'कौन कहे हिंसा की ज़रुरत होगी या नहीं'

बाबूराम भट्टाराई

नेपाल की एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई ने ये भरोसा दिलाने से इनकार कर दिया है कि आने वाले वक़्त में नेपाल की राजनीति में हिंसा का इस्तेमाल नहीं होगा. काठमांडू के अपने निवास में बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी से एक विशेष बातचीत में उन्होंने कहा, "कुछ समय तक तो नेपाली समाज को शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है, इसका मतलब हम ये नहीं कहेंगे कि आने वाले दिनों में हमेशा ही हिंसा की ज़रूरत नहीं होगी." प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

शांति प्रक्रिया जो 2006 में शुरू हुई थी वो इस समय किस मुकाम पर है?

Image caption नेपाल में दस साल तक माओवादियों के नेतृत्व में 'जनयुद्ध' चला था.

दस साल तक जनयुद्ध चला. उसके दौरान 20,000 से ज़्यादा लोगों की जनमुक्ति सेना बनी थी. शांति प्रक्रिया में आने के बाद जो समझौता हुआ उसे छह महीने में पूरा होना था, पर उस काम में छह साल लगे. पर मेरे ही कार्यकाल में पिछले साल वो प्रक्रिया पूरी हुई. संयुक्त राष्ट्र मिशन ने 20,000 माओवादी छापामारों को चिन्हित किया था. उनमें से ज़्यादातर ने रिटायरमेंट लेने का फ़ैसला किया, उनके लिए पाँच से नौ लाख नेपाली रुपए दिए गए. और 1460 नेपाली सेना में शामिल हुए. इन लोगों में से 71 लोग अफ़सर स्तर पर हैं – एक कर्नल, दो लेफ़्टिनेंट कर्नल, 13 मेजर हैं और बाकी निचले स्तर पर हैं. नेपाल के इतिहास में पहली बार दो सेनाओं को एक सेना में बदला गया है. इस हिसाब से शांति प्रक्रिया का एक महत्पवूर्ण पक्ष पूरा हो गया है. दूसरा पक्ष था ट्रूथ एंड रीकंसिलिएशन कमीशन बनाया जाना था, जिसके लिए हमने विधेयक संसद में पेश किया था पर वो नहीं हो पाया तो हमने अधिसूचना जारी की पर वो प्रक्रिया नहीं पूरी हुई है. तो शांति प्रक्रिया पूरी तरह से संपन्न नहीं हुई फिर भी सेना समायोजन का महत्वपूर्ण पक्ष पूरा हो गया.

क्या शांति प्रक्रिया की सभी शर्तें पूरी हुई हैं और जैसे आप चाहते थे वैसे पूरी हुई हैं?

सब तो पूरी नहीं हुई हैं. पर पूरा न हो पाने की एक वजह थी कि हमारी पार्टी के अंदर ही एकमत नहीं बन पाया. एक गुट शुरू से ही शांति प्रक्रिया का विरोधी था. इसलिए फैसला करने में हमारी पार्टी की ओर से भी समय लगा. दूसरी ओर नेपाली काँग्रेस और एकीकृत मा-ले पार्टी के लोग शांति प्रक्रिया पूरा करना ही नहीं चाहते थे. इस तरह अति वामपंथी और अति दक्षिणपंथी नज़रियों के कारण समय लगा, फिर भी 6500 जनमुक्ति सेना के लोगों को सेना में शामिल किया जा सकता था. पर लंबा समय लगने के कारण ज़्यादातर लोगों ने रिटायरमेंट का विकल्प चुना. इस तरह से शांति प्रक्रिया को असफल तो नहीं कहा जा सकता है.

जब आप जनयुद्ध चला रहे थे, उस वक़्त आपको भारत की ओर से कैसी मदद मिली थी?

कोई मदद नहीं मिली थी. उसके विपरीत हमारे लोगों को गिरफ़्तार किया गया था. दमन होता था और हम बहुत मुश्किल से हम भारतीय जनता के साथ रहकर अपनी रक्षा कर पाते थे. जो प्रचार किया जाता है कि भारतीय सत्तापक्ष का हमें समर्थन प्राप्त था, वो एकदम बेबुनियाद है. उसका गवाह मैं अभी ज़िंदा हूँ. ये अलग बात है जब जनयुद्ध एक स्तर पर पहुँच गया और नेपाल के राजनीतिक संतुलन में परिवर्तन आया, तब हमें लगा कि राजशाही को ख़त्म किया जा सकता है. राजशाही को ख़त्म करके ही सामंतवाद को ख़त्म करने का आधार तैयार किया जा सकता है, इसलिए हमने अपनी रणनीति बदलकर राजतंत्र के ख़िलाफ़ यहाँ के संसदवादी दल और भारत के सत्तापक्ष के साथ भी समझदारी करके आगे बढ़ने से क्रांतिकारी आंदोलन को फ़ायदा होगा. ये हमारी सोची समझी रणनीति थी. उसके तहत ही वार्ता शुरू की गई थी और यहाँ शांति प्रक्रिया आगे बढ़ी थी. जो लोग बोलते हैं कि यहाँ का आंदोलन (भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी) रॉ और भारत की ओर से संचालित था ये बिलकुल ग़लत है. इसकी पुष्टि करने के लिए हम उन्हें चुनौती देते हैं क्योंकि मैं और कॉमरेड प्रचण्ड अभी यहाँ ज़िंदा हैं और हम ही इसके मुख्य कर्ता-धर्ता थे.

पिछले दिनों आप और प्रचण्ड भारतीय राजदूत से मिलने उनके पास गए. उसका क्या कारण था?

ये तो बहुत हलकी बात है. अनौपचारिक तौर पर चाय के लिए कभी वो बुलाते हैं, कभी हम बुलाते हैं. वो अमरीकी, चीनी और भारतीय राजदूत से होता है. इसको बड़ी बात बनाने का मैं तुक नहीं देखता हूँ. जब मैं प्रधानमंत्री था तो मैं किसी दूतावास में नहीं जाता था. प्रोटोकॉल के हिसाब से भी वो ठीक नहीं रहता. जब प्रधानमंत्री के पद पर हम नहीं है तो दूतावास में होने वाली पार्टियों में हम जाते हैं, हम अपने घर पर बुलाते हैं तो वो आते हैं. इसे प्रचार देना ठीक नहीं है.

क्या आप ये विश्वास दिला सकते हैं कि नेपाल में हिंसा की राजनीति का दौर अब समाप्त हो गया है?

हिंसा और अहिंसा सापेक्ष होती है. अगर राज्य व्यवस्था न्यायपूर्ण है और बहुसंख्य लोगों को न्याय दिलाती है तो लोगों को विद्रोह में उतरने का कोई जायज़ कारण नहीं बनता. जब राज्यसत्ता का स्वरूप हिंसात्मक होता है, तो उस समय प्रतिरोध करना जायज़ होता है. हम मार्क्सवादी लोग हिंसा को निरपेक्ष तरीके से नहीं लेते. नेपाल के ऐतिहासिक विकास के इस दौर में हम हिंसा की ज़रूरत नहीं समझते. नेपाल में राजतंत्र का अंत किया गया है और सामंतवाद का काफ़ी हद तक अंत हुआ है. लोगों का सशक्ती करण हुआ है. तो कुछ समय तक नेपाली समाज को शांतिपूर्ण तरीके से ही आगे बढ़ाया जा सकता है. इसका मतलब हम ये नहीं कहेंगे कि आने वाले दिनों में हमेशा ही हिंसा की ज़रूरत नहीं होगी. हम तो हिंसा नहीं चाहते लेकिन राज्य का चरित्र कैसा होता है उससे निर्धारित होगा कि रास्ता क्या होगा.

तो आप ये विकल्प रखना चाहते हैं कि अगर राज्यसत्ता दमनात्मक हुई तो माओवादी पार्टी भी हथियार उठा सकती है?

मैं माओवादी पार्टी की ही बात नहीं कर रहा हूँ, बल्कि सैद्धांतिक बात कर रहा हूँ. यथार्थ में ऐसा नहीं होगा और न होना चाहिए, ऐसा मेरा मानना है.

आपकी पार्टी के कार्यकर्ता अब भूमिगत नहीं हैं, सबकी पहचान कर ली गई है. अगर कभी पीएलए को पुनर्ज्जीवित करना पड़े तो वो असंभव नहीं होगा?

हम पीएलए को पुनर्ज्जीवित करने की ज़रूरत हम अभी नहीं देखते हैं. जिस तरह से हमारी पार्टी की राजनीतिक पकड़ कायम है और जिस तरह से हम संविधान सभा के ज़रिए संविधान बनाने जा रहे हैं और जिस तरह से पहली संविधान सभा में हमें सफलता मिली तो हमे भरोसा है कि इन चुनावों में हमें उससे भी अधिक सफलता मिलेगी और हमारी पार्टी के नेतृत्व में ही प्रगतिशील संविधान बनाने में कामयाब हो पाएंगे. इसलिए पीएलए की ज़रूरत नहीं रहेगी.

पर आपकी इस बात पर कैसे भरोसा किया जाए?

Image caption भूमिगत रहकर 'जनयुद्ध' चलाने के बाद माओवादियों ने चुनाव में हिस्सा लिया और सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरे.

ऐतिहासिक बदलाव या युगांतरकारी बदलाव का दौर काफ़ी लंबा होता है. लेकिन लोगों की स्मृति काफी छोटी होती है. हम चाहते हैं कि पाँच दस साल में ये काम पूरा हो जाए. इतिहास में अगर हम देखें तो ब्रिटेन, फ्रांस या रूस की क्रांति में दशकों लगे थे. इसलिए हमें धैर्य रखना चाहिए.

जनता में एक तरह की हताशा और निराशा है और माओवादियों का वैसा असर नहीं दिखता जैसा कुछ साल पहले तक दिखता था.

संक्रमणकाल को जितना लंबा खींचा जाता है उसमें क्रांतिकारी कैंप में निराशा तो आती ही है. पर इसका जितना प्रचार किया जाता है उतना नहीं है. अब भी हमारी पार्टी नेपाल की सबसे बड़ी पार्टी है और नेपाल के लोगों का भरोसा इसके नेतृत्व में ही है. आगामी चुनावों में हम अपनी स्थिति और मज़बूत कर पाएँगे.

आप अपनी पार्टी के नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर क्या कहेंगे? नेपाल में आपकी पार्टी को कुछ लोग कैश माओवादी कहने लगे हैं?

मरणासन्न वर्ग सूचना तकनॉलाजी का दुरुपयोग करके क्रांतिकारी ताकतों को बदनाम करते हैं. हम इससे कतई सहमत नहीं है. हम किसी भी आयोग के ज़रिए अपने खिलाफ़ लगाए गए आरोपों की जाँच के लिए तैयार हैं. और हम चुनौती देते हैं कि छानबीन के बाद अगर हमें दंडित अगर कर सकते हैं तो हम उसका सामना करेंगे.

आपका आंदोलन भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रभावित रहा है, फिर भी नेपाल के माओवादी नेताओं को बड़ी गाड़ियाँ, घड़ियाँ जैसी चीजें क्यों प्रभावित करता है?

ये सतही बात है. बाहरी बातों पर ध्यान देना चाहिए लेकिन असली बात आपका विचार है – कि आप अपनी राजनीतिक दिशा कैसे तैयार करते हैं. वो महत्वपूर्ण हैं. अगर वो सही है तो बाहरी गड़बड़िया – जैसा आपको लगता है -- सुधारी जा सकती हैं. राजनीतिक और विचारधारात्मक लाइन अगर ग़लत है तो आप चाहे कितने भी बड़े त्यागी या गाँधीवादी क्यों न हों, जनता को उससे कोई फ़ायदा नहीं मिलता है.

चुनाव का आकलन क्या है?

अभी भी हमारी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी, इसमें कोई शक नहीं. पर हम उससे भी संतुष्ट नहीं होंगे क्योंकि संविधान बनाने के लिए दो-तिहाई बहुमत या 66 प्रतिशत मत की ज़रूरत होगी. इसलिए हम चाहते हैं कि हम और हमारे गठबंधन की पार्टियाँ मिलकर दो-तिहाई बहुमत हासिल कर सकें ताकि संविधान बनाया जा सके.

पर आपकी पार्टी में तो टूट हुई है और मोहन बैद्य किरन के नेतृत्व वाली पार्टी आपकी खुली आलोचना करते हैं, आप उनकी आलोचना करते हैं. कितना असर पड़ेगा?

इतना ज़्यादा असर तो नहीं पड़ेगा पर किरन जी जैसे हमारे कॉमरेड अलग हुए हैं तो कुछ असर तो पड़ेगा ही. पर उन्होंने जो राजनैतिक और विचारधारात्मक लाइन ली है वो बहुत हठधर्मी भरा है जो यहाँ की वस्तुस्थिति से मेल नहीं खाती. उन्होंने हमारा विरोध तो किया है लेकिन अपनी कोई स्पष्ट राजनीतिक लाइन नहीं रखी. उनकी जो असंतुष्टि है उसे देखते हुए हम कोशिश करेंगे कि नवंबर में संभवतया होने वाले चुनावों से पहले ज़्यादातर लोग पार्टी में वापिस आ जाएँ. हम किरन जी को भी वापिस लाने की कोशिश करेंगे.

क्या आप उनके संपर्क में हैं या संवाद पूरी तरह ख़त्म हो चुका है?

बात तो होती रहती है. नेपाल की इस संस्कृति को आप समझिए कि राजनीतिक पार्टियों में हम अलग अलग होते रहते हैं फिर हम बात करते रहते हैं. मिलते रहते हैं. इसलिए हम किरन जी और दूसरे नेताओं से बात करते रहते हैं. हमारे व्यक्तिगत रिश्ते अब भी अच्छे हैं. इसी हिसाब से आने वाले दिनों में हम उनसे बात करेंगे तो मेरा मानना है कि ज्यादातर कामरेड वापिस आएँगे.

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