मुसलमानों पर हमले क्यों कर रहे हैं बौद्ध?

Image caption बर्मा में 969 नाम का एक ग्रुप मुसलमानों के खिलाफ आंदोलन कर रहा है.

अहिंसा का सिद्धांत अन्य धर्मों की तुलना में बौद्ध धर्म के लिए अधिक महत्वपूर्ण है. बौद्ध भिक्षु किसी की हत्या न करने की शिक्षा लेते हैं. फिर क्यों बौद्ध भिक्षु मुसलमानों के खिलाफ़ घृणा फैला रहे हैं और हिंसक भीड़ में शामिल हो रहे हैं?

यह सब हो रहा है बर्मा और श्रीलंका में जो एकदूसरे से क़रीब एक हज़ार मील दूर हैं. इन दोनों देशों में रहने वाले मुसलमान आमतौर पर शांतिप्रिय माने जाते हैं और अल्पसंख्यक हैं. इनमें से कोई भी देश इस्लामी चरमपंथ का सामना नहीं कर रहा है. ऐसे में मुसलमानों पर हो रहे हमले व्याकुलता पैदा करते हैं.

श्रीलंका में पशुओं को हलाल करने का मुद्दा प्रमुख बन गया है. बौद्धों के संगठन बोदु बाला सेना के सदस्य बौद्ध भिक्षुओं के नेतृत्व में रैलियां निकाली गई, मुसलमानों के खिलाफ सीधी कार्रवाई का आह्वान किया गया और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बहिष्कार की अपील की गई.

बर्मा का लादेन

हालांकि श्रीलंका में कोई मुसलमान नहीं मारा गया. लेकिन बर्मा की हालत चिंताजनक है. यहां 969 ग्रुप नाम का एक संगठन धार्मिक दुर्भावनाएं फैला रहा है. इसका नेतृत्व आसिन बेराथु नाम के एक बौद्ध भिक्षु करते हैं. उन्हें धार्मिक घृणा फैलाने के आरोप में 2003 में जेल की सजा हुई थी. वो 2012 में रिहा हुए थे. वो खुद को बर्मा का ओसामा बिन लादेन बताते हैं.

इस साल मार्च में मेकटिला कस्बे में मुसलमानों पर उग्र भीड़ के हमले में 40 लोगों की मौत हो गई थी. हिंसा की शुरुआत सोने की एक दुकान से हुई थी.

दोनों देशों में हुई हिंसा में आर्थिक संसाधनों को निशाना बनाया गया. यहां बहुसंख्यकों की महत्वाकांक्षाओं के लिए धार्मिक अल्पसंख्यकों को बलि का बकरा बनाया गया.

रंगून के उत्तर में स्थित ओक्कन में मंगलवार को एक मुसलमान लड़की की साइकिल एक बौद्ध भिक्षु से टकरा गई. इसके बाद भड़की हिंसा में कट्टर बौद्धों ने मस्जिदों पर हमले किए और करीब 70 घरों में आग लगा दी. इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई और नौ अन्य घायल हुए.

बौद्ध धर्म की शिक्षा में आक्रामक विचारों को हानिकारक बताया गया है. इससे निजात पाने के कई उपाए बताए गए हैं. ध्यान से बुरे विचारों को खत्म कर करुणा को बढ़ाया जा सकता है.

ईसाई धर्म में भी कहा गया है,''अपने दुश्मनों से प्यार करो और जो आपको कष्ट दें उनके लिए प्रार्थना करें''

हर धर्म पहले या बाद में राज्य सत्ता के साथ एक प्रगाढ़ संबंध विकसित कर लेता है. बौद्ध भिक्षु समर्थन के लिए राजा की ओर देखते हैं, जो हिंसा को संरक्षण देता हैं, वहीं राजा अपनी वैधता के लिए बौद्ध भिक्षुओं की तरफ देखता है.

जेहादी ईसाई हों या इस्लामी चरमपंथी या फिर स्वतंत्रता प्रिय देशों के नेता, सब के सब अच्छे काम के लिए हिंसा को जायज ठहराते हैं. बौद्ध शासक और भिक्षु इसके अपवाद नहीं हैं.

धर्म के नाम पर हिंसा

धर्म के राजा के रूप में जाने जाने वाले बर्मा के शासक बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के आधार पर युद्ध को जायज ठहराते हैं.

जापान में बहुत से समुराई बौद्ध धर्म के जेन मत को मानते हैं. वे कई तरह से हिंसा को जायज ठहराते हैं, वे एक व्यक्ति की हत्या को भी करुणा की कार्रवाई बताते हैं. इस तरह की दलीलें द्वितिय विश्वयुद्ध में दी गई थीं.

श्रीलंका और बर्मा में उभरे राष्ट्रवादी आंदोलनों में बौद्ध धर्म ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और ब्रितानी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने की अपील की. बाद में यह हिंसक हो गया. रंगून में 1930 में बौद्ध भिक्षुओं ने चार गोरों की हत्या कर दी थी.

श्रीलंका में 1983 में फैला जातीय तनाव गृह युद्ध में बदल गया. तमिल विरोधी हिंसा के बाद, अलगाववादी तमिलों ने देश के पूर्व और उत्तर में सिंहली बहुल सरकार से अलग होने की मांग की.

सत्ता और धर्म

Image caption मार्च में मेकटिला में मुसलमानों पर उग्र भीड़ के हमले में 40 लोगों की मौत हो गई थी

इस दौरान श्रीलंकाई मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की कमान तमिल विद्रोहियों ने संभाल ली. लेकिन 2009 में इस हिंसा के खत्म होने के बाद लगता है कि बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को मुसलमान अल्पसंख्यकों के रूप में एक नया लक्ष्य मिल गया है.

बर्मा में बौद्ध भिक्षुओं ने सैन्य शासन को चुनौती देने के लिए अपनी नैतिक सत्ता का इस्तेमाल किया और 2007 में लोकतंत्र की मांग की. उस समय शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में कई बौद्ध भिक्षुओं की जान भी गई.

आजकल कुछ बौद्ध भिक्षु अपनी नैतिक सत्ता का इस्तेमाल बिल्कुल अलग तरीके से कर रहे हैं. वे अल्पसंख्यक हो सकते हैं, लेकिन ऐसे बौद्ध भिक्षुओं की संख्या करीब 50 हजार है, जो खुद को एंग्री यंग मैन मानते हैं.

दोनों देशों में शासन कर रही पार्टियों और बौद्ध भिक्षुओं के बीच का संबंध अभी भी साफ नहीं है.

श्रीलंका के रक्षा सचिव गोताभया राजपक्षे बुद्धिस्ट ब्रिगेड के एक प्रशिक्षण केंद्र के उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि थे. इस अवसर पर उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं को देश, संस्कृति और जाति का रखवाला बताया था.

संबंधित समाचार