कराची में तालिबान की अदालतें !

  • 21 मार्च 2013
तालेबान के खिलाफ़ प्रदर्शन
Image caption कराती में पिछले साल हुई हिंसा की घटनाओं में 2350 लोगों की मौत हुई थी.

बहुत पहले से आशंका जताई जा रही है कि पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी पर तालिबान का शिकंजा कसता जा रहा है लेकिन अब कराची में चरमरंथियों का दबदबा बहुत बढ़ गया है.

पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची के बाहरी इलाक़े के एक खस्ताहाल घर के बाहर 20 लोग जमा है.

वे बताते हैं कि पिछले साल सिंतबर में एक व्यापारी के प्लॉट पर एक माफ़िया ने कब्जा कर लिया था, वे उसी की शिकायत करने आए हैं.

कराची के लोग अब तालिबान के पास अपनी शिकायतें दर्ज करा रहे हैं. क़रीब दो घंटे की सुनवाई के बाद तालिबान के जज मामले की सुनवाई अगली तारीख तक के लिए स्थगित कर देते हैं. उन्होंने कहा कि अगली सुनवाई कहां होगी इसकी घोषणा तारीख से कुछ दिन पहले की जाएगी.

तालिबान की यह मोबाइल अदालत कराची के केवल इसी इलाक़े तक ही सीमित नहीं है. बल्कि शहर के अन्य इलाकों में भी फैली है.

ये मोबाइल अदालते पहले केवल शिकायतें सुना करती थीं. लेकिन अब ये सज़ा भी देने लगी है. यह इसके बढ़ते प्रभाव का उदाहरण है.

इस साल जनवरी में उन्होंने एक चोर को कोड़े मारने की सज़ा दी थी. उसके खिलाफ एक व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई थी. उससे सामान बरामद कर उसे उसके मालिक को सौंप दिया गया था.

तालिबान का दबदबा

तालिबान का प्रभाव ग़रीब इलाकों में ज्यादा हैं, जहॉँ स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य नागरिक सुविधाओं का अभाव है.

तालिबान का पश्तून बहुल इलाकों में काफी दखल है, साथ ही वो कराची में संपत्ति, आर्थिक विवाद, डकैती और धोखेबाजी से जुड़े मामलों का समाधान कर रहे हैं.

तालिबान को जब लगता है कि कोई उनके अधिकार का अतिक्रमण कर रहा है, तो वे उस पर कार्रवाई करते हैं. इस साल जनवरी में ओरंगी कस्बे में मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के नेता सईद मंजर इमाम की हथियारबंद तालिबान ने गोली मारकर हत्या कर दी थी.

पश्तूनों की राजनीतिक पार्टी मानी जाने वाली अवामी नेशलन पार्टी (एएनपी) के एक पूर्व नेता ने अभी हाल में ही यह कहते हुए कराची छोड़ दिया था कि उनके क़रीब 25 दफ़्तरों को तालिबान के दबाव की वजह से बंद करना पड़ा.

रणनीति की ज़रूरत

अपना नाम गुप्त रखने का अनुरोध करते हुए एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि तालिबान ने तेज़ी से अपना प्रभाव बढ़ाया है. वे कहते हैं कि इससे निपटने की निपटने की रणनीति बनाने की जरूरत है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह शहर अपना महत्व खो देगा.

पाकिस्तानी सेना ने जब स्वात घाटी में अभियान शुरू किया तो 26 साल के तालिबान कमांडर मोहम्मद उस्मान कराची चले आए. कराची पहुंच कर वे विरोधियों को हटाने के अभियान में शामिल हो गए.

Image caption कराची में तालेबान की मौज़ूदगी के खिलाफ़ एमक्यूएम बहुत पहले से आवाज उठा रही है.

तालिबान के नाम पर अपहरण और फिरौती वसूलने के सवाल पर वे कहते हैं कि शहर में कुछ अपराधी गुट ऐसा कर रहे हैं, जिन्हें हटाने का काम तालिबान कर रहा है.

तालिबान को लेकर लोगों की सोच भी कुछ अलग है, कनवारी कॉलोनी में रहने वाले मोहम्मद युसुफ़ मेहसूद कहते हैं, ‘‘इलाके में तालिबान की मौजूदगी को लेकर तो कोई जानकारी नहीं है. लेकिन अगर वे आते हैं तो मैं उनका स्वागत करुंगा.’’

लांधी निवासी 45 साल के हाजी अफरीदी कहते है,''तालिबान ने पश्तूनों के बीच असंतोष पैदा कर दिया है. पश्तून व्यापारियों से पैसे की मांग की जाती है, नहीं देने वालों को मार डाला जाता है.''

वह कहते हैं कि पुलिस तालिबान से डरी हुई है. इसलिए वह उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती है.

एमक्यूएम का प्रभाव

एमक्यूएम का काराची में अच्छा जनाधार है. वह कराची में तालिबान के बढ़ते प्रभाव को लेकर काफी पहले से आवाज उठा रही है.

कराची में हाल के दिनों पश्तूनों का प्रभाव बढ़ा है और वे जमीन और नौकरियों में हिस्सेदारी के लिए ऊर्दूभाषी लोगों से मुक़ाबला कर रहे हैं.

एमक्यूएम के मुताबिक़ पश्तूनों की बढ़ती आबादी और शहर के तालिबानीकरण में गहरा संबंध है.

शहर के मूल निवासी बलूचों और एमक्यूएम के बीच भी एक लड़ाई चल रही है.

बढ़ती हिंसा

खुफिया सूत्रों के मुताबिक़ शहर में तालिबान का एक प्रमुख है, शहर के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे समूहों उन्हीं के प्रति जवाबदेह हैं.

विश्लेषक तौसीद अहमद खान कहते हैं कि सरकार ने हालांकि चरमपंथ के खात्मे का संकल्प तो जताया है. लेकिन सरकार के अन्य तंत्र इसमें सहयोग नहीं कर रहे हैं.

उन्होंने बताया कि अगर सरकार अगर ख़तरे को भांपने में असफल रहती हैं, शहर में अराजकता फैल जाएगी.

वहीं सिंध प्रांत के सूचना मंत्री शारिजल इनाम कहते हैं कि सरकार तालिबान पर शिकंजा कसने की योजना बना रही है. बहुत से चरमपंथियों को गिरफ़्तार भी किया गया है.

पुलिस के मुताबिक़ कराची में 2012 में हुई हिंसा में 2350 लोगों की मौत हुई थी. पिछले छह सालों में इस तरह की हिंसा में छह हज़ार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.

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