अफ़ग़ानिस्तान: बिना पैसे के कैसे चलेगी तालिबान की सरकार, क्या सीरिया जैसे होंगे हालात?

  • असिता नागेश
  • बीबीसी न्यूज़
अफ़ग़ानिस्तान, तालिबान, अर्थव्यवस्था

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गुजरे 20 सालों में पहली बार तालिबान के हाथ में अफ़ग़ानिस्तान का निज़ाम आया है. अब उनके सामने हथियारों से लैस किसी विरोधी धड़े की चुनौती नहीं है बल्कि ढहने की कगार पर पहुंच गई अर्थव्यवस्था से मुकाबला करना है.

इन हालात में पहले से ही एक मानवीय आपदा से जूझ रहे अफ़ग़ानिस्तान के हालात और ख़राब होने की आशंकाएं बढ़ गई हैं.

15 अगस्त को जब तालिबान ने काबुल पर अपना नियंत्रण स्थापित किया, तब से ही अफ़ग़ानिस्तान की बैंकिंग व्यवस्था ठप है.

बैंकों के बाहर लंबी क़तारें लगी हैं और उनमें से ज़्यादातर के बाहर ताला लटका है. एटीएम मशीनों से लोगों को पैसा नहीं मिल पा रहा है.

लोगों के हाथ में जो नकदी थी, वो अब ख़त्म होने के कगार पर है. ऐसे में आम लोगों के बीच बेचैनी का आलम भी लगातार बढ़ता जा रहा है.

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जीडीपी का 40% विदेशी मदद से

अफ़ग़ानिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही नाज़ुक दौर से गुजर रही थी. विदेशों से मिलने वाली मदद का ही प्रमुख सहारा था.

किसी मुल्क को 'सहायता पर निर्भर देश' तब कहा जाता है जब उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 10 फ़ीसदी या उससे ज़्यादा हिस्सा बाहर से मिलने वाली मदद से आता हो.

विश्व बैंक के अनुसार, अफ़ग़ानिस्तान के मामले में जीडीपी का 40 फ़ीसदी विदेशी मदद से पूरा होता है.

जब ये साफ़ हो गया कि तालिबान काबुल पर नियंत्रण हासिल कर ही लेगा तो अमेरिका और जर्मनी समेत अन्य पश्चिमी देशों ने अफ़ग़ानिस्तान को दी जाने वाली विदेशी मदद रोक दी.

विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी अफ़ग़ानिस्तान को अपनी तरफ़ से दी जाने वाली रकम का भुगतान रोक दी है.

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तालिबान के ख़ौफ़ से भागते लोग, बेबसी, लाचारी और डर के साये में ज़िंदगी

विदेशी मुद्रा भंडार

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अफ़ग़ानिस्तान के केंद्रीय बैंक 'दा अफ़ग़ानिस्तान बैंक' (डीएबी) के विदेशी मुद्रा भंडार को भी फ्रीज़ कर दिया गया है. डीएबी के पास इस समय 9 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है. इसका बड़ा हिस्सा अमेरिका में जमा है.

डीएबी के पूर्व गवर्नर अजमल अहमदी ने पिछले हफ़्ते ट्वीट करके बताया कि जिस दिन काबुल को तालिबान ने अपने नियंत्रण में लिया, वे एक अमेरिकी विमान से देश से बाहर निकल गए थे.

उन्होंने बताया कि डीएबी का ज़्यादातर भंडार सुरक्षित है. यूएस ट्रेज़री बॉण्ड्स और सोना अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुताबिक़ विदेशों में रखा गया है.

"हम ये कह सकते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का शायद 0.1-0.2 फीसदी हिस्सा ही तालिबान की पहुंच में आ सकता है. ये बहुत ज़्यादा नहीं है."

और पिछले हफ़्ते बाइडन प्रशासन के एक अधिकारी ने बीबीसी से बातचीत में इस बात की पुष्टि की थी कि "अमेरिका में अफ़ग़ान हुकूमत की जो भी परिसंपत्तियां हैं, वो तालिबान को उपलब्ध नहीं कराई जाएंगी."

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तालिबान का डर

एक तरफ़ जहां अफ़ग़ान अर्थव्यवस्था गतिरोध की स्थिति से गुजर रही है, लोग बड़े पैमाने पर देश छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. तालिबान के निज़ाम से बचने के लिए लोगों का हुजूम एयरपोर्ट की तरफ़ बढ़ने की कोशिश कर रहा है.

काबुल में एक करेंसी डीलर ने अमेरिकी अख़बार 'द वॉल स्ट्रीट जनरल' को बताया कि कुछ मकान मालिक अपने किरायेदारों से फ्री में रहने के लिए कह रहे हैं "क्योंकि उन्हें डर है कि घर खाली होने की सूरत में तालिबान उनकी संपत्ति पर क़ब्ज़ा कर लेगा."

हाल ही में 'फिनांशियल टाइम्स' के लिए एक लेख में अजमल अहमदी ने लिखा कि " ये दावा कि तालिबान को अवैध खनन, अफ़ीम के उत्पादन, कारोबारी रास्तों से होने वाली कमाई से पर्याप्त राजस्व मिल जाएगा, उम्मीद से परे है."

"ऐसे स्रोतों से तालिबान की जो कमाई होती है, वो किसी चरमपंथी अभियान को चलाने के लिहाज से तो काफी बड़ी मानी जा सकती है लेकिन एक कामकाजी सरकार चलाने के लिए पूरी तरह से नाकाफी है."

अफ़ग़ानिस्तान को विदेशों से मिलने वाले पैसे में एक हिस्सा मुल्क के बाहर रहने वाले अफ़ग़ानों द्वारा अपने नाते-रिश्तेदारों को भेजा गया पैसा है. ये रकम अफ़ग़ानिस्तान की जीडीपी के 4 फ़ीसदी हिस्से के बराबर बनती है.

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वित्तीय लेनदेन का कारोबार

इसका मतलब ये हुआ कि अफ़ग़ानिस्तान दुनिया के उन देशों में शामिल है जो अपने लोगों द्वारा भेजे गए पैसों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है.

लेकिन तालिबान ने जब से मुल्क की बागडोर संभाली है, पश्चिमी देशों ने विदेशी सहायता भेजनी बंद कर दी है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय लेनदेन के कारोबार से जुड़ी 'वेस्टर्न यूनियन' और 'मनीग्राम' जैसी कंपनियों ने अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सेवाएं स्थगित कर दी हैं.

यानी अफ़ग़ान लोगों को विदेशों में रह रहे अपने दोस्तों और परिजनों से मिलने वाला पैसा भी पूरी तरह से बंद हो गया है.

पिछले हफ़्ते 'वेस्टर्न यूनियन' ने इस फ़ैसले की घोषणा करते हुए कहा कि उन्हें मालूम है कि कंपनी की सेवाएं स्थगित करने से अफ़ग़ान लोगों पर गहरा असर पड़ेगा.

कंपनी ने कहा, ".हम तेज़ी से बदल रहे हालात पर क़रीबी नज़र बनाए रखेंगे. हालात में कोई बदलाव हुआ तो हम अपने ग्राहकों को इसकी जानकारी देंगे."

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तालिबान को अब हो सकती है पैसे की मुश्किल

राजनीतिक अनिश्चतता

अफ़ग़ानिस्तान में अभी जो हालात हैं, उसमें लोगों के पास नक़दी ख़त्म हो गई है. बैंक तकरीबन बंद हैं और लोग बैंकों से अपना पैसा नहीं निकाल पा रहे हैं.

देश में जारी राजनीतिक अनिश्चतता के कारण पहले से कमज़ोर मुद्रा अफ़ग़ानी की कीमत और भी कम हो गई है.

ट्विटर एकाउंट @HearAfghanWomen पर लोग अपनी पहचान छुपाकर अपने अनुभव शेयर कर रहे हैं.

एक महिला ने लिखा है, "रसोई गैस बहुत महंगी हो गई है. सभी बैंक बंद हैं. काबुल की दुकानों में खाने-पीने की चीज़ें ख़त्म होने को हैं. मोबाइल रिचार्ज नहीं हो पा रहा है. और हम सब की ज़िंदगी पर जान की आफत अलग से है."

कमज़ोर अफ़ग़ानी मुद्रा

ऐसे ही एक ट्वीट में ये जानकारी दी गई है कि लोगों को अपनी घरेलू चीज़ें सड़कों पर बेचनी पड़ रही है.

"काबुल से सुप्रभात. यहां लोग अपनी घरेलू चीज़ें बेच रहे हैं ताकि खाने-पीने की चीज़ें खरीद सकें और सुरक्षा के लिए देश छोड़ सके. तालिबान ने बीती रात ये एलान किया कि अफ़ग़ान लोगों को अब और यात्रा करने की इजाजत नहीं दी जाएगी. यानी अब लोग आधिकारिक रूप से अपने ही शहर में क़ैद हैं."

लंदन स्कूल ऑफ़ इकॉनोमिक्स में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर फवाज़ गर्गेज़ कहते हैं, "पिछले कुछ दिनों से पूरे अफ़ग़ानिस्तान में बैंकों के बाहर लोगों की लंबी क़तारें देखी जा रही हैं. अगर आपके अफ़ग़ानी मुद्रा है भी तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है."

"क्योंकि इसकी कीमत गिर गई है. और जिन संसाधनों और परिसंपत्तियों की मदद से डीबीए अफ़ग़ानी मुद्रा को स्थिर कर सकता था, वो फ्रीज़ कर दी गई हैं. अफ़ग़ान अर्थव्यवस्था में जिस तरह से लोगों का भरोसा कमज़ोर हुआ है, उससे अफ़ग़ानी मुद्रा धाराशायी हो गई है. आम लोग विदेशी सहायता एजेंसियों की मदद के मोहताज होकर रह गए हैं."

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सीरिया और यमन जैसे हालात

इन सब के अलावा अफ़ग़ानिस्तान भयानक सूखे की मार से गुजर रहा है. संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार देश के आधे से ज़्यादा बच्चे कुपोषण का शिकार हो सकते हैं.

प्रोफ़ेसर फवाज़ गर्गेज़ कहते हैं, "पिछले तीन सालों में ये दूसरी बार सूखा पड़ा है. अफ़ग़ानिस्तान में पहले से दुनिया की सबसे ऊंची स्तर की खाद्य असुरक्षा है, भयानक ग़रीबी है और कोरोना महामारी के कारण ढहने के कगार पर पहुंच गई स्वास्थ्य व्यवस्था है."

"पहले से ही कई संकटों से जूझ रही अफ़ग़ानिस्तान की समस्याएं तालिबान के आने के बाद और बिगड़ गई हैं. अफ़ग़ानिस्तान में जो हालात हैं वो 'बर्बादी की बदतरीन स्थिति' कही जा सकती है और मेरे कहने का ये मतलब है कि वहां कई चीज़ें एक साथ हो रही हैं. अफ़ग़ानिस्तान में सीरिया और यमन जैसे हालात पैदा हो सकते हैं."

लेकिन अंतराराष्ट्रीय नेताओं को ये उम्मीद है कि तालिबान ये साबित करना चाहेगा कि वो एक असरदार सरकार चला सकता है और उसका झुकाव समझौते करनी की तरफ़ होगा ताकि विदेशों से मिलने वाले पैसे को फिर से शुरू किया जा सके.

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राजनीति और विचारधारा

उदाहरण के लिए ग्रुप-7 देशों की बैठक की अध्यक्षता करने के बाद ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा कि जी-7 देशों का तालिबान पर आर्थिक, कूटनीतिक और राजनीतिक प्रभाव है.

ग्रुप-7 के देशों में ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान शामिल हैं.

प्रोफ़ेसर फवाज़ गर्गेज़ कहते हैं, "जी-7 देश इस समय डर दिखाने के बजाय लालच दे रहे हैं. मुझे ऐसा लगता है कि अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देश तालिबान के साथ एक तरह का सशर्त संपर्क रखना चाहते हैं. इसका मतलब ये हुआ कि तालिबान को तमीज से बर्ताव करने के लिए कहा जाएगा ताकि अफ़ग़ानिस्तान का विदेश मुद्रा भंडार और डीएबी की परिसंपत्तियां उसके लिए जारी की जा सके."

अर्थव्यवस्था के मामले में वो कहते हैं, "मेरा मानना है कि ये तालिबान के हक में भी है कि वो लोगों को ज़रूरी चीज़ें और सेवाएं मुहैया कराएं. और जब वे कहते हैं कि वे बदल गए हैं तो उनके लिए ये बात मायने रखती है.

लेकिन क्या इतना काफी है कि तालिबान अपनी राजनीति और विचारधारा को लेकर समझौता कर लेगा? प्रोफ़ेसर फवाज़ गर्गेज़ की राय में ये एक खुला सवाल है.

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