'जिसने ओसामा के घर जाकर ख़ून के नमूने लिए थे'

Image caption मुमताज बेगम को नौकरी से निकाल दिया गया

कुछ टेलीफोन कॉल ऐसी होती हैं जिसके बाद आप शायद ये कहना चाहें कि ना ही आई होती तो अच्छा होता.जैसे पाकिस्तान की मुमताज़ बेगम को ही लीजिए. 15 मार्च को उन्हें ऐसा ही एक टेलीफोन कॉल आया.

पहली नज़र में तो ऐसे लगा जैसे ये कॉल उनके निरीक्षक ने की हो जो उन्हें अगली सुबह टीकाकरण अभियान के बारे में होने वाली मीटिंग में बुलाना चाहते थे.

ओसामा की मुखबिरी करने वाला बनेगा हीरो

लेकिन ऐसा नहीं था. बाद में पता चला कि दरअसल मुमताज़ बेगम समेत 17 स्वास्थ्यकर्मी ओसामा बिन लादेन की तलाश में एक मोहरा बनने वाले थे.

तब से लेकर अब तक ये लोग डर के साये में जी रहे है. कुछ लोगों ने तो इन्हें गद्दार तक कहा और कुछ की नौकरी चली गई.

2 मई 2011 को ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के उत्तर पश्चिमी खैबर प्रांत के एबटाबाद में मार दिया गया था. अमरीकी सील कमांडो ने एक गुप्त कार्रवाई में उन्हें मार दिया था.

उसी महीने में पाकिस्तान की गुप्तचर सेवा ने प्रांतीय स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी डॉक्टर शकील अफरीदी को ये कहते हुए गिरफ्तार कर लिया था कि उन्होंने सीआईए को लादेन तक पहुंचने में मदद की.

अफरीदी के बारे में पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसियों ने ये भी कहा कि उन्होंने ही टीकाकरण के बहाने ऐबटाबाद वाले घर से लादेन के डीएनए का नमूना इकट्ठा किया था और अमरीकी गुप्तचर एजेंसी को उपलब्ध कराया था.

कौन हैं मुमताज़?

फरवरी 2012 में खैबर प्रांत के स्वास्थ्य विभाग ने “राष्ट्रीय हितों के खिलाफ” काम करने के आरोप में प्रांत के 17 स्वास्थ्य कर्मियों को बर्खास्त कर दिया था.

हालांकि मुमताज़ को देखकर शायद ही कोई कहेगा कि वो जासूस हैं.

वो एबटाबाद के दो छोटे से कमरों में रहती हैं. उनके कमरे की दीवारें बिना प्लास्टर की है और छत भी झुकी हुई है. एक कमरे में दरवाज़ा भी नहीं है.

दूसरे कमरे में दीवार का एक हिस्सा स्वास्थ्य विभाग के एक बड़े से पोस्टर से ढका हुआ है जिसमें परिवार नियोजन, प्राथमिक स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा तंत्र के विकास के बारे में लिखा गया है.

मुमताज़ कहती हैं कि उनका काम उनके जीवन का केन्द्र भी है. दीवार पर लगे पोस्टरों को देखकर भी यही लगता है.

Image caption एबटाबाद के इसी घर मे ओसामा कई सालों तक छिप कर रहते रहे.

6 भाई बहनों के परिवार में मुमताज़ सबसे छोटी हैं. भाई बहनों में केवल वही हैं जो पैसा कमाती हैं बाकी सब बेरोजगार हैं. उनमें से किसी की शादी भी नहीं हुई है.

पाकिस्तान में किसी की शादी न होना असामान्य बात है. लेकिन इससे ये साबित होता है कि उनकी आर्थिक स्थिति कितनी खराब है.

1996 में जब से उन्होंने खैबर प्रांत के स्वास्थ्य विभाग में नौकरी करना शुरु किया तभी से वो अपने भाई बहनों के खाने पहनने का प्रबंध कर रही हैं.

लेकिन पैसे की तंगी की वजह से वो न तो अपनी मां का और न ही बहन का इलाज करवा पा रही हैं. उनकी मां को दिखाई नहीं पड़ता और उनकी बहन को मिर्गी के दौरे आते हैं.

आंसुओं में डूबी हुई वो कहती हैं, “अब जबकि मेरी नौकरी भी जा चुकी है हम लोग दो जून का खाना भी नहीं जुगाड़ सकते.”

मुमताज़ बेगम तो आर्थिक रूप से कमज़ोर हो चुकी हैं जबकि दूसरे लोगों का तो स्वास्थ्य और आमदनी दोनों खराब हो चुके हैं.

अफरीदी के करीबी

स्थानीय भाषा के एक मुहावरे का इस्तेमाल करती हुई अख्तर बीबी अपनी बात करती हैं. 49 साल की बीबी कहती हैं, “मेरे अंदर सात मर्दों के बराबर की ताकती थी लेकिन अब जब मैं खड़ी होती हूं तो मुझे लगता है कि मैं गिर जाऊँगी.”

कहा जाता है कि अख्तर बीबी डॉक्टर अफरीदी के नज़दीकी लोगों में से एक थीं. जो दो स्वास्थ्य कर्मी लादेन के घर से खून के नमूने इकट्ठे करने गए थे उनमें से एक वो भी थीं.

बताया जाता है कि डॉक्टर अफरीदी की गिरफ्तारी के बाद इन दोनों महिलाओं को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई पूछताछ के लिए भी ले गई थी.

हालांकि अख्तर बीबी इन आरोपों से इनकार करती है लेकिन वो ये मानती है कि गुप्तचर सेवा के अधिकारियों ने कई बार उनके स्वास्थ्य केन्द्र, घर और उनके चाचा के घर पर उनसे पूछताछ की थी.

बदहाल जिंदगी

अख्तर बीबी आजकल घरेलू नौकर का काम कर रही हैं. हर दिन वो लगभग 1 डॉलर कमा लेती है. स्वास्थ्य कर्मियों ने क्या गलती की है ये पूछे जाने पर वो कहती हैं, “ डॉक्टर अफरीदी हमको घर से खींचकर नहीं ले गए थे. हमें स्वास्थ्य विभाग ने उनके साथ काम करने के लिए भेजा था.”

16 मार्च 2011 की एक मीटिंग को याद करते हुए वो कहती हैं, “उस दिन सारे अधिकारी भी मौजूद थे. उसी बैठक में हमारा परिचय डॉक्टर अफरीदी से कराया गया था. और बताया गया था कि वो हमारे को-ऑर्डिनेटर होंगे.”

Image caption डॉ अफरीदी पर लादेन के खून का नमूना इकट्ठा करने का आरोप लगा था

बकौल अख्तर बीबी डॉक्टर अफरीदी ने इस मीटिंग में एक संक्षिप्त व्याख्यान दिया था. डॉक्टर अफरीदी चाहते थे कि स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर 15 साल से लेकर 49 साल तक के लोगों का टीकाकरण करें. इस अभियान को एक दूसरे से जुड़े़ हुए दो इलाकों—नवा शहर और बिलाल कस्बे में पूरा करना था.

अख्तर बीबी बताती हैं कि टीकाकरण अभियान का पहला चरण 16 और 17 मार्च को किया गया जिसमें 15 स्वास्थ्य कर्मियों को शामिल किया गया था.

ये वो इलाका था जहां अल-कायदा के एक अन्य नेता अबू फराज अल लिबी रहते थे. 2004 में पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी के ऑपरेशन में वो बाल बाल बचे थे.

इसके बाद 12,14 अप्रैल और 20,21 अप्रैल को भी टीकाकरण अभियान चलाया गया. आखिरी चरण में टीकाकरण अभियान को पूरी तरह से बिलाल कस्बे में केन्द्रित किया गया था जहां कि लादेन रहते थे.

वो बताती हैं, “ तीन तीन लोगों के तीन समूह बनाए गए थे जिन्होंने दो दिन में लादेन वाले इलाके में टीकाकरण अभियान को पूरा किया. डॉक्टर अफरीदी निजी तौर पर इस अभियान को देख रहे थे. उन्होंने हमारे लिए दो वैन मंगाई थी जबकि अपने लिए वो खैबर प्रांत के स्वास्थ्य विभाग की गाडी़ का इस्तेमाल कर रहे थे.”

डॉक्टर अफरीदी की मौजूदगी में 21 अप्रैल को दो स्वास्थ्य कर्मियों ने लादेन के घर का दरवाजा खटखटाया था लेकिन अंदर से कोई उत्तर ही नहीं मिला था.

अख्तर बीबी कहती हैं कि उन्हें ये पता नहीं है कि डॉक्टर अफरीदी को अंतत नमूने मिले जा नहीं लेकिन उन्होंने ये जरूर कहा था कि “इस घर के लोगों का टीकाकरण करना बहुत जरूरी है.”

सीआईए का प्लान

Image caption ओसामा के घर में कमांडो कार्रवाई देखते ओबामा और उनके सहयोगी.

बहुत कम लोग मानते हैं कि लादेन के घर जाने वाली महिलाओं में से किसी को वहां पर लादेन के होने का अंदाजा था. इस बात पर भी सवाल बरकरार हैं कि क्या डॉक्टर अफरीदी को भी पता था कि वो दरअसल क्या ढूँढ रहे हैं या फिर वो सिर्फ किसी के आदेश पर काम कर रहे थे.

पिछले साल पाकिस्तान के स्वास्थ्यकर्मियों ने अदालत में अर्जी दायर कर कहा था कि स्वास्थ्य विभाग के बड़े अधिकारियों ने उन्हें “बलि का बकरा” बनाया है.

पिछले महीने कोर्ट ने सभी स्वास्थ्यकर्मियों की नौकरी फिर से बहाल करने का आदेश सुनाया है.

हालांकि स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने अभी तक ये तय नहीं किया है कि इस आदेश को माना जाएगा या फिर इसके खिलाफ अपील की जाएगी.

हो सकता है कि स्वास्थ्यकर्मियों को उनकी खोई हुई नौकरी मिल जाए. हो सकता है न भी मिले. लेकिन ये तय है कि उन्हें अपनी जिंदगी भय से साए में ही गुजारनी पडे़गी.

ज़्यादातर स्वास्थ्यकर्मियों ने तो बात करने से ही मना कर दिया था. कुछ ने फोटो खींचे जाने या फिर बातचीत करने से मना कर दिया था.

अख्तर बीबी को बातचीत के लिए राजी करने में ही लंबा वक्त लग गया था. इसके बाद जब वो तैयार हुईं तो उन्होंने मिलने के लिए एक गुप्त स्थान को चुना. उन्होंने कहा, “मेरी जिंदगी को खतरा है. हमारी जान को ख़तरा है.डॉ अफरीदी के टीकाकरण अभियान से पहले तक वो किसी स्वास्थ्य कर्मी को नहीं मारते थे.”

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