हथियार संधि मंज़ूर, भारत ने नहीं दिया मत

हथियारों पर नियंत्रण की मांग
Image caption भारत ने इस संधि पर हुए मतदान में हिस्सा नहीं लिया

हथियारों के व्यापार को नियंत्रित करने वाली ऐतिहासिक संधि को संयुक्त राष्ट्र में भारी मतों से मंज़ूरी मिल गई है.

कुल 193 सदस्यों वाली महासभा में इस संधि के पक्ष में 154 देशों ने मत डाले जबकि तीन ने इसके विरोध में और 23 देशों ने इस संधि पर मत नहीं डालने का फ़ैसला किया.

पिछले हफ़्ते इस संधि को सर्वसम्मति से पारित किए जाने में विफलता के बाद इसको महासभा में मंज़ूरी के लिए पेश किया गया था. ईरान, सीरिया और उत्तर कोरिया ने इस संधि का विरोध किया.

जबकि अमरीका, फ़्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी इस संधि के हक में वोट डालने वालों में शामिल थे. भारत, पाकिस्तान, चीन और रूस समेत कुल 23 देशों ने इस संधि में कमियों के चलते इस पर मतदान नहीं किया.

इस संधि के तहत सदस्य देशों पर प्रतिबंध होगा कि वह ऐसे देशों को हथियार न दें जो नरसंहार, मानवता के प्रति अपराध या आतंकवाद में शामिल होते हैं.

मकसद

इसके अलावा इस संधि का यह भी मकसद है कि हथियारों की काला बाज़ारी पर रोक लगाई जाए. इस संधि के तहत देशों को सुनिश्चित करना होगा कि उनके द्वारा भेजे गए हथियार काला बाज़ार में तो नहीं पहुंच रहे.

इस संधि में शामिल होने वाले देशों को हर वर्ष हथियारों की बिक्री का लोखा जोखा भी सार्वजनिक करना होगा.

वैसे तो इस संधि में इसे लागू करवाने के लिए कोई कानूनी तरीके नहीं शामिल किए गए हैं लेकिन इसका समर्थन करने वालों का कहना है कि पहली बार इस संधि के ज़रिए हथियारों की खरीद-फ़रोख़्त की प्रक्रिया को काफ़ी हद तक पारदर्शी बनाने में मदद मिलेगी.

लेकिन कई देशों ने इस संधि में मौजूद कई खामियों पर आपत्ति जताई है.

संधि का विरोध करने वाले और मत न डालने वाले कुछ देशों ने इस संधि में गैर-सरकारी लड़ाकों

के खिलाफ़ पर्याप्त प्रावधान न होने या संधि में ऐसे लोगों को हथियार न दिए जाने संबंधी प्रावधान के न होने पर भी कड़ी आपत्ति जताई है.

इसके अलावा इन देशों को इस बात पर भी ऐतराज़ है कि इस संधि में हथियारों का निर्यात करने वाले देशों के खिलाफ़ उतने कड़े प्रावधान नहीं हैं जबकि हथियारों का आयात करने वाले देशों के खिलाफ़ कड़े प्रावधान हैं.

रूस का कहना था कि इस संधि में गैर-सरकारी लड़ाकों को हथियार दिए जाने के खिलाफ़ कोई प्रावधान नहीं है और यह इस संधि की बड़ी खामी है.

सीरिया और ईरान को भी इस बात पर ऐतराज़ था कि इस संधि में गैर-सरकारी लड़ाकों को हथियार दिए जाने के खिलाफ़ कोई प्रावधान नहीं है. ईरान का कहना था कि इस संधि को जल्दबाज़ी में मंज़ूर किया गया है.

भारत की क्या है आपत्ति

भारत ने भी इस मुद्दे पर संधि को कमज़ोर बताते हुए और इसके अन्य अंशों पर भी आपत्ति जताते हुए इस पर अपना मत नहीं डाला.

संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की प्रतिनिधि सुजाता मेहता ने कहा, "यह संधि हमारी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है. इस संधि में आतंकवाद और गैर-सरकारी लड़ाकों को हथियार मुहैया किए जाने के संबंध में कमज़ोर प्रावधान हैं. और इन चिंताओं के बारे में इस संधि में साफ़ तौर पर कोई ज़िक्र नहीं किया गया है."

भारतीय प्रतिनिधि का कहना था कि भारत सरकार इस संधि का देश की रक्षा, सुरक्षा, और विदेश नीति के हितों के हवाले से गहन आकलन करेगी.

इस संधि के अन्य अंशों का ज़िक्र करते हुए भारतीय दूत सुजाता मेहता का कहना था, "भारत को यह मंज़ूर नहीं है कि इस संधि को हथियार निर्यात करने वाले देश उन देशों के खिलाफ़ एक औज़ार के तौर पर आसानी से प्रयोग करें जो देश हथियार आयात करते हैं."

भारत का कहना रहा है कि हथियारों के व्यापार और इनके ग़लत इस्तेमाल को रोकने के लिए यह संधि बहुत ज़रूरी है. लेकिन इस संधि को संतुलित बनाया जाना चाहिए था.

इस संधि के मसौदे को तैयार करने के लिए पिछले कई वर्षों से कई देश कार्यरत थे. उनकी कोशिश यही थी कि सर्वसम्मति से ऐसी संधि पारित की जाए जिससे विश्व भर में कई जगह हर प्रकार के लोगों को हथियार खुलेआम मुहैया न हो सके. खासकर कई इलाक़ों में जहां हिंसा होती है और हथियारों के आसानी से उपलब्ध होने के कारण आम लोग उसके शिकार बन जाते हैं.

इस संधि के हिमायती कहते हैं कि विश्व भर में आम लोगों के खिलाफ़ हिंसा और चरमपंथियों और अपराधियों से हथियारों को दूर रखने के लिए इस प्रकार की संधि की बहुत ज़रूरत थी.

अपील

Image caption अमरीकी को इस संधि को सीनेट में पास कराना होगा

इस संधि के हिमायतियों ने सभी देशों से अपील की है कि वह जल्द ही संधि को अपने देशों में पारित करवाकर इसे जल्द लागू कराने की कोशिश करें.

कई मानवाधिकार संस्थाओं ने भी इस सिलसिले में संधि के पारित होने का स्वागत किया है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक बयान जारी कर कहा, "आज संयुक्त राष्ट्र में देशों ने भरपूर मतों के साथ हथियारों के व्यापार की संधि को मंज़ूरी दी है जिससे हथियार निर्यात करने वाले देश उन देशों को हथियार नहीं भेज सकेंगे जो उन हथियारों से नरसंहार, मानवता के प्रति अपराध या युद्व अपराध में उनका प्रयोग कर सकते हों."

विश्व भर में हथियारों के हर वर्ष होने वाले अरबों डॉलर के व्यापार में भारी मुनाफ़ा कमाया जाता है और इस व्यापार पर किसी प्रकार के प्रतिबंध का कुछ गुट विरोध भी करते रहे हैं.

अमरीका में बंदूकों की संस्था एनआरए या नेशनल राइफ़ल एसोसिएशन ने धमकी दी है कि इस संधि को अमरीकी सीनेट में मंज़ूर नहीं होने दिया जाएगा.

इस संधि को अब तीन जून को हस्ताक्षर के लिए महासभा में पेश किया जाएगा जिसमें कम से कम 50 सदस्य देशों की राष्ट्रीय मंज़ूरी मिलने के बाद इसको लागू कर दिया जाएगा.

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