अमरीका को चुनौती देने वालों का दौर ख़त्म?

  • 7 मार्च 2013
Image caption ह्यूगो चावेज़ और फ़िदेल कास्त्रो

अमरीका विरोध का सबसे मुखर वक्ता दुनिया के मंच से विदा हो गया है. क्या अमरीका को चुनौती देने वालों का दौर ख़त्म हो गया है?

चावेज़ ने खुलकर अमरीकी साम्राज्यवादी नीतियों की आलोचना की. उन्होंने जार्ज डब्ल्यू बुश की तुलना हिटलर से कर डाली तो दक्षिण अमरीकी देशो में 'हैलोवीन आयात' करने को 'आतंकवाद' की संज्ञा दे दी.

ह्यूगो चावेज़, जिन्होंने छह बार चुनाव जीता, अब जीवित नहीं हैं.

लेकिन अमरीका का मुखर विरोध करने वाली केवल उनकी ही आवाज़ शांत नहीं हुई है.

अमरीका-विरोधी खत्म?

हाल के वर्षों में अमरीकी शक्ति के सबसे महत्वपूर्ण आलोचक दुनिया के फलक से दूर हो गए हैं.

नौ अमरीकी राष्ट्रपतियों के सामने डटे रहे फिदेल कास्त्रो ने साल 2008 में क्यूबा के राष्ट्रपति और ‘वॉशिंगटन को चिढ़ाने वालों के मुखिया’ का पद छोड़ दिया था.

अमरीका के सबसे बड़े डर ओसामा बिन लादेन को अमरीकी सुरक्षा बलों ने मार दिया.

सद्दाम हुसैन को हटा दिया गया, गद्दाफ़ी को भी हटाया गया और किम जोंग-इल बढ़ती उम्र से लाचार हो गए.

ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद, जिनके संदिग्ध परमाणु हथियार कार्यक्रम की वजह से वाशिंगटन में दहशत रहती है, 2013 में सत्ता हस्तांतरण करने वाले हैं. उनका दूसरा कार्यकाल इसी साल समाप्त हो रहा है.

इन लोगों ने समाजवाद से लेकर धर्मनिरपेक्ष अरब राष्ट्रवाद या इस्लामी कट्टरवाद जैसी कई राजनीतिक विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व किया.

लेकिन अपने-अपने ढंग से इन सभी की एक ही प्रकृति थी और वो थी- अमरीका विरोध. हालांकि इस अमरीका विरोध पर राय अलग-अलग हैं.

अमरीका विरोध का मतलब

पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज डब्लू बुश ने 2002 में ईरान, इराक़ और उत्तर कोरिया को ‘शैतान की धुरी’ कहा था. वे अमरीका-विरोध को हर उस चीज़ का विरोध मानते हैं जिसका अमरीका प्रतीक है. वो कहते थे अमरीका के दुश्मन “हमारी स्वतंत्रता से नफ़रत करते हैं.”

लेकिन अमरीकी विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर मैक्स पॉल फ्रीडमैन इसे खारिज करते हैं. वो इसे “अमरीकी नीतियों का विरोध करने वाले किसी भी विरोध पर चिपका दिए जाने वाला शब्द” मानते हैं.

वो कहते हैं, “अमरीका के विरोधियों को न सिर्फ़ अलोकतांत्रिक, बल्कि अपने राष्ट्रवादी धाराओं का कट्टर समर्थक करार दे दिया गया.”

फ्रीडमैन के अनुसार अमरीका-विरोधी की ये चिप्पी कई बार फ्रांस जैसे उदार लोकतंत्र पर भी लगा दी गई क्योंकि उसने इराक़ में जंग का विरोध किया था.

इस श्रेणी में चावेज़ का स्थान कहां है, इस पर काफ़ी बहस हो चुकी है.

हालांकि स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के रसेल बेरमैन कहते हैं, “आदतन अमरीकी विरोध और तार्किक आलोचना के बीच आसानी से फ़र्क किया जा सकता है.”

वो कहते हैं कि अरब देशों में लोकप्रियता चाहने वाले नेताओं की ओर से “अरब-विरोधी और अमरीका-विरोधी मिश्रित भावनाओं” का दोहन किए जाने की बहुत संभावना है.

लीबिया के बेनग़ाज़ी में 2012 में अमरीकी राजदूत क्रिस्टोफ़र स्टीफ़ेन्स की हत्या इसी के दुखद परिणाम की ओर संकेत करती है.

हालांकि अभी ये साफ़ नहीं कि किम जोंग-उन और अहमदीनेजाद की जगह आने वाले के साथ खड़े होने के लिए ह्यूगो चावेज़ का स्थान लेने के लिए अमरीका विरोधियों की अगली पीढ़ी कहां से आएगी.

चावेज़ के बाद कौन?

‘अरब स्प्रिंग’ ने कई ऐसे लोकप्रिय नेता दे दिए हैं जो ये पारंपरिक भूमिका निभा सकते हैं.

क्यूबा का साम्यवादी शासन कायम है लेकिन फ़िदेल कास्त्रो के भाई राउल ने ऐलान कर दिया है कि वो 2018 में रिटायर हो जाएँगे. उनके शासनकाल में उत्तेजक बातों को कम वजन दिया गया है.

Image caption चावेज़ की मौत के बाद अमेरिका-विरोध की सबसे मुखर आवाज़ शांत हो गई

दक्षिण अमरीका में कई ऐसे नेता हैं जो अब भी अमरीकी हितों को चुनौती देने के लिए तैयार हैं.

उदाहरण के लिए बोलिविया के इवो मोरालेस, निकारागुआ के डेनियल आरटेगा और इक्वाडोर के राफेल कोरिया.

लेकिन इनमें से कोई भी चावेज़ की तरह भड़कीली नौटंकी नहीं दिखा रहा, जिसने एक बार संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में कहा था कि जॉर्ज बुश “खुद शैतान हैं” और उनके जाने के बाद सभा कक्ष से ‘गंधक की गंध’ आती है.

डोनाल्ड रम्सफेल्ड के शब्दों में इराक युद्ध के दौरान पश्चिमी यूरोप के देशों ने दिखाया कि निचले स्तर का अमरीकी-विरोध पूरी तरह से वापस लौट रहा है.

दिसंबर 2012 में जारी ‘प्यू सर्वे’ के अनुसार बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद से यूरोप में अमरीका का समर्थन घटा है.

‘अमरीका-विरोध का उदय’ के लेखक और सिडनी विश्वविद्यालय के ब्रायन ओ-कॉनर कहते हैं कि बुश के 'बेपरवाह' रहने के रंगढंग ने अमरीकी विदेश नीति के विरोध को हल्का कर दिया था.

अजीब बात है कि अमरीका-विरोध का हालिया आरोप ‘गंगनम स्टाइल’ गाने के लिए मशहूर दक्षिण कोरिया के पॉप स्टार पीएसवाई पर लगा है.

वर्ष 2004 में इस रैप गायक ने इराकी बंदियों को मारने वाले ‘अमरीकी’ और उनके परिवार को ‘धीरे और दर्दनाक’ तरीके से मारने वाला गाना गाया था. ये बात सामने आने पर पीएसवाई ने माफ़ी मांग ली थी. वैसे चावेज़ के लिए भी ये बात हद से बाहर जाने वाली थी.

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