जब एवरेस्ट से आया हिलेरी को फ़ोन

Image caption आज से साठ साल पहले सर एडमंड हिलेरी और शेनरा तेनज़िंग नोर्ग ने एवरेस्ट की चोटी पर रखा था कदम.

आज के दौर में एवरेस्ट की चढ़ाई आसान हो गई है. आए दिन किसी ना किसी के एवरेस्ट फतह करने की ख़बर आती है.

लेकिन ज़रा कल्पना कीजिए आज से साठ साल पहले की. जब न्यूज़ीलैंड के सर एडमंड हिलेरी और नेपाल के शेरपा तेनज़िंग नोर्गे 29 मई, 1953 को एवरेस्ट पर पहुंचे, तो दुनिया भर में इसे अविश्वसनीय उपलब्धि के तौर पर देखा गया था.

सर एडमंड हिलेरी के बेटे पीटर हिलेरी अपने पिता की उपलब्धि पर बीबीसी आउटलुक को दिए इंटरव्यू में बताते हैं, “इसमें कोई संदेह नहीं, वो अविश्वसनीय काम था. जब उन्होंने ये कारनामा दिखाया था, तब यकीन करना मुश्किल था कि 29 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई पर कोई पहुंच पाएगा.”

पिता-पुत्र की जोड़ी

पीटर हिलेरी ख़ुद दो बार एवरेस्ट पर चढ़ चुके हैं. 1990 में जब वे पहली बार एवरेस्ट पर पहुंचे तो एडमंड और पीटर की जोड़ी पिता-पुत्र की पहली जोड़ी बनी जिन्होंने एवरेस्ट पर पहुंचने कारनामा दिखाया.

एवरेस्ट पर पहुंचने के बाद किसी के मन में क्या ख़्याल आता होगा? जब यही सवाल पीटर हिलेरी से पूछा गया तो उनका जवाब बड़ा दिलचस्प था.

पीटर ने कहा, “सबसे अच्छा ख़्याल तो यही आता है कि अब चढ़ाई खत्म हो गई है. इसके बाद आप नीचे देखने की कोशिश करते हैं. बहुत ख़तरनाक जगह होती है. एकदम संकरा होता है. संभल कर रहना होता है. मैं जब दूसरी बार एवरेस्ट पर पहुंचा तो मैं ने इधर उधर देखने की कोशिश की थी, लेकिन देख नहीं पाया था, क्योंकि हर तरफ़ बादल ही बादल थे.”

पीटर हिलेरी दूसरी बार एवरेस्ट पर नेशनल ज्योग्राफिक सोसायटी की उस ऐतिहासिक टीम के साथ चढ़े थे, जो सर एडमंड हिलेरी और शेरपा तेनजिंग की कामयाबी की 50वीं वर्षगांठ के मौके पर चोटी पर पहुंचे थे.

एवरेस्ट से फ़ोन

इस दौरान उन्होंने एक बड़ी दिलचस्प हरकत भी की.

पीटर हिलेरी ने बीबीसी आउटलुक को बताया, “दूसरी बार जब मैं चोटी पर पहुंचा था, तो मैं अपने साथ सैटेलाइट फ़ोन ले गया था. वहां से मैं ने किसी तरह से अपने पिता को फ़ोन मिलाया. ये मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण पल था. मैंने उन्हें देरी से फ़ोन करने के लिए माफ़ी मांगी. और छोटी मगर अच्छी बातचीत की. उन्होंने मुझसे कहा कि जब तक आप नीचे नहीं आ जाते तब तक काम पूरा नहीं हुआ.”

पीटर हिलेरी का जन्म एडमंड और शेरपा तेनजिंग नार्वे के एवरेस्ट पर पहुंचने के करीब 18 महीने बाद हुआ था. लिहाजा उन्हें बचपन से ही पिता के करिश्मे को देखने का मौका मिला था.

पीटर हिलेरी अपने अनुभव के बारे में बताते हैं, “मेरे पिता वाकई में ग्लोबल हस्ती बन चुके थे. हम कहीं जाते चाहे पोस्ट ऑफ़िस या फिर एयरपोर्ट, लोग उन्हें घेरकर ऑटोग्राफ़ मांगते.”

पीटर के मुताबिक उनके बचपन में पिता के आसपास आने वाले लोगों ने उन्हें काफी प्रभावित किया.

दूसरी ओर सर एडमंड हिलेरी अपनी कामयाबी के बाद भी लगातार पर्वतारोहण करते रहे. इसका असर पीटर पर भी पड़ा. उन्हें भी पहाड़ों पर चढ़ने में मज़ा आने लगा था.

पीटर की दिलचस्पी 1977 में परवान चढ़ने लगी. इस साल सर एडमंड हिलेरी ने बंगाल की खाड़ी से हिमालय की चोटी पर चढ़ने का अभियान चलाया था, जिसका नाम था जेटबोट अभियान.

वो यादगार अभियान

Image caption एवरेस्ट की चोटी की ओर बढ़ते हिलेरी और तेनज़िंग नोर्गे के कदम.

पीटर हिलेरी याद करते हुए बताते हैं, “मेरी उम्र तब 21-22 साल रही होगी. हम जेटबोट के साथ बंगाल की खाड़ी से गुजरते हुए, गंगा के किनारों से होते हुए गढ़वाल की पहाड़ियों तक पहुंचे थे.”

इस अभियान के बारे में बताते हुए पीटर हिलेरी बीबीसी आउटलुक कार्यक्रम में कहते हैं, “ये बेहद दिलचस्प यात्रा थी. इस यात्रा में हम भारत की संस्कृति से काफी प्रभावित हुए थे. हमारे साथ काफी पर्वतारोही थे. कोलकाता के बंगाल की खाड़ी पर हमें तीस लाख लोगों की भीड़ ने विदा किया था. इतनी आबादी तो न्यूज़ीलैंड की उस वक्त नहीं रही होगी.”

इस यात्रा के दौरान अनुभव के बारे में बताते हुए कहते हैं, “बिहार में एक जगह में करीब दस हजार लोगों की भीड़ हमें देखने पहुंची थी. वहां पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था भी थी. आम लोगों को संभालने के लिए पुलिस को लाठी चलानी पड़ी होगी. अव्यवस्था होने लगी थी. इससे एक लंबा चौड़ा आदमी काफी नाराज हो गया था. लेकिन मेरे पिता ने पुलिस को हटाते हुए उन्होंने उस आदमी का हाथ पकड़ लिया. लेकिन वो अचानक से मुस्कुराने लगा. और वहां शांति छा गई.”

एवरेस्ट पर प्रदूषण

क्या सर एडमंड हिलेरी ने कभी पीटर हिलेरी को पर्वतारोहण के क्षेत्र में जाने को कहा, इसके जवाब में पीटर कहते हैं, “मेरे पिता हमेशा कहते थे कि तुम क्या करना चाहते हो, ये तुम तय करो. अपने फ़ैसले तुम्हें ख़ुद लेना चाहिए.”

वैसे पीटर हिलेरी मानते हैं कि आजकल की तकनीक और अच्छे उपकरणों की मदद से एवरेस्ट की चोटी तक पहुंचना आसान हो गया है. इससे एवरेस्ट पर कचरा बढ़ने और उसके प्रदूषित होने की ख़बरे भी आ रही हैं.

पीटर हिलेरी बताते हैं, “प्रदूषण की समस्या है, लेकिन मेरे ख्याल से वहां साफ सफाई का ख्याल रखा जा सकता है. एवरेस्ट बेस कैंप इसका ख्याल रख सकता है.”

पीटर हिलेरी आज भी हिमालय के पर्वतीय इलाकों में अपने पिता द्वारा स्थापित संस्था हिमालयन ट्रस्ट को संचालित करते हैं. संस्था की ओर से हिमालय के पर्वतीय इलाकों में दूर दराज में बसे लोगों की मदद के लिए अस्पताल और स्कूल चलाए जाते हैं.

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