जहां गेंद है पर बल्ला नहीं

  • 19 जनवरी 2013
क्रिकेट
Image caption बैरागुआ में क्रिकेट के शौकीनों की कमी नहीं, लेकिन दिक्कतें भी उतनी ही हैं

कम्युनिस्ट देश क्यूबा के दूरदराज इलाके बैरागुआ में एक छोटा सा समुदाय रहता है. ये लोग ब्रितानी मूल के वेस्ट इंडियंस हैं जो यहां अपनी प्राचीन परंपराओं को बरकरार रखने के लिए जूझ रहे हैं.

इन लोगों के वंशजों ने यहां एक सदी पहले सेंट जेम्स चर्च की स्थापना की थी. ये चर्च एक शक्कर कारखाने के पास ही था जहां रोज़गार की तलाश में ये लोग क्यूबा आए थे. उन दिनों ये कारखाना अमरीकी लोग चलाते थे.

अल्बर्ट स्प्रिंगर हॉवर्ड ब्रितानी मूल के एक ऐसे ही वेस्ट इंडियन हैं.

वे कहते हैं, ''मेरे माता पिता बार्बाडोस से आए थे. उन्हें पता था कि यहां काम मिलेगा. वो यहां पैसा कमाने आए थे और वापस लौट गए. लेकिन जब उन्होंने यहां के हालात बेहतर होते देखे, तो वो अपने परिवार के साथ यहीं बस गए.''

इसके बाद गुज़रते समय के साथ अंग्रेज़ी भाषा यहां रोज़मर्रा की ज़िंदगी में घुलमिल गई. लेकिन फिर हालात तेज़ी से बदले, क्यूबा की क्रांति के बाद इस समुदाय के अंग्रेज़ी स्कूलों को बंद कर दिया गया. यहां तक कि चर्च में प्रार्थना भी स्पेनिश भाषा में होती है.

अल्बर्ट स्प्रिंगर बताते हैं, ''यहां अब भविष्य बहुत अच्छा नज़र नहीं आ रहा है. एक समय था जब क्रिसमस जैसे दिनों पर चर्च लोगों से खचाखच भरा रहता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है.''

लेकिन तमाम दिक्कतों के बाद भी नई पीढ़ी के लोगों में अपनी परंपराओं के लिए अब भी जोश भरा हुआ है. शायद यही वजह है कि गन्ने के खेतों के बीच कुछ नौजवानों ने क्रिकेट का छोटा सा मैदान बना लिया है जहां वे ब्रितानी अंदाज़ में क्रिकेट खेलते हैं.

क्रिकेट की मुश्किल राह

इन जोशीले युवकों के वंशजों ने क्यूबा में क्रिकेट की शुरुआत की थी. लेकिन यहां क्रिकेट की राह बड़ी मुश्किल है.

सरकार की तरफ से क्रिकेट को कोई बढ़ावा नहीं मिलता है. क्रिकेट के लिए आर्थिक मदद भी नहीं मिलती है क्योंकि सरकार इसे क्यूबा के आधिकारिक खेल के तौर पर मान्यता नहीं देती है.

क्रिकेट खेल रहे ऐसे ही एक युवक ने बताया, ''यहां क्रिकेट खेलना आसान नहीं है. बल्ले नहीं मिलते, बल्लों के लिए लकड़ी नहीं मिलती.''

वे कहते हैं, ''आप देखिए सेंटियागो और ग्वांतानामो में भी कई वेस्ट इंडियन लोग हैं. वहां भी क्रिकेट में लोगों की बड़ी दिलचस्पी है. लेकिन उनके लिए गाड़ियों में ईंधन नहीं होता है. यहां भी यही हाल है. यहां हम बस अपने दम पर भी कुछ करने की कोशिश करते रहते हैं.''

खत्म होती पहली पीढ़ी

बैरागुआ में रहने वाली रुबी इलिस की उम्र 105 साल है. रुबी पहली पीढ़ी की जीवित बची आखिरी महिला हैं.

जमैका में पैदा हुईं रुबी भी बेहतर जीवन की चाह में क्यूबा आईं थीं. लेकिन अब इस समुदाय के अधिकतर लोग अपने विदेशों में रहने वाले अपने रिश्तेदारों से मिलने वाली आर्थिक मदद पर निर्भर हैं.

रूबी के बेटे फ्रैंकोइस भी अपनी खराब माली हालत की वजह से मन मारकर रह जाते हैं. वे कहते हैं, ''मैं जाकर देखना चाहता हूं जमैका कैसा है. लेकिन मैं कभी नहीं जा पाया. मेरी इच्छा बार्बाडोस जाने की भी है.''

फ्रैकोइस ने मन मारा है लेकिन हिम्मत नहीं हारी है. वो जमैका की संस्कृति को क्यूबा में जीवित रखने की भरसक कोशिश कर रहे हैं.

यही वजह है कि इस समुदाय के लोग नाच-गाने के बहाने अपनी संस्कृति को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. भले ही एक सदी बीत गई, पर ये लोग अपनी गहरी जड़ों से अभी भी जुड़े हुए हैं.

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार