'सर्दी-जुकाम' की तरह है धर्म

डेनियल डेनेट
Image caption डेनेट मानते हैं धर्म एक वायरस की तरह है

मुश्किल हालात में मदद के लिए लोग अक्सर धर्म की चौखट पर माथा टेकते हैं, लेकिन जाने-माने दार्शनिक और कॉग्निटिव साइंटिस्ट डेनियल डेनेट ऐसे किसी विश्वास को सिरे से नकारते हैं.

प्रोफेसर डेनेट का मानना है कि धर्म बेहोशी की दवा की तरह है, जिससे इंसानों को छुटकारा पा लेना चाहिए.

बीबीसी के कार्यक्रम 'हार्ड टॉक' में स्टीफन सैकर से बातचीत में उन्होंने इसे 'सर्दी-जुकाम' की तरह बताते हुए कहा कि इसका इलाज करने की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा, ''वास्तव में बड़ी संख्या में लोग अपने धर्म से संक्रमित हैं और उन्हें इससे छुटकारा पाते हुए देखकर मुझे खुशी होगी.''

कॉग्निटिव साइंस में मस्तिष्क और उसकी प्रक्रियाओं का अध्ययन किया जाता है.

नुक़सान

प्रोफेसर डेनेट डार्विन के विकासवादी सिद्धांत को न सिर्फ प्रजातियों के संबंध में इस्तेमाल करते हैं बल्कि विचारों के संबंध में भी और खासतौर से धार्मिक आस्था के संबंध में.

उनका मानना है कि धर्म सोच को बाधित करता है और आखिरकार हमारी जाति को नुकसान पहुँचाता है.

उन्होंने कहा,''कई ऐसे बैक्टीरिया और वायरस हैं जो हमारे लिए काफी उपयोगी हैं. हम उनके बिना जीवित नहीं रह सकते. वो हमें नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, लेकिन उनमें से कुछ ऐसे हैं जो निश्चित तौर पर नुकसानदेह हैं. धर्म ऐसा ही एक वायरस है.''

उन्होंने कहा कि धर्म भी शराब जैसे दूसरे नशे की ही तरह है. अंतर सिर्फ इतना है कि दूसरे नशे को हम मुँह से लेते हैं जबकि धर्म को आँख और कान से ग्रहण करते हैं.

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