नेपाल: दिल्ली गैंगरेप के बाद बदला नज़रिया

सौजन्य- मूवमेंट फॉर जस्टिस एंड रूल ऑफ लॉ
Image caption महिलाओं के खिलाफ हिंसा के विरोध में काठमांडू में प्रदर्शन हुए

पिछले साल दिसंबर महीने में बलात्कार के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शनों का गवाह बनने वाली दिल्ली अकेली राजधानी नहीं थी. नेपाल की राजधानी काठमांडू में भी प्रधानमंत्री के घर के बाहर सैकड़ों लोगों ने प्रदर्शन किया और नारे लगाए.

ये प्रदर्शन दरअसल दिल्ली में हुई घटना से प्रभावित थे लेकिन इन्हें और हवा मिली उस नेपाली लड़की के साथ हुई बलात्कार की घटना से जो कुवैत से आई थी.

काठमांडू हवाई अड्डे से एक पुलिस वाले ने उसका अपहरण कर लिया था और फिर उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया.

इससे पहले बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ अत्याचार की घटनाओं को लेकर इस तरह के प्रदर्शन नहीं हुए थे. लेकिन दिल्ली में हुई बलात्कार की घटना और उसके बाद लोगों के गुस्से ने दुनिया भर में स्थिति को प्रभावित किया.

काठमांडू में इस घटना को लेकर अभी भी आए दिन प्रदर्शन होते रहते हैं.

कितना बदला समाज?

लेकिन यहां सवाल उठता है कि क्या इस तरह के विरोध प्रदर्शनों और बढ़ते मीडिया कवरेज के चलते महिलाओं की स्थिति में कोई बदलाव आया है?

महिला पत्रकारों के संगठन की अध्यक्ष सुवेचा बिंदु तुलाधार कहती हैं, “मीडिया के दबाव के चलते ही ऐसा लगता है कि सरकार की नींद खुली है.”

एक अन्य महिला पत्रकार और संचारिका समूह नामक संगठन की प्रमुख निर्मला शर्मा कहती हैं कि मीडिया की वजह से ही ऐसा हुआ है कि अब किसी मुद्दे को दबाना या फिर उसे ठंडे बस्ते में डालना संभव नहीं है.

वो कहती हैं, “मेरा मानना है कि अब इस बारे में ज्यादा शिकायतें दर्ज की जा रही हैं और ऐसा लग रहा है कि इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं. दरअसल मीडिया महिलाओं से संबंधित मामलों को प्राथमिकता देने लगा है.”

बलात्कार के मामलों में बढ़ोत्तरी

एक गैर-सरकारी संगठन की ओर से मुहैया कराए गए आँकड़ों पर गौर किया जाए तो दिसंबर के बाद से महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार जैसी घटनाओं की शिकायतों में बढ़ोत्तरी हुई है. इसके बाद ही नेपाल सरकार ने महिला उत्पीड़न से संबंधित मामलों पर नज़र रखने के लिए एक आयोग का भी गठन किया है.

Image caption छोरी महराजन पिछले एक साल से गायब हैं और अभी तक उनका पता नहीं चल सका है

लेकिन इन मामलों से निपटने की जिन पर जिम्मेदारी है यानी पुलिस और कानूनी अधिकारी, वो क्या सोचते हैं.

प्रधानमंत्री के घर के बाहर प्रदर्शन करने वालों में से एक जगन्नाथ लैमिचाने कहते हैं, “हमारे प्रदर्शन के बाद लोगों ने कानूनी उपचारों और महिलाओं से संबंधित दूसरे मामलों पर बात करना शुरू कर दिया है.”

एक अन्य कार्यकर्ता प्रणिका कोयू कहती हैं कि उन्होंने पुलिस की भूमिका में भी काफी बदलाव महसूस किया है. वो कहती हैं, “नेपालगंज में महिलाओं के साथ छेड़खानी कर रहे कुछ लड़कों के खिलाफ पुलिस ने तत्काल कार्रवाई की.”

सरकारी संस्था राष्ट्रीय महिला आयोग भी स्वीकार करती है कि स्थिति में काफी सुधार आया है. आयोग की प्रवक्ता मोहना अंसारी कहती हैं कि चीजें काफी तेज़ी से बदल रही हैं.

हालिया प्रदर्शनों ने सरकारी तंत्र पर तुरंत कार्रवाई के लिए दबाव बढ़ाया है. हालांकि बहुत से लोगों का मानना है कि कानूनी व्यवस्था में अभी भी बहुत बदलाव की जरूरत है, खासकर भारत की तरह त्वरित अदालतों की मांग सबसे ज्यादा हो रही है.

वहीं बहुत से जानकारों का कहना है कि सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव के लिए मीडिया की सक्रियता और लंबे समय तक सामाजिक संगठनों का दबाव बनाए रखना बेहद ज़रूरी है. ऐसा करके ही नेपाल को महिलाओं के लिए सुरक्षित जगह बनाया जा सकता है.

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