शांति की अलख जगाता एक अमरीकी सैनिक

 गुरुवार, 25 अक्तूबर, 2012 को 08:03 IST तक के समाचार

एक संस्था के लोगों पिछले 32 सालों से व्हाइट हाउस के सामने धरना दे रहे हैं.

एक रिपोर्ट के अनुसार विदेशों में युद्ध लड़ने के बाद वापस अपने देश अमरीका लौटने वाले औसतन 18 फौजी हर रोज़ आत्म हत्या कर रहे हैं. हजारों शारीरिक और मानसिक रूप से बेकार हो चुके हैं.

लेकिन कुछ फौजी ऐसे भी हैं जो मानसिक रोग से स्वस्थ होने के बाद विदेश में अमरीकी सैनिक कार्रवाईयों के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं.

45 साल के डैरेल सोमालिया में चार साल युद्ध लड़ने के बाद अमरीका वापस लौटे और फ़ौज की नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

अब वो युद्ध के खिलाफ अपनी आवाज़ उठा रहें हैं.

"मेहनत रंग ला रही है. हमारे पास स्कूली बच्चे आते हैं, पर्यटक आते हैं और जब वो हमारी बातें सुनते हैं तो वो कई तरह के सवाल करते हैं.जवाब सुन कर कहते हैं उन्हें प्रशासन ने अंधकार में रखा है."

डैरेल, पूर्व सैनिक

अमरीकी प्रशासन के नाम सन्देश में डैरेल कहते हैं: "जंग बंद करो. दुनिया के दारोगा बनने की भूमिका छोडो"

शांति का पैगाम

इस संदेश को लोगों तक पहुंचाने के लिए डैरेल हर रोज़ अमरीकी राष्ट्रपति निवास व्हाइट हाउस के ठीक सामने बैठ कर धरना देते हैं.

डैरेल कहते हैं, "युद्ध के लिए हमें भेजने वाले अधिकारियों को अंदाज़ा नहीं है कि उस वक्त हम पर क्या गुज़रती है, जब गोलियां कान को छू कर निकल जाती हैं और बमों से हमारे साथियों की जान हमारी आँखों के सामने निकलती है, तो उस मंज़र को बयान नही किया जा सकता. उस भय को किसी हौलीवुड की फिल्म में दिखाया नहीं जा सकता"

लेकिन डैरेल अमरीकी सैनिकों की परेशानियों से कहीं ज्यादा चिंतित उन लोगों के लिए हैं जो मारे जाते हैं.

डैरेल अफ़ग़ानिस्तान, इराक और दूसरे देशों में अमरीकी बमबारी के चलते मरने और विकलांग होने वाले लोगों की तस्वीरों के सामने खड़े हो जाते हैं.

वो कहते हैं."अमरीका ग़रीब और तीसरी दुनिया के देशों में प्रजातंत्र लाने के नाम पर निहत्थे लोगों को मारता है और उसका अंजाम होता है हज़ारों लोगों की मौत. अमरीका को दुनिया का दरोगा बनने का कोई हक नहीं है "

डैरेल शान्ति के पक्ष और युद्ध के विरोध लड़ने वाली एक संस्था के लोगों से जुड़े हैं. वो पिछले 32 सालों से व्हाइट हाउस के सामने धरना दे रहे हैं.

'युद्ध एक धंधा है'

"युद्ध के लिए हमें भेजने वाले अधिकारियों को अंदाज़ा नहीं है कि उस वक्त हम पर क्या गुज़रती है, जब गोलियां कान को छू कर निकल जाती हैं और बमों से हमारे साथियों की जान हमारी आँखों के सामने निकलती है, उस मंज़र को बयान नही किया जा सकता. उस भय को किसी हौलीवुड की फिल्म में दिखाया नहीं जा सकता"

डैरेल, पूर्व सैनिक

डैरेल का मानना हैं युद्ध अमरीका का एक बड़ा उद्योग है.वो कहते है, "हमारे कार्पोरेशन युद्ध को हवा देते हैं क्योंकि इससे हथियार बनाने वाली कम्पनियों को अरबों डॉलर का मुनाफा होता है. ये एक बड़ा उद्योग है और इसका असर प्रशासन से लेकर मीडिया के अन्दर तक है"

अफ़ग़ानिस्तान में अब तक 2000 अमरीकी सैनिक मारे जा चुके हैं और इराक में इससे कहीं अधिक.

लेकिन सवाल है कि क्या डैरेल और उनके साथियों के शांति के पैगाम को आम जनता सुन रही है?

जवाब में वो कहते हैं, ''मेहनत रंग ला रही है. हमारे पास स्कूली बच्चे आते हैं, पर्यटक आते हैं और जब वो हमारी बातें सुनते हैं तो वो कई तरह के सवाल करते हैं.जवाब सुन कर कहते हैं उन्हें प्रशासन ने अंधकार में रखा है."

डैरेल कहते हैं उनका काम है लोगों को युद्ध की बर्बादी के बारे में बताना और खून खराबे को ख़त्म करने की सलाह देना.

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