गज़ा की जंग में जलती युवाओं की ज़िंदगी

गज़ा पट्टी में जीवन आसान नहीं. बीबीसी न्यूज़ नाइट कार्यक्रम के टिम ह्वेवेल गज़ा के दो ऐसे युवाओं के बारे में बता रहे हैं जिनके हालात से गज़ा पट्टी के जीवन की मुश्किलों का पता चलता है.

ये कहानी है मोहम्मद और मैडेलीन की. मोहम्मद मिस्र को जानेवाली एक ऐसी सुरंग में काम करते हैं जिसका इस्तेमाल तस्करी के लिए किया जाना है जबकि मैडलीन इस्राइल के नियंत्रण वाले समुद्र में मछली पकड़ने का काम करने वाली अकेली महिला हैं.

मोहम्मद की मुश्किलें

गज़ा पट्टी के धुर दक्षिणी इलाके रफ़ा में अभी पौ भी नहीं फूटी है कि बुसैना इस्माइल अपने सोते हुए बेटे मोहम्मद को उठाने लगती हैं.

बेटे को गहरी नींद से जगाने का काम वो न चाहते हुए भी करती हैं क्योंकि उसे ऐसी जगह काम पर जाना है जहां कई युवा ज़िंदा दफ़न हो चुके हैं.

उनका पेशा है गज़ा पट्टी और मिस्र की सीमा पर भूमि के अंदर तस्करी के लिए बनाई जा रही सुरंग की खुदाई करना.

Image caption मोहम्मद, गज़ा के एक युवा

दो सिगरेट और एक ग्लास चाय पीने के बाद मोहम्मद उठ तो जाते हैं लेकिन काम पर नहीं जाना चाहते.

वो कहते हैं, "ये काम नहीं अपराध है. किसी को ये काम नहीं करना चाहिए. क्या आपने किसी को खुद अपनी क़ब्र खोदते देखा है? खुदाई करते हुए हो सकता है कि सुरंग आप पर ही गिर जाए और आपकी मौत हो जाए."

मोहम्मद महज़ 18 साल के हैं लेकिन पिछले चार साल से वो लगातार सुरंग की खुदाई और भारी बोझ ढोने का काम कर रहे हैं.

वो इस काम से नफ़रत करते हैं लेकिन उनके पास कोई और विकल्प नहीं. उनके पिता बीमार हैं इसलिए आठ लोगों के परिवार का भरण-पोषण उनकी ही ज़िम्मेदारी है.

गज़ा में 28 फ़ीसदी की बेरोज़गारी दर को देखते हुए तस्करी ही वैसे कुछ पेशों में से एक है जिससे ठीक-ठाक कमाई हो सकती है.

इसी बीच गज़ा पट्टी के दूसरे किनारे पर यानि गज़ा के बंदरगाह से 22 मील दूर 18 साल की एक महिला अपने परिवार का पेट भरने के लिए एक कठिन दिन की तैयारी कर रही है.

मैडलीन का मुश्किल पेशा

ये हैं मैडलीन कुल्लाब जो कि गज़ा की अकेली मछुआरिन हैं. मैडलीन 14 साल की उम्र से ही हर दूसरे दिन समुद्र में मछली पकड़ने जाती हैं. हालांकि हमास के कब्जे़ वाली गज़ा की पुलिस पुरुषों के वर्चस्व वाले इस पेशे से जुड़ने के लिए रोकती रही है.

हालांकि मोहम्मद के विपरीत मैडलीन अपने काम को पसंद करती हैं. लेकिन इन दोनों की कहानी से ये पता चलता है कि गज़ा पट्टी के छोटे से घनी आबादी वाले इलाके में ज़िंदगी कितनी मुश्किलों भरी है.

गज़ा पट्टी पर इसराइल और मिस्र की नाकेबंदी है और हाल ही में इसराइल के साथ उसकी लड़ाई भी हो चुकी है.

Image caption मैडलीन, गज़ा की एक युवती

साल 2007 में जब गज़ा पर हमास का शासन स्थापित हुआ तो मिस्र के सहयोग से इसराइल ने इस इलाके की नाकेबंदी कर दी.

हालांकि 2011 में रफ़ा सीमा से होकर लोगों के आने-जाने पर प्रतिबंध हटा दिया गया लेकिन गज़ा में वस्तुओं के आने पर प्रतिबंध अब भी लगा हुआ है.

इसराइल को डर है कि भवन निर्माण की वस्तुएं मंगाकर हमास अपना सैनिक ढांचा तैयार कर सकता है.

इसलिए ये वस्तुएं यहां तस्करी के ज़रिए लाई जाती हैं.

हालांकि पिछले दो साल से इसराइल के भोजन और उपभोक्ता उत्पाद यहां लाने की अनुमति दे दी गई है लेकिन वो महंगी पड़ती हैं. अगर इन्हें मिस्र से सुरंग के ज़रिए लाया जाए तो ये सस्ती पड़ती हैं.

मोहम्मद का दर्द

इसी काम में लगे मोहम्मद को 12 घंटे की लंबी शिफ्ट करनी पड़ती है. काम इतना मुश्किल है कि दूसरे मजदूरों की तरह उन्हें भी दर्द निवारक दवा ट्रामाडोल का इस्तेमाल शुरु करना पड़ा. लेकिन थोड़े ही दिनों में वो इसके आदतीन हो गए.

Image caption हमास नेता मेशाल ने संगठन की 25वीं वर्षगांठ पर गज़ा में विशाल रैली की थी.

वो बताते हैं, "मैंने खाना छोड़ दिया, कुछ भी पीना छोड़ दिया. मैं सिर्फ यही चाहता था कि ट्रामाडोल लूं और गधे की तरह काम करता रहूं. लेकिन कुछ समय बाद इस दवा ने भी काम करना बंद कर दिया, तब मैंने दवा की खुराक बढ़ा दी. और फिर एक दिन मैं सुरंग में ही गिर पड़ा. उस समय मैंने आटे की एक बड़ी बोरी उठा रखी थी. तब मैंने काम छोड़ने का फैसला कर लिया."

दो महीने तक उनकी हालत ख़राब रही लेकिन इलाज से अब वो ठीक हैं और दूसरे काम की तलाश कर रहे हैं. पिछले महीने गज़ा और इसराइल के बीच हुए शांति समझौते से उन्हें उम्मीद है कि सीमाओं की दीवार टूटेगी और लोगों की आवाजाही आसान हो सकेगी.

मैडलीन को थोड़ी राहत

हालांकि ये अब तक नहीं हो सका है लेकिन युद्धविराम ने मैडलीन को थोड़ा लाभ ज़रूर पहुंचाया है. पहले इसराइल ने गज़ा की मछली पकड़नेवाली नौकाओं को किनारे से केवल तीन समुद्री मील तक जाने की अनुमति दे रखी थी लेकिन अब इसका दायरा छह मील तक बढ़ा दिया गया है.

इस फैसले से बेहद खुश मैडलीन कहती हैं, "जब उन्होंने हमारा दायरा तीन मील बढ़ा दिया तो हमें ज़्यादा मछली मिलने लगी."

मैडलीन, मोहम्मद की तरह ही 1994 में पैदा हुईं, इसराइल और फलस्तीन के बीच ओस्लो संधि पर दस्तखत के बाद.

लेकिन शांति उनसे अपने पिता के समय से भी ज़्यादा दूर लगती है. उनके पिता बताते हैं कि कई साल पहले वो इसराइली मछुआरों के साथ काम करते थे और एक ही घर में रहते थे लेकिन मैडलीन और मोहम्मद की सच्चाई ये है कि उन्होंने किसी इसराइली से आज तक बात भी नहीं की है.

वो कहती हैं, "मैं सिर्फ़ यही जानती हूं कि हम युद्ध के दौरान पैदा हुए, युद्ध में जी रहे हैं और युद्ध में ही मर जाएंगे."

उन्हीं की तरह मोहम्मद भी आशावादी नहीं हैं. वो कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि सुरंगें बंद हो जाएंगी और नौकरियां पैदा होंगी ताकि हम इस तरह का काम छोड़ सकेंगे. लेकिन जैसा आप देख रहे हैं कुछ भी नहीं बदला है. सब कुछ पहले जैसा ही है."

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