानिस्तान में अधिक दिलचस्पी दिखा रहा है. बीते महीने चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने तालिबान के वरिष्ठ नेताओं के साथ एक अहम बैठक की थी, जो इस बात का संकेत है कि पड़ोसियों के मामले में वो अब मूकदर्शक नहीं बने रहना चाहता.

अफ़ग़ानिस्तान और सीरिया के लिए भारत के पूर्व राजदूत रहे गौतम मुखोपाध्याय ने कहा कि संभावित भू-राजनीतिक पुनर्गठन के कारण "चीज़ें पूरी तरह उलट-पलट हो सकती हैं."

पश्चिमी देशों की लोकतांत्रिक सरकारों और भारत जैसे दूसरे लोकतांत्रिक राष्ट्र के बीच अफ़ग़ानिस्तान गठबंधन की एक ढीली कड़ी जैसा था. लेकिन उम्मीद की जा रही है कि आगामी दिनों में दक्षिण एशिया में होने वाले इस बड़े खेल में पाकिस्तान, रूस, ईरान और चीन की बेहद अहम भूमिका होने वाली है.

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कई देशों ने अफ़ग़ानिस्तान में फंसे अपने राजनयिकों और नागरिकों को निकालने के लिए विशेष विमान भेजे हैं.

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कुछ लोगों का मानना है कि ये भारत के लिए हार साबित हो सकता है, जबकि पाकिस्तान के लिए ये बड़ी जीत है. लेकिन पूर्व भारतीय कूटनीतिज्ञ जितेंद्र नाथ मिश्रा का कहना है कि ये चीज़ों को देखने का सरल नज़रिया है क्योंकि पश्तूनों के नेतृत्व वाले तालिबान ने कभी भी पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच की सीमा को मान्यता ही नहीं दी है और ये पाकिस्तान के लिए परेशानी का सबब रहा है.

वो कहते हैं, "पाकिस्तान चाहेगा कि तालिबान दोनों मुल्कों के बीच की सीमा को आधिकारिक तौर पर मान्यता दे और ये उसकी प्राथमिकता होने वाली है."

लेकिन ये बात भी सही है कि अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता तालिबान के हाथ में होना भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान को रणनीतिक रूप से अधिक मज़बूती प्रदान करता है.

वॉशिंगटन में मौजूद विल्सन सेंटर थिंकटैंक के उप-निदेशक माइकल कूगलमैन कहते हैं कि पाकिस्तान को अफ़ग़ानिस्तान में एक ऐसी सरकार मिल गई है, जिसे वो आसानी से प्रभावित कर सकता है और पाकिस्तान यही तो चाहता था.

वो कहते हैं, "पाकिस्तान के अधिकारी इसे केवल भारत की हार के तौर पर पेश कर सकते हैं, लेकिन रणनीतक तौर पर पाकिस्तान के लिए उद्देश्य इससे काफ़ी बड़े हैं. असल मायनों में पाकिस्तान फ़िलहाल क्षेत्रीय स्तर पर ख़ुद को बड़े विजेता के रूप में देख रहा है."

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तालिबान क्या है, क्या चाहता है?

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अफ़ग़ानिस्तान की सभी मुख्य सड़कों पर तालिबान के लड़ाके गश्त लगा रहे हैं

चीन की भूमिका

विशेषज्ञ कहते हैं कि एक तरफ़ पाकिस्तान के साथ पूर्व अफ़ग़ान राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी के ठंडे होते संबंध तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ भारत के गहरे होते संबंधों को लेकर पाकिस्तान नाख़ुश था. पाकिस्तान गंभीर आर्थिक संकट से भी जूझ रहा था.

अब पाकिस्तान के लिए ख़ुशी का मौक़ा इसलिए है क्योंकि 'वक्त की परीक्षा झेल चुके' चीन के साथ उसके संबंधों का इस्तेमाल अब वो अफ़ग़ानिस्तान में कर सकेगा. चीन भी अब अपनी ताक़त दिखाने के किसी मौक़े को जाने नहीं देना चाहता.

जितेंद्र नाथ मिश्रा कहते हैं, "चीन अपनी शर्तों के अनुसार खेल में शामिल हो सकता है."

अफ़ग़ानिस्तान में चीन के व्यापारिक हित हैं, जो खनिजों की उसकी बढ़ती मांगों को पूरा कर सकता है. हालांकि इससे अधिक महत्वपूर्ण बात ये है कि अफ़ग़ानिस्तान में काम करने के बदले चीन अफ़ग़ानिस्तान पर ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट पर रोक लगाने के लिए उस पर दवाब डाल सकता है. चीन इस गुट पर देश के मुस्लिम-बहुल शिनजियांग प्रांत में हिंसा फैलाने का आरोप लगाता रहा है.

गौतम मुखोपाध्याय कहते हैं कि चीन और पाकिस्तान "एक दूसरे के सहारे एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अफ़ग़निस्तान में जाना चाहेंगे."

वो कहते हैं कि लेकिन चीन को बेहद सतर्कता के साथ क़दम उठाने की ज़रूरत है और उसे वो ग़लतियाँ नहीं दोहरानी चाहिए, जो पहले विश्व की शक्तियाँ कर चुकी हैं.

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भारत के लिएस्थिति

रूस और ईरान भी इसी राह पर चलते दिखते हैं और दोनों ने ही अफ़ग़ानिस्तान में अपने दूतावास बंद नहीं किए हैं और उनके राजनयिक अब भी काबुल में हैं.

तालिबान का वादा है कि वो बदले की कोई कार्रवाई नहीं करेगा. लेकिन जानकार मानते हैं कि तालिबान के इस वादे पर भरोसा करना फ़िलहाल जल्दबाज़ी होगी.

तो ऐसे में भारत क्या करेगा? पाकिस्तान, अमेरिका या फिर रूस के मुक़ाबले अफ़ग़ानिस्तान में भारत कभी भी बड़ा खिलाड़ी नहीं रहा है. लेकिन दक्षिण एशिया के पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाने में भारत की हमेशा से अहम भूमिका रही है. हज़ारों की संख्या में अफ़ग़ान नागरिक पढ़ाई करने, इलाज कराने या काम के लिए भारत आते हैं.

जितेंद्र नाथ मिश्रा का कहना है, "भारत के लिए ये बुरे और अधिक बुरे के बीच चुनाव करने का वक़्त है."

लेकिन जानकार मानते हैं कि भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ये होने वाली है कि वो तालिबान सरकार को मान्यता दे या नहीं.

अगर रूस और चीन तालिबान को मान्यता देने पर राज़ी हो जाते हैं, तो भारत के लिए स्थिति बेहद मुश्किल हो सकती है. जानकार मानते हैं कि साल 1999 की तरह पाकिस्तान इस बार भी आधिकारिक तौर पर तालिबान सरकार को मान्यता दे सकता है.

फ़िलहाल भारत के लिए बेहतर रास्ता यही है कि वो तालिबान के साथ चर्चा का एक रास्ता खुला रखे. लेकिन पूर्व में तालिबान के साथ भारत के रिश्ते जैसे रहे हैं उसे देखते हुए भारत के लिए ये आसान नहीं होगा.

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COVER STORY: तालिबान का दोहरा रवैया?

साल 1999 में अफ़ग़ानिस्तान ने इंडियन एयरलाइंस के एक विमान के अपहर्ताओं को सुरक्षित जाने दिया था. भारतीय वो घटना भूले नहीं होंगे.

1996 से 1999 के बीच तालिबान के विरोध में रहे नॉर्दन अलायंस नाम से जाने जाने वाले अफ़ग़ान क़बायली नेताओं के साथ भारत ने हमेशा से क़रीबी संबंध रखे हैं.

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के नियंत्रण के बाद भारत को अब अपने निजी हितों और क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थायित्व के लिए अपने इतिहास को भूलना होगा.

इस बात की चिंता भी जताई जा रही है कि तालिबान की जीत से उत्साहित हो कर जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे चरमपंथी संगठन भारत के ख़िलाफ़ आतंकवादी हमलों की योजना बना सकते हैं.

लैंकास्टर यूनिवर्सिटी में राजनीति के प्रोफ़ेसर अफ़ग़ानिस्तान पर किताब लिख चुके अमलेंदु मिश्रा कहते हैं कि भारत के लिए ये कूटनीतिक तौर पर तनी हुई रस्सी पर चलने के समान होगा.

और भारत को ये सुनिश्चित करने के लिए ख़ास कूटनीति की ज़रूरत होगी कि कश्मीर मुजाहिदीनों का अड्डा न बन जाए.

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अफ़ग़ानिस्तान में क्या हासिल करना चाहते हैं अर्दोआन?

जानकार कहते हैं कि भारत को तालिबान के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखना होगा, लेकिन ये भी सच है कि भारत को ये फ़ैसला भी करना होगा कि वो तालिबान विरोधी गुटों के साथ किस हद तक संपर्क रखे.

माना जा रहा है कि तालिबान पर दवाब बनाए रखने के लिए पश्चिमी देश एक संयुक्त मोर्चे का गठन करेंगे. ब्रितानी प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि तालिबान सरकार को लेकर संयुक्त प्रतिक्रिया दी जानी चाहिए.

इसके अलावा भविष्य में ये संभावना भी है कि नॉर्दन अलायंस का फिर से गठन हो सकता है. साथ ही अफ़ग़ानिस्तान, पश्चिमी ताक़तों का नेतृत्व करने वाले अमेरिका के साथ चीन, रूस और पाकिस्तान के टकराव की नई जगह बन सकता है.

ऐसे में भारत के सामने रास्ता आसान नहीं होगा. उसके फ़ैसलों का असर पूरे क्षेत्र की शांति और स्थायित्व पर तो पड़ेगा ही, साथ ही विश्व की भू-राजनीति पर भी पड़ेगा.

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