बेनज़ीर के पाकिस्तान में कहां हैं औरतें?

  • 10 मई 2013
बेनजीर भुट्टो, पाकिस्तान, आम चुनाव

पाकिस्तान ही वह मुल्क है जिसने बेनज़ीर भुट्टो को प्रधानमंत्री चुनकर मुस्लिम जगत को पहली महिला प्रधानमंत्री दिया था.

लेकिन आज इसी मुल्क में कुछ ऐसे भी इलाके हैं जहां औरतों को उनके संविधान की तरफ से दिए गए मताधिकार के इस्तेमाल की इजाजत नहीं है.

पाकिस्तान चुनाव पर बीबीसी विशेष

पाकिस्तान के चुनावों पर नजर रखने वाले संगठन ‘फ्री एंड फेयर इलेक्शन नेटवर्क’ के मुताबिक पिछले आम चुनावों के दौरान देश में 564 ऐसे मतदान केंद्र थे जहां एक भी महिला वोट देने के लिए बूथ पर नहीं गई.

बीबीसी ने इस बात की पड़ताल करने की कोशिश की है कि क्या इस बार के आम चुनाव में हालात में कोई बदलाव आएगा.

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनवाला सूबे में पहाड़ों पर बसे गांव मानकी की गलियों में बमुश्किल ही कोई औरत दिखाई देती है. वे घरों की चारदीवारी के भीतर रहती हैं.

'वोट देने की इजाजत नहीं'

जब मैं एक बड़े से मकान में दाखिल हुई तो पाया कि वहां कई औरतें रोजमर्रा के घरेलू कामकाज में मसरूफ थीं.

उनमें से किसी ने कभी भी अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं किया था.

इसकी वजह यह नहीं थी कि वे वोट देना नहीं चाहती थीं बल्कि गांव के मर्दों ने उन्हें अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने नहीं दिया.

तसलीम खान नजदीक के स्वात शहर से ताल्लुक रखते हैं और राजनीतिक कार्यकर्ता भी है.

नागरिक संगठनों के साथ काम करते हुए उन्होंने मानकी के मर्दों को अपना रवैया बदलने के लिए समझाने की कोशिश की.

मानकी के मर्दों को बैठकों का आयोजन करके यह बताया गया कि महिलाओं को वोट देने की इजाजत देकर किस तरह से पूरे इलाके के विकास में मदद पहुंचाई जा सकती है.

तसलीम यह स्वीकार करते हैं कि पुरुषों को अपनी बात सुनाने के लिए समझाना भी एक मुश्किल चुनौती है.

वह कहते हैं, "पुरुष नहीं चाहते कि महिलाएं चुनावों में भागीदारी करें. वे कहते हैं कि वोट देना उनका काम है. महिलाओं का काम घर और परिवार की देख-भाल करना है. हमने इस रवैये का विरोध किया और पिछली बार कुछ महिलाओं को उनके घरों से मतदान केंद्रों तक ले गए लेकिन कुछ गांवों में पुरुषों ने महिलाओं को घरों से बाहर जाने की इजाजत नहीं दी."

समझौतों पर दस्तखत

साल 2008 के आम चुनावों के दौरान कबीलाई सरदारों ने पूरे खैबर पख्तूनवाला सूबे में कई गांवों में पंचायतें बुलाकर यह निश्चित करने की कोशिश की महिलाएं वोट न दे सकें.

Image caption इस बार के चुनाव में बदलाव की उम्मीद की जा रही है.

नतीजतन महज एक ही इलाके में 70 मतदान केंद्रों पर एक भी महिला वोट देने के लिए नहीं आ सकीं.

कुछ साल पहले की ही बात है जब स्थानीय चुनावों में अलग-अलग सियासी जमातों के उम्मीदवारों ने महिलाओं को मतदान केंद्रों से दूर रखने वाले समझौतों पर दस्तखत किए थे.

सामाजिक कार्यकर्ता रूहुल अमीन कहते हैं कि सियासी लोग खुशी से औरतों से उनके अधिकार छीनने वाले ऐसे समझौतों पर दस्तखत कर देते हैं.

उन्हें लगता है कि ऐसा करने से उनकी पार्टी को कोई नुकसान नहीं होगा.

रूहुल ने बताया, "अगर सियासी जमातों को लगता है कि औरतों के वोट उनमें बराबरी से बंटे हुए हैं तो वे ऐसे समझौतों पर दस्तखत कर देते हैं. इसलिए साल 2001 में दस परिषदें ऐसी थीं जहां महिलाओं को वोट देने की इजाजत नहीं थी. अगर किसी पार्टी को यह लगे कि उसे महिलाओं के बीच ज्यादा समर्थन हासिल है तो वह ऐसे समझौतों से फासला रखती है."

पख्तूनों के असर वाले इलाके

लेकिन चुनाव की करीब आती तारीख के मद्देनजर आवामी नेशनल पार्टी की तरफ से चुनाव प्रचार कर रही महिलाओं ने यह तय किया है कि उन्हें वोट देने से कोई नहीं रोकेगा.

पार्टी दफ्तर में खानदाना नईम कहती हैं कि इस बार महिलाओं के पास अपने अधिकारों की पहले से अधिक जानकारी है.

खानदाना नईम कहती हैं, "पंजपीर और शाह मंसूर के इलाकों में कोई औरत वोट नहीं दे पाती क्योंकि कबीले उन्हें इसकी इजाजत नहीं देते. ऐसे मदरसे और मौलवी भी हैं जो औरतों के वोट देने के खिलाफ हैं लेकिन इस बार मुझे उम्मीद है कि ऐसा नहीं होगा क्योंकि महिलाएं अब ज्यादा जागरूक हैं."

साल 2008 में जिन मतदान केंद्रों पर एक भी महिला वोट देने नहीं आ सकी थीं, उनमें ज्यादातर पख्तूनों के असर वाले इलाके थे लेकिन मुल्क की राजधानी इस्लामाबाद में एक भी ऐसा पोलिंग बूथ नहीं था जहां महिलाओं ने वोट न दिए हों.

आवामी नेशनल पार्टी के कार्यकर्ता लोगों के घर-घर जाकर उनके दरवाजों पर दस्तक दे रहे हैं और इस बात की कोशिश कर रहे हैं कि यह दोबारा न हो.

लेकिन हर कोई उनकी कोशिशों से इत्तेफाक नहीं रखता.

ऐसी ही एक महिला नसरीन कहती हैं, "मेरे पति ने मुझे कभी नहीं कहा कि मैं जाकर वोट दूं लेकिन मैं इन पार्टी कार्यकर्ताओं को भी वोट नहीं दूंगी क्योंकि सियासी लोगों ने हमारे मुद्दों को सुलझाने की कभी कोशिश नहीं की."

हालांकि इस बार के चुनाव में महिलाओं को वोट देने से रोकने की किसी संगठित कोशिश की कोई खबर नहीं है.

लेकिन यह भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि चुनाव के दिन महिलाएं घर से निकलकर वोट देने जाएंगी या नहीं.

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