बामियान को सँवारने की कोशिश

 बुधवार, 24 अक्तूबर, 2012 को 09:09 IST तक के समाचार
बामियान

लंबे समय से गृह युद्ध के चलते बामियान में पर्यटन उद्योग खतरे में है

अफगानिस्तान के ऊँचे पहाड़ों में स्थित बंद-ए-अमीर की झीलें चार दशकों से युद्ध की आग में झुलस रहे इस देश में न होतीं, तो निश्चित तौर पर उनकी पहचान विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के रूप में होती.

बाहर से आने वाले लोग लाल और नारंगी चट्टानों से घिरी नीले पानी वाली झीलों को देखते हैं तो आँखें टिक-सी जाती हैं.

अफगानिस्तान के बामियान प्रांत में स्थित ये झीलें वहां के पहले राष्ट्रीय पार्क हैं जहां हर साल हजारों स्थानीय दर्शक इन्हें देखने के लिए आते हैं.

सरकार को उम्मीद है कि एक दिन विदेशी पर्यटक भी यहां बड़ी संख्या में आएंगे.

यह अभी भले ही असंभव लग रहा है, लेकिन अफगानिस्तान सरकार और संयुक्त राष्ट्र ने यहां के विकास के लिए देश के पहले पर्यावरण संरक्षण योजना बनाई है जिसकी शुरुआत के तौर पर सौर ऊर्जा से काम करने वाली केतली यानी 'सोलर केटल' बाँटी जा रही है.

लेकिन बामियान के वीरान पहाड़ी घाटी में रहने वाले लोगों के लिए सबसे बड़ा खतरा तालीबान से नहीं है, बल्कि मानव द्वारा निर्मित सूखे से है,

जलवायु परिवर्तन से स्थितियां काफी कठिन हो रही हैं और इन झीलों के लिए भी इससे खतरा पैदा हो रहा है.

हिमनद

इस प्रांत में हिन्दुकुश के पश्चिमी छोर पर कोह-ए-बाबा की पहाड़ियों पर मौजूद हिमनद लगातार सिकुड़ रहे हैं.

दरअसल, समुद्र तल से करीब तीन हजार मीटर की ऊँचाई पर स्थित इस इलाके में जीवन और खेती दोनों ही बहुत कठिन रहे हैं.

"गांव इस वजह से भी खाली हो रहे हैं क्योंकि गर्मियों में यहां बाढ़ आती है और सर्दियों में भूस्खलन होता है."

एंड्रयू स्कैन्लन, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के प्रमुख

लेकिन ईंधन के लिए पेड़-पौधों को काटने की वजह से ये समस्या और बढ़ गई है.

इसी वजह से हर साल यहां से सैकड़ों अफगानी परिवारों को पलायन करना पड़ता है.

पेड़ों और वनस्पतियों के कट जाने की वजह से यहां के ज्यादातर पहाड़ गंजे सिर की तरह दिखाई देते हैं जहां थोड़ी बहुत मौसमी झाड़ियां भर उगी रहती हैं.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के एंड्रयू स्कैन्लन कहते हैं, “गांव इस वजह से भी खाली हो रहे हैं क्योंकि गर्मियों में यहां बाढ़ आती है और सर्दियों में भूस्खलन होता है.”

लेकिन फिलहाल वो क़जान घाटी में नए पौधों और घास लगावाने की देख-रेख कर रहे हैं.

सफाई और निर्माण कार्य के लिए अफगान मजदूरों को परंपरागत औजारों की बजाय आधुनिक औजार मुहैया कराए जा रहे हैं और उनका प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

'सोलर केटल'

एक अफगानी गैर सरकारी संगठन ‘कंजर्वेशन ऑर्गेनाइजेशन फॉर दा अफगान माउंटेन्स’ यानी सीओएएम की ओर से गाँव वालों को ये उपकरण मुहैया कराए जा रहे हैं.

बामियान की झीलें

बामियान की झीलों को संरक्षित किया जा रहा है ताकि यहां पर्यटकों को आकर्षित किया जा सके

स्कैन्लॉन इस योजना को और जगहों में भी लागू करना चाहते हैं.

इसके अलावा सीओएएम एक और ऊर्जा संरक्षण उपकरण सौर केतली को भी बढ़ावा दे रहा है.

ये एक ऐसा बड़ा सैटेलाइट डिश है जो कि सूर्य की किरणों को बीच में रखी एक केतली में परावर्तित कर देता है.

डिश जितना बड़ा होता है, चीजें उतनी जल्दी बनती हैं. लेकिन समस्या ये है कि करीब सौ डॉलर में बिकने वाली इस डिश से एक कप चाय बनने में बीस मिनट लग जाते हैं.

अब जबकि बड़ी मात्रा में सहायता पानी वाली नैटो सेनाएं अगले दो सालों में यहां से चली जाएंगी तो सबसे बड़ी चिंता यही है कि क्या तब भी ये व्यवस्था बरकरार रह पाएगी.

बुद्ध की मूर्तियां

यही नहीं, बामियान की सबसे मशहूर बुद्ध की पत्थर की मूर्तियों के अवशेषों को लेकर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें साल 2001 में तालीबान ने नष्ट कर दिया था.

इसके अलावा बामियान और उसके आस-पास के इलाकों में तालीबान के बढ़ते प्रभाव के कारण सुरक्षा को लेकर भी आशंकाएं बरकरार हैं.

बामियान

बामियान में तालीबान का खतरा अभी भी बना हुआ है

इसी वजह से यहां विदेशी पर्यटकों का आना लगभग बंद हो गया था.

लेकिन यदि विदेशी पर्यटक अभी भी यहां आते हैं तो बंद-ए-अमीर राष्ट्रीय पार्क अफगान पर्यटकों को भी आकर्षित करेगा.

लेकिन चरमपंथी धमकियों के चलते इस साल पर्यटकों की संख्या में काफी कमी देखी गई.

वैसे पार्क को भी अभी विश्व स्तरीय दर्जा पाने के लिए लंबी दूरी तय करनी है.

लेकिन जानकारों का कहना है कि इस परियोजना में स्थानीय लोगों को शामिल करना ही बहुत जरूरी है ताकि वो इसका फायदा उठा सकें.

अफगानिस्तान की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के प्रमुख मुस्तफा जहीर कहते हैं कि गृह युद्ध में जकड़े इस देश में राष्ट्रीय पार्क के विकास की कल्पना करना ही एक स्वप्न जैसा था.

संयुक्त राष्ट्र के उप दूत माइकेल कीटिंग उनकी बात का समर्थन करते हुए कहते हैं, “बीस साल कौन सोच सकता था कि कंबोडिया इतना बड़ा पर्यटन स्थल बन सकता है.”

अफगानों के लिए झील का पानी पवित्र होता है और उसमें रोगों का इलाज करने की क्षमता होती है.

शायद एक दिन यही झीलें अफगानिस्तान का इलाज करने में भी मददगार हो सकें.

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