'ये इलेक्शन चुनाव आयोग नहीं, बेतुल्लाह महसूद करवा रहा'

एएनपी
Image caption चुनावी हिंसा में मारे जाने वालों में सबसे अधिक अवामी नेशनल पार्टी से जुड़े लोग थे.

अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) पाकिस्तान के उन सियासी दलों में है जिन्हें आम चुनावों के दौरान चरमपंथियों के हमलों का सामना करना पड़ रहा है. एएनपी पाकिस्तान के अहम धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दलों में से एक है.

असफंदरयार वली ख़ान अवामी नेशनल पार्टी के अध्यक्ष हैं. वो महात्मा गांधी के सहयोगी रहे ख़ान अब्दुल ग़फ्फ़ार ख़ान के पोते भी हैं.

ख़ैबर-पख्तूनख्वाह प्रांत को एनएनपी का गढ़ माना जाता है और वहां उसकी सरकार भी रही है. इसको अलावा केंद्र में पिछली गठबंधन सरकार में भी एनएनपी शामिल रही है.

एएनपी के उम्मीदवारों और पार्टी कार्यकर्ताओं को इस चुनाव के दौरान बार-बार हमलों का निशाना बनाया गया है.

वो चरमपंथी संगठन तालिबान के हिट-लिस्ट पर भी है.

ज़मीनी हक़ीक़त

बीबीसी पाकिस्तान के एडिटर हारून रशीद ने असफंदरयार वली ख़ान से मुलाक़ात की और पूछा कि क्या वो मौजूदा हालात और चुनाव की तैयारियों से संतुष्ट हैं?

असफंदरयार वली: मैं तो कहता हूं कि मुझे तो ये पता नहीं कि इस चुनाव का जो रेफ्री है, वो कौन है?

हमारे चीफ़ इलेक्शन कमिश्नर, कार्यवाहक प्रधानमंत्री, चीफ़ जस्टिस हैं, या हकीमुल्लाह मेहसूद?

असूलन ये काम तो चुनाव आयोग का है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि ये काम हकीमुल्लाह मेहसूद कर रहे हैं.

क्योंकि वही तय कर रहे हैं कि ये तीन-चार पार्टियां चुनाव में हिस्सा ले सकती हैं, इन तीन-चार को हम इलेक्शन में हिस्सा नहीं लेने देंगे.

हारून रशीद: आप क्या समझते हैं इस रेफ्री को कहीं से मदद मिल रही है? स्टेट के अंदर से, स्टेट के बाहर से?

असफंदरयार वली: नहीं स्टेट के अंदर से... मेरे ख़्याल से वो दिन गुज़र गए. स्टेट के अंदर मैं स्टेट इंस्टिच्यूशन की बात कर रहा हूं, व्यक्ति विशेष की बात नहीं कर रहा.

उस दिन सेना प्रमुख का जो बयान आया है उससे ये साफ़ हो गया है कि ये स्टेट का कोई अंग नहीं है. बाहर को कोई...

हुकूमत

हारून रशीद: बाहर से कौन हो सकता है?

असफंदरयार वली: बाहर से... इससे तो मेरे ख़्याल से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि वज़ीरिस्तान में सिर्फ़ वज़ीर और मसूद नहीं बैठे.

Image caption पाकिस्तान में 11 मई को चुनाव होने हैं.

वहां अरब भी बैठे हैं, चेचन भी बैठे हैं, वहां ताजिक भी बैठे हैं, वहां उज़बेक भी बैठे हैं.

हारून रशीद: कुछ लोग कहते हैं कि आप लोगों ने पांच साल तक प्रांत में सरकार चलाई, केंद्र सरकार में भी आप गठबंधन का अहम हिस्सा थे. और ये आप लोगों की अपनी नाकामी है जिसकी वजह से आपको ये दिन देखना पड़ रहा है.

असफंदरयार वली: तीस साल तक जिस बला को पाला, आप उम्मीद करते हैं कि वो पांच साल में कंट्रोल हो जाए!

पूरा का पूरा पांच साल में कंट्रोल कर पाने में सफल हो पाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.

चरमपंथियों से बातचीत

हारून रशीद: पांच साल में इस मसले से निपटने के कोशिश समय-समय पर होती रही, लेकिन चरमपंथ के मामले पर कोई दूरदर्शिता नहीं दिखी.

असफंदरयार वली: हमने जिस तरह से स्वात घाटी में चरमपंथियों से बातचीत की उसी तरह की ऑफ़र दी कि आओ बातचीत करें.

हमने इसके लिए ऑल पार्टी कांफ्रेस बुलाई, लेकिन उस बैठक को नाका करने के इरादे से मौलाना फज़लुर्रहमान ने ख़ुद अलग से सभी दलों की बैठक बुला ली.

दूसरा मौक़ा हमें तब मिला जब एहसानुल्लाह एहसान ने कहा कि नवाज़ शरीफ़, मौलाना फज़लुर्रहमान और मनौवर हसन आएं और आकर गवाह बनें.

लेकिन ज़ामिन (गवाह) बनना या न बनना तो बाद की बात है, कम से कम इन तीनों लोगों को ये ऑफ़र क़बूल तो करना चाहिए था.

बात शुरू कर लेते, उन्होंने तो बातचीत शुरू ही नहीं होने दी.

इलेक्शन में हिस्सा

हारून रशीद: एक ख़्याल ये है कि 2014 में अमरीका के अफ़ग़ानिस्तान से वापस जाने के बाद चरपंथियों को हालात अपने अनुकूल बनाने के लिए ख़ैबर-पख्तूनख़्वाह में, क़बायली इलाक़ों में अपने विचारों वाले लोग चाहिए. तो क्या ये उसकी तैयारी है?

Image caption पाक में कई सालों बाद किसी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया है.

असफंदरयार वली: उधर भी चाहिए, और संसद में भी चाहिए. हम तो ख़ासतौर पर उनके निशाने पर हैं. वो ख़ैबर-पख़्तूनख़्वाह के लिए तो ये चाहते ही हैं कि यहां उनके हम ख़्याल लोग आएं लेकिन वो इस्लामाबाद में भी जितनी उदारवादी लोकतांत्रिक ताकतें हैं उनको संसद से बाहर रखना चाहते हैं, 2014 के लिए.

हारून रशीद: तो इसका क्या मतलब है, तो इसके लिए और ख़ून बहाया जाएगा?

असफंदरयार वली: और ज्यादा खून खराबा होगा क्योंकि... कल रात भी किसी ने मुझे फ़ोन किया.

अफ़ग़ानिस्तान का नंबर था. कहा, तू बड़ा ढ़ीट है, तू अभी भी कहता है कि इलेक्शन में हिस्सा लूंगा.

मैंने कहा कि हां, लूंगा. दूसरी तरफ़ से कहा कि जो तुम लोगों के साथ हो रहा है उसके बावजूद? क्या हम इससे भी आगे बढ़ें?

मैंने कहा कि हम पख़्तूनों में एक आदत है कि अगर कोई हमें जबरदस्ती जन्नत ले जाना चाहता है तो हम नहीं जाते हैं.

लेकिन अगर कोई हमें राज़ी करके नर्क ले जाना चाहता है, तो हम चले जाते हैं.

हमारा मक़सद ये है कि हम मैदान किसी भी सूरत में नहीं छोड़ने जा रहे हैं. एक हों, दो या, जितनी सीट हम जीत सकें.

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