तालिबान वाले अफ़ग़ानिस्तान में चीन की राह में क्या हैं रोड़े?

  • सरोज सिंह
  • बीबीसी संवाददाता
मुल्लाह अब्दुल ग़नी बरादर के साथ चीनी विदेश मंत्री

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मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर के साथ चीनी विदेश मंत्री

किसी भी घटनाक्रम को दो नज़रिए से देखा जा सकता है. किसी के लिए वो 'आपदा' बन जाती है तो दूसरे के लिए 'अवसर'.

विदेश मामलों के कई जानकार मानते हैं कि अमेरिका के जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान में जो जगह बनी है, चीन उसे भरने की कोशिश करेगा.

एक तरफ़ तो चीन की चिंता है कि वीगर मुसलमान और 'चीन विरोधी आतंकवादी संगठन' ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) के सदस्य अफ़गानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल उसके ख़िलाफ़ गतिविधियों को अंजाम देने के लिए कर सकते हैं.

तो दूसरी तरफ़ चीन की नज़र अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन में दबे खनिज संसाधनों पर हैं. वो ये भी चाहता है कि अफ़ग़ानिस्तान भी उसके बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) परियोजना का हिस्सा बन जाए, ताकि यूरोप-एशिया में उसका दबदबा रहे.

लेकिन चीन की चिंता और निवेश के बीच की राह इतनी भी आसान नहीं, जितनी प्रतीत होती है.

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यही वजह भी है कि चीन ने ये ज़रूर कहा है कि 'सभी पक्षों' का तालिबान से संपर्क करना और उसे 'सक्रिय रूप से राह दिखाना' चाहिए, लेकिन अंतरिम सरकार को मान्यता देने के सवाल पर अभी भी चीन ने स्थिति स्पष्ट नहीं की है.

पहले ब्रिटेन ने अफ़ग़ानिस्तान पर अपना सिक्का जमाने की कोशिश की, फिर रूस ने उसे अपना साम्राज्य बनाना चाहा और हाल में अमेरिका ने भी एक कोशिश की.

दुनिया की तीन बड़ी शक्तिशाली ताक़तों के इतिहास को देख कर आसानी से समझा जा सकता है कि अफ़ग़ानिस्तान पर शासन करना बहुत आसान काम नहीं है. इन दिनों देशों से सबक लेते हुए चीन, अफ़ग़ानिस्तान के मामले में किस हद तक दखल देगा, ये समय बताएगा.

लेकिन चीन की विदेश नीति को क़रीब से परखने वाले जानकार मानते हैं कि चीन केवल अपने हितों के बारे में सोचता है.

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शिनजियांग में चुनौती

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चीन के शिनजियांग की सीमा अफ़ग़ानिस्तान से मिलती है और यहाँ क़रीब 10 लाख वीगर मुसलमान हैं.

चीन को डर है कि तालिबान के आने के बाद वीगर मुसलमान और 'चीन विरोधी आतंकवादी संगठन' ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) वहाँ एक बार फिर सक्रिय हो जाएँगे, जैसे 1996 से 2001 के दौरान रहे थे.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडी के प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, "चीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी है और मौक़ा भी है कि वो तालिबान को राज़ी कर लें कि अपनी ज़मीन का इस्तेमाल चीन विरोधी आतंकवादी गतिविधियों के लिए नहीं होने देगा. तालिबान ने चीन, रूस, भारत सबसे इस बारे में वादा तो किया है. लेकिन अपने वादे पर तालिबान कितना क़ायम रहता है, यही देखना होगा."

तालिबान ने समावेशी सरकार, महिलाओं को काम करने की इजाज़त और सरकार में महिलाओं की भागीदारी जैसे कई दूसरे वादे भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने किए थे, लेकिन अंतरिम सरकार में किसी का पालन नहीं हुआ, ये दुनिया ने देखा.

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तोरखम सीमा चौकी पर पाकिस्तान और तालिबान के सुरक्षा गार्ड

बीआरआई परियोजना

दुनिया में और ख़ास तौर पर यूरोप-एशिया में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना है बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई), जिसका एक हिस्सा है चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी सीपेक. सीपेक एक व्यापारिक नेटवर्क है. बीआरआई परियोजना के तहत चीन सड़क, रेल और जलमार्गों के माध्यम से यूरोप, अफ़्रीका और एशिया को जोड़ना चाहता है.

हाल के सालों में ईरान, रूस, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान जैसे देशों ने सीपेक के साथ जुड़ने के लिए रुझान दिखाना शुरू कर दिया था. लेकिन मुश्किल ये थी कि अमेरिका के दबाव में अफ़ग़ानिस्तान सरकार ने इसके लिए हरी झंडी नहीं दी थी.

अब तालिबान ने इसके साथ जुड़ने की बात कही है. चीन इससे उत्साहित भी है.

प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह कहते हैं, "इसमें एक चुनौती जो चीन को पेश आएगी, वो है ज़मीन पर जब परियोजना लॉन्च होगी. तालिबान के शीर्ष नेतृत्व की बात उनके नीचे के लोग कितना मानेंगे, ये देखना होगा. तालिबान के अंदर कई अलग-अलग गुट हैं, जिसकी वजह से अंतरिम सरकार की स्थिरता को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं. इस परियोजना को पूरी तरह से अफ़ग़ानिस्तान में अमल में जल्द से जल्द लाया जाए, ताकि यूरोप और एशिया के कई दूसरे देश इससे जुड़ सकें, ये चीन की दूसरी बड़ी चुनौती होगी."

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हिबतुल्लाह अख़ुंदज़ादा (बाएं) अयमान अल-ज़वाहिरी (दाएं)

चीनी निवेश की सुरक्षा की चुनौती

स्वर्ण सिंह आगे कहते हैं, "तालिबान जब सत्ता में आता है, तो दूसरे मेहमान भी एक्टिव हो जाते हैं. एक बार के लिए मान लें कि तालिबान के कहने पर ज़मीन पर बीआरआई परियोजना में चीन को कोई दिक़्क़त नहीं आएगी. लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के अन्य चरमपंथी गुटों से भी चीन के निवेश को ख़तरा हो सकता है. तालिबान चीन के निवेश के लिए सुरक्षा मुहैया करा पाएगा क्या?"

कहा जाता है कि चीन और पाकिस्तान एक दूसरे के हर मौसम के दोस्त हैं. लेकिन चीन, पाकिस्तान में अपने निवेश की सुरक्षा को लेकर आज तक आश्वस्त नहीं हो पाया है.

हाल ही में पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत में एक 'बस हादसे' में कम से कम 13 लोग मारे गए थे, जिनमें 9 चीनी नागरिक थे. ये डासू बांध परियोजना पर काम कर रहे थे.

ऐसे में चीन अगर अफ़ग़ानिस्तान में किसी तरह के निवेश के बारे में सोचता है, तो उसके लोगों की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती होगी.

अलग रणनीति का लाभ

इसी चुनौती के बारे में दिल्ली स्थित थिंक टैंक 'ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन' में स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ प्रोग्राम' के प्रमुख प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत कहते हैं कि चीन की रणनीति दूसरे देशों में बिल्कुल अलग होती है. वो अमेरिका और रूस की तरह काम नहीं करता.

अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दे पर भी वो 'सभी पक्षों' का तालिबान से संपर्क करना और उसे 'सक्रिय रूप से राह दिखाने' की बात कर रहा है. उसकी कोशिश होगी कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद दिलवा कर अपनी राह वहाँ आसान करने की बजाए ख़ुद ज़्यादा निवेश करे.

हाल ही में अलग-अलग देशों ने कुल मिला कर 1.1 बिलियन डॉलर के निवेश का वादा किया है.

एससीओ की बैठक

प्रोफ़ेसर हर्ष पंत, इस सिलसिले में 16-17 सितंबर को ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में होने वाली शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (एससीओ) बैठक को भी बेहद अहम मानते हैं. वहाँ अफ़ग़ानिस्तान और तालिबान के मुद्दे पर चर्चा होनी है.

एससीओ के आठ स्थायी सदस्य हैं. ये हैं- चीन, भारत, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान और उज़्बेकिस्तान.

हाल में रूस और भारत के बीच तालिबान पर दो राउंड की बातचीत हो चुकी है. 24 अगस्त को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र ने रूसी राष्ट्रपति से फोन पर बात की थी. पिछले सप्ताह रूसी सिक्यॉरिटी काउंसिल के सचिव जनरल निकोलाई पात्रुशेव ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, एनएसए अजित डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाक़ात की.

रूस अब तालिबान की नई सरकार को लेकर उतना उत्साहित नहीं दिख रहा, जैसे पहले दिख रहा था.

प्रोफ़ेसर हर्ष पंत कहते हैं, "एससीओ में रूस का दबदबा चीन से ज़्यादा है. भारत के साथ हाल में हुई बातचीत से लगता है कि रूस का नज़रिया थोड़ा बदला है. अफ़ग़ानिस्तान का पंजशीर प्रांत, ताज़िक बहुल इलाक़ा है. वहाँ विरोध दबाने के लिए तालिबान और पाकिस्तान ने जो कुछ किया है, उससे ताजिकिस्तान भी पाकिस्तान के विरोध में ही रहेगा. कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान का रुख़ बहुत हद तक रूस पर निर्भर करता है. ऐसे में पहले जो लग रहा था कि भारत एससीओ की बैठक में अलग-थलग पड़ेगा, वो अब बदलता हुआ प्रतीत हो रहा है."

चीन के लिए ये एक नई परेशानी का सबब बन सकता है.

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रूस के साथ संबंध

ऐसे में एससीओ की बैठक में तालिबान की नई सरकार को लेकर चीन के पक्ष की कोई सकारात्मक बात निकले, इसकी संभावना हर्ष पंत को कम ही लगती है.

वहीं प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह आशंका जताते हैं कि आने वाले वक़्त में अगर चीन का दबाव अफ़ग़ानिस्तान में बढ़ता है, तो हो सकता है यूरोप-एशिया में रूस उसे अपने प्रभुत्व को चुनौती के तौर पर देखे. ऐसे में दोनों देशों की आपसी हितों की टकराहट हो सकती है.

इस वजह से स्वर्ण सिंह कहते हैं कि चीन की चुनौती ये होगी अफ़ग़ानिस्तान में अपने हितों को देखते हुए आने वाले दिनों में किस तरह से रूस के साथ रिश्तों को बनाए रखता है.

अमेरिका के ख़िलाफ़ मोर्चा तैयार करने में रूस का साथ भी चीन को चाहिए.

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खनिज संसाधन

अफ़ग़ानिस्तान में अपार खनिज संसाधन है. लेकिन फिर भी वहाँ की अर्थव्यवस्था का आधार खनिज संसाधन नहीं, बल्कि कच्चा अफीम ही रहा है.

एक अनुमान के मुताबिक़ लिथियम, कॉपर और अन्य दुर्लभ धातुओं का अफ़ग़ानिस्तान में 3 ट्रिलियन डॉलर का भंडार है. लेकिन इनके खनन के लिए पैसा, तकनीक और आधारभूत संरचना की ज़रूरत है, जो अफ़ग़ानिस्तान के पास नहीं है.

20 साल में अपनी मौजूदगी के दौरान अमेरिकियों ने खनन उद्योग के विकास के लिए अनुकूल स्थितियाँ बनाने की कोशिश की. उन्होंने अभिलेखागार से सोवियत मानचित्र निकाले और उनके आधार पर अपने मैप बनाने शुरू किए थे.

चीन और तालिबान के रिश्ते बेहतर हैं, लेकिन दोनों जानकार मानते हैं कि चीनी कंपनियाँ भी 'गृहयुद्ध' की स्थिति में बड़ी रकम निवेश करने से बचेंगी. चीन चाहता है कि पहले दुनिया के दूसरे देश तालिबान को मान्यता दे. इसलिए चीन ने उम्मीद नहीं छोड़ी है, लेकिन वो किसी तरह की जल्दबाज़ी में नहीं दिख रहा हैं.

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