पीपीपी को अब भी बेनज़ीर का ही सहारा

जरदारी बेनजीर
Image caption बेनजीर की मौत के बाद जरदारी ने पार्टी की कमान संभाली

पाकिस्तान में पिछले आम चुनावों में प्रचार के दौरान एक आत्मघाती हमले में बेनजीर भुट्टो की मौत को पांच साल से भी ज्यादा समय हो गया है, लेकिन इन चुनावों में भी पीपल्स पार्टी उन्हीं के नाम पर वोट मांग रही है.

बेनजीर की पारंपरिक सीट रही लारकाना से इस बार राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की बहन फरयाल तालपुर चुनाव लड़ रही हैं.

बीबीबी विशेष: पाकिस्तान चुनाव 2013

इस इलाके में पीपीपी के कार्यकर्ता फरयाल तालपुर को भी उसी तरह समर्थन दे रहे हैं, जैसे वो बेनजीर के पीछे खड़े होते थे.

लारकाना के नौडेरो में परिवार के पुश्तैनी घर में दर्जनों महिलाएं बैठी हैं और मतदान वाले दिन की योजना बना रही हैं कि उस दिन क्या करना है.

'अद्दी फरयाल'

वैसे 'अद्दी फरयाल' यानी सिंधी में बहन फरयाल के नाम से मशहूर फरयाल कोई सामान्य उम्मीदवार नहीं हैं.

पिछले पांच साल में वो पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के भीतर सबसे ताकतवर महिला बन कर उभरी हैं.

वो किसी सरकारी पद पर तो नहीं हैं, लेकिन सरकार और पार्टी के मामलों में उनका खासा असर रहा है.

वैसे राष्ट्रपति होने के नाते खुद जरदारी अपनी बहन के लिए चुनाव प्रचार नहीं कर सकते हैं.

जरदारी के बेटे बिलावल भुट्टो भी संभवतः सुरक्षा चिंताओं के चलते चुनाव प्रचार से दूर ही रहे हैं. खास कर तालिबान की तरफ से पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को निशाना बनाए जाने की धमकी ने पार्टी की चिंताएं बढ़ाईं.

ऐसे में पार्टी के प्रचार की जिम्मेदार फरयाल तालपुर के कंधों पर आ जाती है.

'बेनजीर आज भी नेता'

इस बार चुनावों में भुट्टो परिवार से कोई करिश्माई नेता न होने की वजह से पीपीपी के प्रचार अभियान में दुश्वारियां आ रही हैं.

पार्टी के उम्मीदवारों को लोगों की नाराजगी भी झेलनी पड़ी है, जो पिछले पांच साल के दौरान पीपीपी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के प्रदर्शन से खुश नहीं हैं.

बेनजीर की मौत के बाद 2008 में पीपीपी ने चुनाव जीत कर सत्ता हासिल की, जिनमें सहानुभूति के आधार पर मिले वोटों का भी योगदान था.

इसके पांच साल बाद भी लगता है कि पीपीपी बेनजीर की मौत को ही इस्तेमाल कर चुनाव जीतने की कोशिश कर रही है.

पीपीपी के टीवी विज्ञापन इसी के इर्द गिर्ध घूमते हैं कि बेनजीर की हत्या कैसे हुई. इन विज्ञापनों में सरकार के प्रदर्शन का कम ही जिक्र देखने को मिलता है.

फरयाल तालपुर कहती हैं, “आज, जब मैं लोगों से बेनजीर के नाम पर वोट देने को कहती हूं, तो इसका मतलब ये है कि वो अब भी हमारी नेता बनी हुई हैं. वो पार्टी का बड़ा चेहरा हैं.”

तालपुर पीपीपी की सरकार के प्रदर्शन का भी बचाव करती हैं. उनका कहना है कि सरकार ने सड़कें, स्कूल और अस्पताल बनाने के अलावा नौकरियों के अवसर पैदा करने के अपने वादों को पूरा करने में अपनी तरफ से हर मुमकिन कोशिश की.

जनता की नाराजगी

लेकिन बहुत से लोगों को फरयाल बात गले नहीं उतरती. उनका कहना है कि सरकार ने आम लोगों के लिए कुछ नहीं किया है और स्थानीय नेता जनता से कटे रहे.

परचून की दुकान चलाने वाले इमदाद अली मीरबहार का कहना है कि उन्होंने अब तक हमेशा पीपीपी को वोट दिया है, लेकिन अब नहीं देंगे.

वो कहते हैं, “उनके मंत्री लोगों का उस तरह ख्याल नहीं रखते हैं, जैसे बेनजीर रखा करती थी. वो प्रॉपर्टी और महंगी कारें खरीदने में व्यस्त हैं जबकि मेरे जैसे गरीब मुसीबतों का सामना कर रहे हैं.”

लोगों की नाराजगी के चलते भुट्टो के गढ़ में क्षेत्रीय पार्टियां उभर रही हैं.

पूर्व नौकरशाह और चर्चित टीवी एंकर रहीं मेहताब अकबर रश्दी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (फंक्शनल) के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं.

वो मानती हैं कि मतदाता अपने वोट के जरिए पिछली सरकार को सबक सिखाएंगे. उनका कहना है, “अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए अब लोग पीपीपी की तरफ नहीं देख रहे हैं.”

वो कहती हैं, “पीपीपी की सरकार से लोग निराश हैं. इन दौरान सिर्फ अराजकता रही और अभूतपूर्व भ्रष्टाचार भी हुआ. ऐसे में लोगों का भुट्टो परिवार से भावनात्मक लगाव तो हो सकता है, लेकिन वो पीपीपी उम्मीदवारों को वोट नहीं डालेंगे.”

ये बात सही है कि खास कर सिंध प्रांत के देहाती इलाकों में रहने वाले लाखों गरीबों के बीच पीपीपी की जड़ें गहरी हैं. लेकिन अब पाकिस्तान के सियासी परिदृश्य में धीरे धीरे बदलाव आ रहा है.

मतदाता अब बदलाव चाहते हैं. साथ ही उनमें ये इच्छा भी लगातार मजबूत हो रही है कि चुने हुए प्रतिनिधि जवाबदेह हों.

ऐसे में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की पार्टी की संसद में ताकत घट सकती है, लेकिन देश की राजनीति में पीपीपी की अहम भूमिका बनी रहेगी.

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