तालिबान के डर से इन नियमों को मानने पर मजबूर हो रही महिलाएं

  • रजनी वैद्यनाथन
  • दक्षिण एशिया संवाददाता
अफ़ग़ानिस्तान के हेरात शहर की एक सड़क पर एक रेहड़ी वाला
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अफ़ग़ानिस्तान के हेरात शहर की एक सड़क पर एक रेहड़ी वाला

अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल से आख़िरी विदेशी सैनिक को गए हफ़्ता बीतने जा रहा है.

उनके चले जाने के बाद पीछे छूट गए लोगों की ज़िंदगी कैसी बीत रही है?

अलग-अलग शहरों और सूबों के चार लोगों ने इस बारे में बीबीसी से बात की.

उन्होंने बताया कि वे अपनी आज़ादी खो चुके हैं और ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष कर चुके हैं. हमने उनकी सुरक्षा के लिए कुछ नाम बदल दिए हैं.

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मज़ार-ए-शरीफ़ का एक वीरान बाज़ार

मज़ार-ए-शरीफ़

मज़ार-ए-शरीफ़ उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान का एक बड़ा शहर और प्रमुख आर्थिक केंद्र है. ये ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान के बॉर्डर के पास है. मज़ार-ए-शरीफ़ कभी अफ़ग़ानिस्तान की चुनी हुई सरकार का एक मज़बूत गढ़ हुआ करता था.

लेकिन काबुल में दाख़िल होने से एक दिन पहले 14 अगस्त को तालिबान ने इस शहर को भी अपने नियंत्रण में ले लिया था.

मजीब यहाँ एक रेस्तरां में काम करते थे. अब वे खाने-पीने के इंतज़ाम के लिए संघर्ष कर रहे हैं. मज़ार-ए-शरीफ़ से वीडियो कॉल पर बातचीत के दौरान उन्होंने एक ख़ीली इमारत के गंदे फर्श की तरफ़ इशारा किया.

वहाँ कुछ कंबलों का अंबार लगा हुआ था, फ़िलहाल के लिए यही उनका नया घर है.

मजीब कुछ हफ़्तों पहले यहाँ पहुँचे थे. वे उन लाखों अफ़ग़ानों में से हैं, जिन्हें तालिबान और सत्ता से बेदखल हुए पिछली सरकार के सुरक्षा बलों की लड़ाई के कारण अपना घर-बार छोड़ना पड़ा है.

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COVER STORY: क्या अब बदलेगा तालिबान?

मजीब ने बताया कि दस बरस पहले तालिबान ने उनके पिता की हत्या कर दी थी. इस बात को दस साल बीत गए हैं लेकिन उन्हें घर से बाहर निकलने पर डर लगता है क्योंकि बाहर हर रोज़ किसी न किसी को मारा-पीटा जा रहा है.

पिछले हफ़्ते मज़ार-ए-शरीफ़ से आ रही तस्वीरों में ये देखा जा सकता था कि दर्जनों अफ़ग़ान हाथों में सूटकेस और प्लास्टिक की थैलियां लिए हुए काबुल जाने वाली बसों में सवार हो रहे थे. वे देश छोड़ने की उम्मीद से काबुल जा रहे थे.

लेकिन जब से अमेरिकी सैनिक काबुल से गए हैं, पिछले कुछ दिनों में मज़ार-ए-शरीफ से काबुल आने वाले लोगों की तादाद बढ़ गई है. मजीब भी उज़्बेकिस्तान बॉर्डर के रास्ते बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं.

मजीब भी देश छोड़ने के लिए बेक़रार हैं लेकिन वे नहीं जानते कि इसमें क़ामयाब हो पाएंगे या नहीं. वे कहते हैं, "तालिबान यहाँ पर है और वे नहीं चाहते हैं कि लोग देश छोड़कर जाएं."

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लश्कर गाह की एक मोबाइल क्लीनिक में महिलाएं और बच्चे

लश्कार गाह, हेलमंद प्रांत

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अफ़ग़ानिस्तान के दक्षिणी सूबे हेलमंद में संघर्ष के दौरान ब्रितानी सैनिकों का अड्डा हुआ करता था. तालिबान ने 13 अगस्त को इसे अपने अधिकार में ले लिया. हेलमंद की राजधानी लश्कर गाह में हफ़्तों भीषण लड़ाई चली.

डॉक्टर विक्टर यूरोसेविक अपने दफ़्तर के नोटिसबोर्ड की ओर इशारा करते हैं, जिस पर प्लास्टिक की कई छोटी थैलियां लटकी हैं. इन थैलियों में गोलियां हैं. वो कहते हैं, "हम इसे शर्म की दीवार कहते हैं."

वे एक थैली हटाकर अपना कैमरा फिट करते हैं ताकि वो हमें वीडियो इंटरव्यू दे सकें. वे बताते हैं कि "मैंने ये गोलियां अपने नौजवान मरीज़ों के शरीर से निकाली हैं. इनमें ज़्यादातर बड़े हथियारों की गोलियां हैं."

डॉक्टर विक्टर यूरोसेविक लश्कर गाह के एक अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में काम करते हैं. अब लड़ाई ख़त्म हो गई है. अस्पताल में पहले की तरह मरीज़ों की भीड़ नहीं है. बाहर बमों और गोलियों का बरसना रुक गया है. सड़कों पर शांति है.

वे कहते हैं, "बहुत अजीब लगता है. मैं यहाँ सालों से हूँ लेकिन इतना सन्नाटा पहले कभी नहीं देखा. मैं इसे तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी के तौर पर देख रहा हूँ. मैं उम्मीद करता हूँ कि ऐसा न हो. देखते हैं कि आगे क्या होता है."

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अमेरिकी के जाते ही तालिबान लड़ाकों ने क्या-क्या किया?

डॉक्टर विक्टर यूरोसेविक बताते हैं, "लश्कर गाह में बमबारी के कारण कई इमारतें बर्बाद हो गई हैं. लड़ाई के समय जो लोग यहाँ से चले गए थे, वे अब लौट आए हैं. वे सड़कों पर सो रहे हैं. मस्जिदों के सामने सो हे हैं. उनके पास अपने घर फिर से बनाने के लिए पैसा नहीं है. उनमें से कई लोग बेघर हैं या अपने रिश्तेदारों के साथ रहने को मजबूर हैं."

उन्होंने बताया कि बहुत से परिवार ग़रीबी में रह रहे हैं, दिन के एक वक़्त के खाने के लिए मोहताज हैं. कई दिनों से बैंक बंद हैं. इस वजह से भी परेशानी और बढ़ गई है."

तालिबान के आने के बाद कई विदेशी सहायता कर्मी जो यहाँ लोगों को मदद पहुँचा रहे थे, देश छोड़कर जा चुके हैं. सर्बिया के डॉक्टर विक्टर यूरोसेविक उन लोगों में से हैं, जिन्होंने यहां रुकने का फ़ैसला किया है.

वे कहते हैं, "हमारी एक ज़िम्मेदारी है. हम इस प्रांत का एक मात्र ट्रॉमा सेंटर चला रहे हैं. लोगों को खाने की ज़रूरत है, लोगों को पैसा चाहिए. उन्हें दवाओं की ज़रूरत है."

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बदख़्शान से विस्थापित होने वाले लोगों की फ़ाइल फ़ोटो

बदख़्शान

अफ़ग़ानिस्तान के सबसे ग़रीब सूबों में से एक बदख़्शान देश के पूर्वोत्तर में स्थित है. ताजिकिस्तान से इसकी सीमा लगती है. तालिबान ने 11 अगस्त को बदख़्शान की राजधानी को अपने दखल में ले लिया था.

अब्दुल इसी बदख़्शान में डॉक्टर हैं. पिछली बार जब तालिबान इस देश की हुकूमत चला रहा था तो अब्दुल उस वक़्त मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे. वे बताते हैं, "उस वक़्त हालात बहुत ही ख़राब थे और उनका बर्ताव वैसा ही है जैसा पहले हुआ करता था. मैं कोई फ़र्क़ नहीं देख पा रहा हूं."

अब्दुल ने बीबीसी को एक अस्पताल से कई तस्वीरें भेजीं. अस्पताल जिस इलाक़े में है, वहाँ तालिबान का कड़ा पहरा है. एक तस्वीर में डेढ़ साल का एक कमज़ोर बच्चा बिस्तर पर पड़ा है. उसकी माँ स्टाफ़ से बच्चे को बचाने के लिए मिन्नत कर रही है.

अब्दुल बताते हैं कि बच्चे को कुछ खिलाने के लिए उस महिला के पास पैसे नहीं थे. वो बताते हैं, "हर गुजरते दिन के साथ बच्चों में कुपोषण की समस्या बढ़ती जा रही है."

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तालिबान का ऐसा डर है कि हर रोज़ ठिकाने बदल रहे हैं

संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि अफ़ग़ानिस्तान में पाँच साल से कम उम्र के आधे से ज़्यादा बच्चे अगले साल भीषण कुपोषण की समस्या का शिकार हो सकते हैं.

बदख़्शान में बहुत से लोग पहले से ही ग़रीबी से जूझ रहे थे. लेकिन तालिबान ने जब से कमान संभाली है, खाने-पीने की चीज़ों और तेल की क़ीमतें बढ़ गई हैं. सरकारी कर्मचारियों का काम बंद हो गया है. कुछ लोगों को पिछले कई महीनों से उनकी पगार नहीं मिली है.

डॉक्टर अब्दुल को महिलाओं के अधिकारों को लेकर भी चिंता महसूस होती है. हालाँकि महिला मेडिकल स्टाफ़ को काम करने की इजाज़त नहीं दी गई है. लेकिन उनका कहना है कि अन्य महिलाओं को काम पर जाने की इजाजत नहीं दी जा रही है.

अब्दुल ने बताया कि छठी क्लास से ऊपर की कक्षाओं में पढ़ने वाली लड़कियों को स्कूल जाने से मना कर दिया गया है. "लोगों को अब भविष्य की कोई उम्मीद नहीं रह गई है. बदख़्शान में लोगों के लिए अब कोई मौका नहीं रह गया है."

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हेरात शहर में तालिबान का एक गश्ती दल

हेरात

सिल्क रूट पर पड़ने वाले हेरात शहर की सीमाएं ईरान से लगती हैं. इसे अफ़ग़ानिस्तान के सबसे उदारवादी शहरों में देखा जाता रहा है. काबुल से अमेरिकी सैनिकों के जाने के अगले दिन ही सैकड़ों तालिबान समर्थक शहर की सड़कों पर उतर आए थे.

दूसरे लोग डर की वजह से अपने घरों में रहे. गुल जब बीबीसी से बात कर रहे थे, तो वे थोड़ी देर पहले ही बाज़ार से घर लौटे थे. उन्होंने बताया, "पूरे बाज़ार में तालिबान बंदूक़ों के साथ खड़े हैं. आप सड़कों पर समृद्ध लोग या महिलाओं और लड़कियों को नहीं देख पाएंगे क्योंकि वे सभी तालिबान से डरे हुए हैं."

गुल की पत्नी अफसून अब बिना किसी पुरुष के घर से बाहर नहीं निकल सकती हैं. उन्हें बुर्का पहनना होता है जिसमें उनका चेहरा पूरी तरह से ढंका हुआ रहता है. वो कहती हैं, "मेरी बेटी का भविष्य अंधकारमय हो गया है."

गुल की बहन एक डॉक्टर हैं. गुल ने बताया कि मेरी बहन को कहा गया था कि वे कुछ हफ़्तों तक अपने क्लीनिक न जाएं जबकि तालिबान नेताओं ने मेडिकल क्षेत्र की महिलाओं को काम पर लौटने की इजाज़त दे रखी है. हालांकि कुछ दिनों के बाद वो अन्य महिलाओं के साथ काम पर जा पाईं.

वे कहते हैं कि अभी भी कई महिलाएं घर में ही रहने को मजबूर हैं. गुल और उनका परिवार अभी भी देश छोड़ने की उम्मीद कर रहा है. वे कहते हैं, "हम कहीं भी चले जाएंगे. अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस. कहीं भी."

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