मूँछ वालों को भारी पड़ा चुटकुला सुनाना

अपनी मूंछों और चुटकुलों के लिए मशहूर बर्मा के दो भाइयों को सैन्य शासन का मज़ाक उड़ाना भारी पड़ा और उन्हें जेल में डाल दिया गया.

परपर ले और उनके भाई ल्यू ज़ॉ का कुसूर बस इतना था कि उन्होंने आंग सान सू ची का समर्थन किया था और कुछ ऐसे चुटकुले सुनाए थे जो सैन्य शासन को नागवार गुजरे.

उन दिनों की याद ताज़ा करते हुए परपर ले कहते हैं, ''मैंने बस कुछ चुटकुले सुनाए थे. इसके बदले मुझे कठोर श्रम की सज़ा सुनाई गई. मैंने सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह नहीं किया था, लेकिन मुझ पर राजनीतिक अपराध का अभियोग लगा दिया गया.''

वे कहते हैं, ''जेल में हालात बड़े भयावह थे. मेरे हाथ बांध दिए जाते थे, मुझसे पत्थर तोड़ने के लिए कहा जाता था. खाने को कभी भरपेट भोजन नहीं मिला और गार्ड जिस कैदी को पसंद नहीं करते थे, उसे गोली मार देते थे. मैंने अपनी आंखों से यह सब देखा.''

वैसे ये तीन भाइयों की तिकड़ी है जो बर्मा के मांडले शहर में विदेशी पर्यटकों का मनोरंजन करते हैं. तीसरे भाई ल्यू माउ पर सैन्य शासन ने कुछ रहम दिखाते हुए उन्हें जेल की सज़ा से बख्श दिया था.

'हालात जस के तस'

मूँछ वाले इन भाइयों को सज़ा वर्ष 1996 में सुनाई गई थी. सात साल बाद उन्हें रिहा कर दिया गया था. तब ये लोग बर्मा की लोकतंत्र समर्थक नेता आंग सान सू ची की नज़रबंदी खत्म करने लिए हो रहे विरोध प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे थे.

बीते साल आंग सान सू ची को भी रिहा कर दिया गया था. बर्मा में अब लोकतांत्रिक सुधार हो रहे हैं और ये तीनों भाई भी अब लोगों का मनोरंजन पहले से ज्यादा कर रहे हैं.

लेकिन उन्हें अभी भी सार्वजनिक जगहों पर अपनी प्रस्तुति देने से पहले सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती है.

इन भाइयों का कहना है कि उनका हंसी-मज़ाक अभी भी प्रासंगिक है क्योंकि बर्मा अभी सैन्य शासन से लोकतंत्र की ओर बदलाव के दौर से गुजर रहा है.

ल्यू माउ कहते हैं कि बुनियादी मुद्दे अभी भी जस के तस है, जैसे शिक्षा नि:शुल्क नहीं है, बिजली नहीं मिलती, अस्पतालों में दवाएं नहीं मिलतीं, लोग एचआईवी से मर रहे हैं और सरकार कुछ नहीं कहती.

वे कहते हैं, ''हम अपनी मुहिम तब तक जारी रखेंगे जब कि आंग सान सू ची बर्मा की राष्ट्रपति नहीं बन जातीं. हमें भरोसा है वो जीतेंगी.''

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