क्या मुशर्रफ़ को लेकर नरम पड़ गए हैं नवाज़?

  • 22 मई 2013
Image caption परवेज मुशर्रफ से पुरानी दुश्मनी भूलकर आगे बढ़ने के लिए तैयार शरीफ

पूर्व सैनिक शासक परवेज़ मुशर्रफ़ को लेकर पाकिस्तान के नए नेतृत्व का रवैया नरम है. माना जा रहा है कि ये देश के ताक़तवर जनरलों और भविष्य के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच हुई मुलाकात का नतीजा है.

हालांकि इस मुलाकात के बारे में कुछ खास पता नहीं चल सका है लेकिन बेनजीर हत्याकांड में मुशर्रफ को जमानत दिए जाने और एक दूसरा हाई प्रोफाइल केस वापस लेने के बाद नए नेतृ्त्व का नरम रवैया स्पष्ट है.

चुनाव परिणाम आने के बाद से ही साबित हो चुका है कि नवाज शरीफ की पार्टी आसानी से सरकार बना लेगी. कम से कम दो राज्यों में भी उसकी सरकार बनेगी. इसके बाद से ही मीडिया में नागरिक सरकार और सैन्य नेतृत्व के बीच के संबंधों के बारे में कयास लगाए जा रहे हैं.

12 मई को चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद ब्रिटेन के पत्रकार क्रिश्चियन लैम्ब ने ट्वीट किया,“ बिना किसी हस्तक्षेप के नई सरकार चुनने वाले पाकिस्तान के लिए ये गर्व का दिन है.

पाकिस्तान की सेना नवाज शरीफ के बारे में क्या सोच रही होगी?” लैम्ब ने बेनजीर भुट्टो के पहले कार्यकाल के बारे में एक किताब भी लिखी है जिसका नाम है “वेटिंग फॉर अल्लाह.”

परेशानी भरा अतीत

इससे पहले देशी और विदेशी मीडिया में शरीफ-मुशर्रफ संबंधों पर खूब लिखा गया क्योंकि दोनों के बीच के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. 1999 में जनरल मुशर्रफ के नतृत्व में नवाज शरीफ की सरकार का तख्ता पलट किया गया था.

Image caption जनरल कयानी ने नवाज शरीफ से मुलाकात कर संबंध सुधार की पहल की

न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर डेक्लन वाल्श कहते हैं, “शरीफ और सेना के बीच तीसरा राउंड...अब जबकि शरीफ 20 साल के अंतराल में तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं जनरलों के साथ उनके संबंधों की सफलता दो बातों पर निर्भर करेगी—एक तो वो कितना बदले हैं दूसरा क्या वो खुद भी बदलें हैं या नहीं.”

चुनाव के एक सप्ताह पहले एनडीटीवी से बात करते हुए नवाज शरीफ ने कहा था कि वो सेना के हाथों की बांसुरी नहीं बनेंगे.

उन्होंने कहा था, “जब मैं देश का प्रधानमंत्री था तब नीतियां सरकार और राज्य के प्रमुख द्वारा बनाई जाती थीं. और इसके बाद दूसरे संस्थान इसे लागू करते थे. मैं इसी व्यवस्था को आगे भी मानूंगा. हर किसी को उसकी सीमा में रहना चाहिए.”

इसके बाद शरीफ ने अपने उस बयान के जरिए देश की राजनीति और सेना के अंदर खलबली मचा दी थी जिसमें उन्होंने भारत के साथ संबंध ठीक करने की बात कही थी.

कयानी फैक्टर

इस बात में कोई शक ही नहीं कि शरीफ के कड़े बयानों के बाद उनकी पार्टी के नेताओं के माथे पर भी बल पड़ गए थे. लेकिन ये सेनाध्यक्ष कयानी थे जिन्होंने तनाव कम करने की पहल अपनी ओर से की और 17 मई को शरीफ के मॉडल टाउन वाले घर जाकर उनसे मुलाकात की.

हालांकि आधिकारिक रूप से इस मुलाकात के बारे में कुछ नहीं कहा गया लेकिन अगर उस दिन की मीडिया कवरेज पर भरोसा करें तो दोनों पक्षों ने सुरक्षा और विदेश नीति के मसलों पर एक दूसरे का पक्ष सुनने के बारे में सहमति जताई.

रिपोर्ट के मुताबिक सेनाध्यक्ष कयानी ने नवाज शरीफ की उस मांग का समर्थन किया है जिसमें उन्होंने जल्द से जल्द अमरीका से ड्रोन हमलों को रोक जाने की बात कही थी.

बदले में नवाज शरीफ ने कयानी को आश्वासन दिया कि एक संस्था के रूप में सेना से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है. वो देश के संकट से निकालने के लिए सेना के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं.

सुरक्षित रास्ता

माना जाता है कि शरीफ-कयानी की मुलाकात में परवेज मुशर्रफ का भी जिक्र किया गया. दोनों पक्षों की शुरुआती मुलाकात का असर भी दिख रहा है.

Image caption पूर्व सैनिक शासक परवेज मुशर्रफ फिलहाल पाकिस्तान में नजरबंद

कहा जा रहा है कि सेनाध्यक्ष को पीएमएलएन की ओर से ये भरोसा दिया गया है कि अगर वो ताजपोशी से पहले देश छोड़ना चाहें तो वो कई दिक्कत नहीं पेश करेंगे.

इसी से जुड़े एक घटनाक्रम में वकील असल गुमान ने मुशर्रफ के समय सभी जजों को नजरबंद किए जाने के बारे में एक याचिका दाखिल की है. इसमें उन्होंने सभी जजों से मुशर्रफ़ के खिलाफ ‘देश के हित में’ सभी केस वापस लेने को कहा है.

यह भी महज इत्तफाक नहीं है कि मुशर्रफ को 20 मई को बेनजीर हत्याकांड केस में आतंकवाद निरोधी कोर्ट से जमानत भी मिल गई.

तालिबान का क्या होगा

मुशर्रफ को लेकर भले ही नागरिक सरकार और सेना ने सुलह कर ली है लेकिन तालिबान को लेकर दोनों के सुर अलग अलग हैं.

सेना के उलट नवाज अभी भी मानते हैं कि तालिबान से बातचीत करना देश में शांति बहाल करने का सबसे आसान रास्ता है.

मुशर्रफ को देश से सुरक्षित चले जाने देना बेशक अच्छी शुरुआत है लेकिन इस केस का एक तीसरा पक्ष भी है और वो है न्यायपालिका.

अभी तक उनकी तरफ से इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

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