पाकिस्तान का वो हिंदुस्तानी क्रांतिकारी 'हीरो'

भारत की आज़ादी के नायकों में से एक भगत सिंह का 105वां जन्मदिन उन्हें प्यार करने वालों ने श्रद्धापूर्वक मनाया. वो भगत सिंह जिनका जन्म लायलपुर में हुआ जो अब पाकिस्तान में है...वो भगत सिंह जो अविभाजित भारत की आज़ादी के लिए लड़े.

भगत सिंह और पाकिस्तान

लेकिन भगत सिंह का जन्मदिन मनाने के लिए जब उनके भारतीय प्रशंसकों ने पाकिस्तान जाना चाहा तो उन्हें वीज़ा ही नहीं मिला.

भगत सिंह पर काम कर चुके प्रोफेसर चमनलाल समेत करीब 30 लोग पाकिस्तान जाना चाहते थे लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी. प्रोफेसर चमनलाल ने ईमेल में लिखा है, "हमने शाम साढ़े पाँच बजे तक पाकिस्तानी उच्चायोग पर इंतज़ार किया. अधिकारी बहुत अच्छे से पेश आए पर उन्होंने अफसोस जताया कि पाकिस्तान के आंतरिक मंत्रालय ने हरी झंडी नहीं दी."

वीज़ा न मिलने की आधिकारिक वजह अभी पता नहीं चल पाई है. इसे लेकर सीमा के दोनों ओर भगत सिंह के प्रशंसकों में भारी नाराज़गी है.

'पाकिस्तान के भी हीरो'

आम धारणा शायद यही है कि भगत सिंह भारत में क्रांतिकारियों के बड़े नायक हैं लेकिन पाकिस्तान में लोगों से बात करें तो पता चलता है कि वहाँ भी उन्हें शिद्दत से याद किया जाता है..

यूनुस चौधरी पाकिस्तान में कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं और लाल थिएटर ग्रुप के संस्थापक हैं. यूनुस चौधरी कहते हैं कि पाकिस्तान में भगत सिंह आज भी ज़िंदा है.

वे कहते हैं, "पाकिस्तान की स्कूली किताबों में भले ही भगत सिंह का ज़िक्र न हो लेकिन भगत सिंह को पाकिस्तान के लोग भूले नहीं हैं. आज़ाद कश्मीर में जेकेएनएसएफ नाम के संगठन की रैलियों में भगत सिंह और चे ग्वेरा को हीरो मानते हैं. ब्लूचिस्तान में छात्र संगठन भी भगत सिंह को याद करते हैं. कई गैर सरकारी संगठन और अन्य छात्र संगठन भगत सिंह की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. इसलिए भगत सिंह पाकिस्तान में आज भी ज़िंदा हैं."

वैसे भारत में भगत सिंह के जन्मदिन पर चंद कार्यक्रम हुए. हालांकि सरकारी स्तर पर भगत सिंह उपेक्षित ही रहे हैं. भगत सिंह के भतीजे किरनजीत संधू इससे दुखी हैं तो पर भगत सिंह के क्रांतिकारी शब्दों को याद कर वे नाउम्मीद नहीं.

'ज़िंदा रहेंगे विचार'

किरनजीत संधू कहते हैं, "दुख तो होता है. शायद सरकार को लगता होगा कि भगत सिंह को याद करने से समाज के अच्छे लोग सक्रिय हो जाएँगे. भगत सिंह जी ने मेरे पिता यानी अपने भाई को जेल से आखिरी खत लिखा था...उन्होंने लिखा था हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली ये मुश्ते खाक़ है फ़ानी रहे....रहे न रहे.यानी ये शरीर तो मुट्ठी भर राख है रहे न रहे लेकिन मेरे विचार ज़िंदा रहेंगे."

उधर लेबर पार्टी ऑफ पाकिस्तान ने भारतीय दल को वीज़ा न मिलने पर नाराज़गी जताई है.प्रोफेसर चमन लाल को लिखी ई-मेल में लेबर पार्टी ऑफ पाकिस्तान के फारुख़ तारिक ने कहा है, "भगत सिंह पर कार्यक्रम की मेज़बानी करने वाले संगठन के पास खुफिया एजेंसी के अधिकारी तीन बार आए. हमने पाकिस्तान आने वाले सारे भारतीयों के बारे में उन्हें बताया था. इस छानबीन में खुफिया विभाग के अधिकारियों ने जितना पैसा खर्च किया वो किसी बेहतर काम के लिए लगा सकते थे."

केवल 23 साल की उम्र में अंग्रेज़ों ने उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया था. भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में 1931 में फाँसी दे दी गई थी.

क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने नई दिल्ली की सेंट्रल एसेंबली में आठ अप्रैल, 1929 को बम और पर्चे फेंके थे. इस घटना में किसी की मौत नहीं हुई थी और भगत सिंह का कहना था कि उनका मक़सद केवल 'अंग्रेज़ सरकार को जगाने का था.' दोनों क्रांतिकारियों को सेंट्रल एसेंबली से ही गिरफ़्तार कर लिया गया था.

इसके बाद भगत सिंह पर ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने का आरोप लगा. इसी के साथ भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के ख़िलाफ़ लाहौर षड्यंत्र का मामला चला और उन्हें इसी मामले में फँसी हुई.

भगत सिंह को जितना भारत से जोड़ कर देखा जाता है, उतना ही पाकिस्तान से.भगत सिंह ने पाकिस्तान की सरजमीं पर जन्म लिया. वहीं पले बढ़े. . आखिर शायद इसलिए वो हिंदुस्तान के नही बल्कि पाकिस्तान में भी कई लोगों के नायक हैं.

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