जलवायु परिवर्तन: भारत को दी गई डेडलाइन पर है दुनिया की नज़र

  • नवीन सिंह खड़का
  • पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी
जलवायु

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अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष जलवायु दूत जॉन केरी ने पिछले सप्ताह भारत में अलग-अलग मंत्रियों के साथ मुलाक़ात की. इन मुलाक़ातों के दौरान जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल पर चर्चा हुई.

जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल पर मुलाक़ातें तो हुईं लेकिन इस बारे में अभी भी कोई स्पष्टता नहीं है कि भारत की अपने शून्य-उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए क्या योजना है.

जॉन केरी कार्बन-उत्सर्जन में कटौती के महत्वाकांक्षी लक्ष्य की प्राप्ति के प्रमुख उत्सर्जक देशों के साथ मुलाक़ात कर रहे हैं. हालांकि चीन ने जलवायु के मुद्दे को दूसरे मुद्दों से इतर रखने की उनकी बात को ख़ारिज कर दिया है.

ख़बरों के मुताबिक़ वांग यी ने जॉन केरी से कहा कि है चीन-अमेरिका जलवायु परिवर्तन सहयोग को चीन-अमेरिका संबंधों के समग्र वातावरण से अलग नहीं किया जा सकता है.

भारत और अमेरिका ने भारत-अमेरिका जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा एजेंडा 2030 साझेदारी के तहत 'क्लाइमेट एक्शन एंड फ़ाइनेंस मोबिलाइज़ेशन डायलॉग' (सीएएफएमडी) शुरू किया है जिसे लेकर भारत ने खुशी जताई है.

इसका मुख्य उद्देश्य भारत को अपने 450 गीगावाट (जीडब्ल्यू) नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य हासिल करने में मदद करना है.

लेकिन भारत अपने कार्बन उत्सर्जन को आवश्यक स्तर तक लाने के लिए क्या प्रयास कर रहा है और उसकी क्या योजनाएं हैं इसे लेकर कुछ भी स्पष्टता नहीं है.

नेट ज़ीरो और देशों की स्थिति

नेट-ज़ीरो का अर्थ है जितना संभव हो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना.

नेट-ज़ीरो को इस तरह भी समझा जा सकता है किसी देश का कुल कार्बन-उत्सर्जन शून्य हो जाये. यानी जो भी मानव जनित कार्बन उत्सर्जन हो रहा है वह सिंक हो जाए.

इस तरह वातावरण में जाने वाली कार्बन की मात्रा शून्य होगी. जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग के ख़तरे से निपटा जा सकेगा. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये स्वच्छ ऊर्जा के प्रयोग को बढ़ाने और वृक्षारोपण जैसे उपाय अपनाने होंगे.

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ऐसे दिनों की संख्या बढ़ रही है जब तापमान 50 डिग्री या उससे ज़्यादा हो रहा है.

चीन, दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश है. चीन पहले ही घोषणा कर चुका है कि वह 2060 तक कार्बन न्यूट्रल हो जाएगा.

चीन ने यह भी कहा है कि उसका उत्सर्जन 2030 से पहले अपने चरम पर पहुंच जाएगा. हालांकि चीन नए कोयला संयंत्रों के निर्माण को लेकर आपत्ति भी रखता है.

दूसरे सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश अमेरिका ने नेट-ज़ीरो तक पहुंचने के लिए 2050 तक का लक्ष्य रखा है. अमेरिका का कहना है कि वह 2035 तक अपने पावर सेक्टर को डी-कार्बोनाइज़ कर देगा.

लेकिन दुनिया के तीसरे सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश भारत ने न तो अपने लिए नेट-ज़ीरो का कोई लक्षित वर्ष तय किया है और न ही उसने संयुक्त राष्ट्र को अभी तक कोई प्रस्तावित योजना ही दी है. जबकि पेरिस समझौते के तहत हर पांच साल में यह देना आवश्यकता है.

हालांकि, संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि समझौते में भाग लेने वाले 191 देशों में से अब तक केवल 113 देश ही बेहतर योजनाओं और नीतियों के साथ आए हैं.

पेरिस समझौते में तय लक्ष्य

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पेरिस जलवायु समझौते का उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को दो डिग्री से नीचे तक सीमित करना है.

अब तक प्रस्तुत की गई जलवायु योजनाओं के विश्लेषण से पता चलता है कि वास्तव में कार्बन उत्सर्जन 2030 तक 16% बढ़ने के लिए निर्धारित है, जिससे औद्योगिक क्रांति से पहले के तापमान की तुलना में 2.7 सेंटीग्रेड तापमान बढ़ सकता है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि तब से दुनिया पहले ही 1.1 डिग्री गर्म हो चुकी है और अगर पेरिस समझौते में तय किये गए लक्ष्य को पाना है तो 2030 तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में 45% की कटौती करने की आवश्यकता है.

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की हालिया रिपोर्ट ने यहां तक चेतावनी दी है कि तापमान में वृद्धि के कारण पृथ्वी की कुछ जलवायु प्रणालियां पहले से ही ख़तरनाक तौर पर असंतुलित हो चुकी हैं.

ग्लास्गो में आगामी प्रमुख जलवायु शिखर सम्मेलन, COP26 से पहले उम्मीद की जा रही है कि जिन देशों ने अभी तक अपनी योजनाओं का ब्यौरा नहीं दिया है वे दे देंगी. इसे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) के रूप में जाना जाता है. ऐसे में अब दुनिया भर की निगाहें भारत पर हैं.

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पिछले हफ्ते अपनी दिल्ली-यात्रा के दौरान जॉन केरी ने इस मुद्दे पर तो विशेष तौर पर ज़ोर नहीं दिया लेकिन उन्होंने नेट ज़ीरो एजेंडे पर ज़रूर ज़ोर दिया.

सीएएफ़एमडी के शुभारंभ के दौरान उन्होंने कहा, "हमें उभरती हुई प्रौद्योगिकी को विकसित करने और उन्हें बढ़ाने की ज़रूरत है जो नेट ज़ीरो ट्रांजिशन के लिए महत्वपूर्ण होंगी. इस पर ज़ोर देना चाहिए."

उसी कार्यक्रम के दौरान, भारत के जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने न तो नेट-ज़ीरो पर कोई टिप्पणी की और ना ही कार्बन उत्सर्जन को कम करने के किसी लक्ष्य के बारे में ही कुछ कहा.

इसके बजाय उन्होंने भारत की वर्तमान जलवायु योजना का बचाव ज़रूर किया.

अपने पहले एनडीसी में, भारत ने 2005 के अपने कार्बन उत्सर्जन स्तर को 2030 तक 33-35 फ़ीसद तक कम करने की प्रतिबद्धता जतायी थी. भारतीय अधिकारियों का दावा है कि वे इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे.

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लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि विभिन्न देशों ने पहले एनडीसी में जो वादे किये हैं और पेरिस समझौते को पूरा करने के लिए जो आवश्यक शर्तें हैं, उनमें बड़ा अंतर है.

ऐसे में कार्बन-कटौती की प्रतिबद्धता को और बढ़ाने की आवश्यकता है.

भारत से अपेक्षा

लेकिन भारत यह तर्क देता रहा है कि उससे विकसित देशों की तरह कार्बन-कटौती करने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए क्योंकि यह अभी विकासशील देश है और ग़रीबी से लड़ रहा है. साथ ही जीवाश्म ईंधन पर उसकी निर्भरता भी काफी अधिक है.

पिछले हफ्ते जॉन केरी से मुलाकात के बाद भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ट्वीट किया, "@ClimateEnvoy जॉन केरी को देखकर अच्छा लगा. क्लाइमेट एक्शन और क्लाइमेट जस्टिस पर हमारी चर्चा जारी है."

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COVER STORY: क्लाइमेट चेंज का भारत पर असर

अपनी यात्रा के अंत में जॉन केरी ने अक्षय ऊर्जा पर भारत के ट्रैक रिकॉर्ड की प्रशंसा की लेकिन नेट-ज़ीरो और उत्सर्जन में कमी करने की प्रतिबद्धता पर कुछ नहीं कहा.

उन्होंने कहा कि मैं उम्मीद कर रहा हूं कि भारत COP (26) में जाने से पहले कुछ ऐसी योजना की घोषणा करेगा जैसा हमने अभी तक किसी दूसरे देश से नहीं सुना.

भारतीय अख़बारों के हवाले से कहा गया है कि अगर भारत वास्तव में वही करता है जो जॉन केरी उम्मीद करते हैं, तो भारत का यह क़दम अमेरिका को वैश्विक जलवायु शासन में नेतृत्व हासिल करने में मदद कर सकता है, ख़ासकर तब जब अमेरिका जलवायु के मोर्चे पर भी चीन का सामना करता है.

लेकिन क्या होगा अगर भारत ऐसा नहीं करता है तो....और अगर चीन अपनी मौजूदा की स्थिति जारी रखता है तो?

या क्या फिर दोनों विकसित देश तमाम दूसरे मुद्दे अलग रखते हुए इस मसले पर एक साथ आएंगे?

इन सवालों का कोई आसान सा जवाब नहीं है.

लेकिन भारत और चीन जो भी करेंगे उसका वैश्विक जलवायु कार्रवाई पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ेगा.

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