ओबामा बर्मा जाने वाले पहले अमरीकी राष्ट्रपति बनेंगे

  • 9 नवंबर 2012
सू ची
Image caption बर्मा में राजनीतिक माहौल बदलने के बाद विपक्षी नेता आंग सान सू ची की रिहाई भी हुई है

अमरीकी राष्ट्रपति के कार्यालय का कहना है कि बराक ओबामा इस माह बर्मा की यात्रा पर जा रहे हैं.

बराक ओबामा बर्मा के दौरे पर जाने वाले अमरीका के पहले राष्ट्रपति होंगे.

17 नवंबर से शुरू होने वाली इस यात्रा के बीच बराक ओबामा की मुलाक़ात विपक्षी नेता आंग सान सू ची और राष्ट्रपति थीन सेन से होगी.

बराक ओबामा 17 से 20 नवंबर तक तीन देशों - बर्मा, थाईलैंड और कंबोडिया के दौरे पर निकल रहे हैं.

अमरीकी राष्ट्रपति कंबोडिया में दक्षिण और पूर्वी दक्षिण एशियाई देशों के समूह के सम्मेलन में भी हिस्सा लेंगे.

सुधार

बर्मा की सरकार ने हाल के वर्षों में आर्थिक, राजनीतिक और दूसरे सुधारों को लागू करने की प्रक्रिया शुरू की है जिसके बाद कई मुल्कों ने पूर्वी देश पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी है और साथ ही राजनयिक संबंधों की बहाली की कोशिशें भी हो रही हैं.

कई वर्षो से नज़रबंद विपक्षी नेता आंग सान सू ची के रिहा किया गया था जिसके बाद मुल्क में संसदीय चुनाव हुए जिसमें सू ची को जीत हासिल हुई.

पिछले साल दिसंबर में अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने बर्मा का दौरा किया था.

अमरीका ने वहां अपना राजदूत भी नियुक्त किया है.

राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता जे करनी की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि ओबामा बर्मा में 'सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों से भी मुलाक़ात करेंगे ताकि वहां जारी प्रजातांत्रिक प्रक्रिया को प्रोत्साहन मिल सके.'

रिश्तों को प्राथमिकता

Image caption ओबामा ने अपने पहले कार्यकाल में बर्मा से संबंध सुधारने की दिशा में कई क़दम उठाए

बीबीसी के डेविड बैमफोर्ड का कहना है कि चुनाव में जीत के बाद होने वाली बराक ओबामा की सबसे पहली विदेश यात्रा के लिए बर्मा को चुना जाना इस बात को दर्शाता है कि अमरीका बर्मा से रिश्तों में सुधार को कितनी अधिक अहमियत देता है.

संवाददाता का कहना है कि बर्मा से रिश्तों में तेज़ी से हो रहा सुधार इस वजह से भी है क्योंकि अमरीका क्षेत्र में चीन के मज़बूत प्रभाव को जितनी मुमकिन हो रोकना चाहता है.

जानकारों का मानना है कि मानवधिकार संगठन अमरीकी राष्ट्रपति के दौरे को समय पूर्व क़रार देंगे क्योंकि बर्मा की सरकार मुल्क में हुए दंगों को रोकने में पूरी तरह नाकाम रही थी जिसमें रोहिंग्या मुसलमानों को निशाना बनाया गया था.

लेकिन बर्मा में जारी सुधारों के बाद से दुनियां के कई बड़े मुल्क बर्मा में निवेश करने के इच्छुक रहे हैं.

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