समय के साथ बदलती धार्मिक परंपराएं

  • 1 जून 2013
Image caption समय के साथ धार्मिक परंपराओं में भी बदलाव देखने को मिल रहा है

एक समय था, जब हिंदू धर्म में पशुओं की बलि चढ़ाने की परंपरा थी. ईसाई धर्म में कैथोलिक पादरी ब्रहमचारी नहीं हुआ करते थे और पैगंबर मोहम्मद का चित्रण इस्लामिक कलाकृतियों में देखने को मिलता था.

लेकिन अब जल्दी ही ब्रिटेन के कुछ चर्च में आपको समलैंगिक लोगों की शादी होते दिख सकती है. यानि साफ़ है कि धर्म भी समय के साथ अपनी परंपराओं को बदल रहा है.

सन 1889 में विलफ्रॉड वुड्रॉफ़ मॉरमॉन चर्च (चर्च ऑफ़ जीसस क्राइस्ट ऑफ़ लेटर–डे सेंट्स) के चौथे अध्यक्ष बने. अध्यक्ष के तौर पर उन्हें ईश्वर के दूत के तौर पर देखा जाने लगा.

माने जाने लगा कि उन्हें जीसस क्राइस्ट से संदेश मिलता है. हालांकि उन्हें इसकी ज़रूरत थी क्योंकि चर्च काफ़ी मुश्किलों का सामना कर रहा था.

पिछले चालीस सालों से मॉरमॉन चर्च के लोग अमरीकी कांग्रेस से बहुविवाह के मुद्दे पर भिड़े हुए थे.

पुरुष बहुविवाह के समर्थक थे वहीं सरकार इसे ग़ैर-क़ानूनी मान रही थी. धार्मिक विश्वास भी इस मसले पर कोई बचाव नहीं दे पा रही थी.

वुड्रॉफ़ उस समय अनिश्चित जीवन जी रहे थे, गिरफ़्तार होने से बचने के लिए इधर उधर भागे फिरते थे. 1890 में सरकार ने चर्च की सभी संपत्ति को ज़ब्त कर लिया.

पादरियों पर लगी पाबंदी

तब वुड्रॉफ़ ने कहा कि जीसस क्राइस्ट उनके सपने में आए और उन्होंने बताया कि चर्च का भविष्य तभी सुरक्षित रहेगा जब बहुविवाह की इस प्रथा को ख़त्म किया जाएगा. हालांकि तब उनकी ख़ुद सात पत्नियां थीं.

इसके बाद वुड्रॉफ़ ने बहुविवाह पर पाबंदी लगाने की घोषणा की.

ऐसा लगा कि इससे समस्या का हल जल्दी मिल जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी में अमरीकी धार्मिक इतिहास विभाग की प्रोफ़ेसर कैथलीन फ्लेक यही मानती हैं.

वह कहती हैं, ''यह काफ़ी अलग चीज़ होती है, सामाजिक तौर पर भी, व्यक्तिगत तौर पर और धार्मिक तौर पर भी.''

Image caption विलफ्रॉड वुड्रॉफ़ मॉरमॉन चर्च में अहम बदलाव लाने वाले पादरी थे

लेरिन इस बदलाव ने पूरे चर्च को अस्थिर किया और मॉरमॉन के मूल सिद्धांतों पर इसका असर पड़ा. इतिहास गवाह है कि किसी धर्म ने बदलाव से इनकार किया तो उसका अस्तित्व संकट में आ गया.

लेकिन उन धर्मों का क्या करें जिसमें जीवित पैगंबर नहीं होते. उनमें बदलाव कैसे होता है?

मुसलमानों के अंतिम पैगंबर, पैगंबर मोहम्मद का निधन क़रीब चौदह सौ साल पहले सन् 632 ईसवी में हुआ था. ऐसे में धार्मिक गुरू, जो इस्लामी क़ानून के जानकार होतें हैं, क़ुरान और सुन्नाह का गंभीर अध्ययन करके इस्लामिक या शरिया क़ानून निर्धारित करते हैं.

लेकिन चुनौती इस बात की है कि कोई क़ानून जो सातवीं शताब्दी में अरब समाज में लागू था वह 21वीं शताब्दी में दुनिया भर में कैसे लागू होगा. यहीं वजह है कि दुनिया के अलग-अलग देशों के धार्मिक नेता अलग अलग फ़ैसले लेते हैं.

रेडियो सुनने लगे मुसलमान

मसलन, एक शताब्दी पहले तक रेडियो या लाउडस्पीकर का इस्तेमाल मुसलमानों के लिए हराम हुआ करता था. लेकिन आज ढेरों मुसलमानों के पास अपना रेडियो, टीवी और यूट्यूब चैनल मौजूद है.

1979 के ईरानी क्रांति के दौरान धार्मिक गुरूओं ने कहा था कि जन्मदर को नियंत्रित करना हराम है लेकिन अब कंडोम के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ डिलावारे के मुक़्तदर ख़ान कहते हैं, ''पहले ये धारना थी कि पश्चिम से आने वाली हर चीज़ इस्लाम को नीचा दिखाने वाली है.''

मुसलमानों के लिए एक ऐसी ही चुनौती है मूत्रविसर्जन करना. मुक़्तदर ख़ान बताते हैं कि परंपरा के मुताबिक़ मुसलमानों को बैठकर मूत्रविसर्जन करना होता है, लेकिन यह पश्चिमी जीवनशैली में हमेशा संभव नहीं होता.

Image caption पहले इस्लाम में लाउडस्पीकर सुनना नापाक माना जाता था

एक ऐसी ही चुनौती पश्चिमी घरों की बनावट से पैदा होती है.

मुक़्तदर ख़ान बताते हैं, ''पश्चिम में लिंग भेद को ध्यान में रखकर घर नहीं बनते. यानि महिलाओं के लिए अलग से कमरे और बैठकें नहीं होते.''

ख़ान ये भी कहते हैं कि कई बार बहुविविध समाज में रहने वाले मुसलमान धर्मग्रंथ की पुर्नव्याख्या चाहते हैं.

आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के तारिक़ रमादान कहते हैं, ''जब तक हमारी समझ विकसित नहीं होती तब तक इस्लाम के संदेश में विश्वास का कोई मतलब नहीं है.''

मैकगिल यूनिवर्सिटी में तुलनात्मक अध्ययन के प्रोफ़ेसर अरविंद शर्मा बताते हैं कि किस तरह से महात्मा गांधी ने कर्म के आधार पर जातीय विभाजन में बदलाव लाने का काम किया.

शर्मा कहते हैं, ''परंपरागत तौर पर हिंदू धर्म में कहा जाता था कि एक आदमी इसलिए अछूत है क्योंकि उसने अपने पूर्वजन्म में पाप किए होंगे, इसलिए उसे इस जन्म में उसकी सज़ा भुगतनी होगी.''

अंग्रेज़ों का छुआछूत

शर्मा के मुताबिक़ गांधीजी ने बताया कि भारत में अंग्रेज़ सभी जाति के हिंदुओं को अछूत मानते हैं.

अंग्रेज़ अपने क्लब के बाहर में साइन बोर्ड में लिखा करते थे, ''कुत्ते और भारतीयों को अंदर आने की इजाज़त नहीं है.''

इसे भारतीयों के सामने रखते हुए गांधीजी का तर्क होता था, ''देखिए. यहां कर्म क्या कर रहा है. आप लोगों को जन्म के आधार पर अछूत मानते हैं लेकिन अंग्रेज़ आपको भी जन्म के आधार पर अछूत मान रहे हैं.''

धार्मिक परंपराओं में इन बदलावों की बड़ी वजह विज्ञान भी है.

जब गैलिलियो ने पहली बार ये कहा था कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर काटती है तो लोगों ने उनपर संदेह किया था , और उन्हें अपने जीवन का अंतिम दशक क़ैद में बिताना पड़ा था.

कैथोलिक चर्च ने ये मान लिया है कि गैलिलियो सही थे और 1992 में पॉप जॉन पॉल ने उन्हें आधिकारिक रूप से दोषमुक्त क़रार दिया था.

दरअसल विज्ञान हमेशा धार्मिक परंपराओं के लिए मुश्किल सवाल पेश करता रहा है.

हिस्ट्री ऑफ़ गॉड की लेखक और 20 अन्य धार्मिक अध्ययन कर चुकी कैरेन आर्मस्ट्रांग कहती हैं, ''हमें अपने बारे में हमेशा रचनात्मक तौर पर सोचते रहना चाहिए, चीज़ का हल ऐसे ही निकलता है.''

कैरेन के मुताबिक़ तेज़ी से बदलती दुनिया में धर्म कैसे स्थिर हो सकता है.

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