मज़हबी कट्टरपंथ की ओर बढ़ रहा एक मुल्क

अरब जगत में ट्यूनीशिया की छवि लंबे समय से सबसे धर्मनिरपेक्ष देश की रही है. लेकिन अब वहां धार्मिक कट्टरपंथ बढ़ता जा रहा है.

धर्मनिरपेक्षता के पैरोकार आरोप लगा रहे हैं कि इस्लामी कट्टरपंथी समाज पर अपनी अतिरुढ़िवादी विचारधारा को थोपने की कोशिश कर रहे हैं और हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं.

ब्लॉगर और सामाजिक कार्यकर्ता लीना बेन मेनी एक वीडियो दिखाती हैं जिसमें एक टीवी शो के दौरान एक इस्लामी कट्टरपंथी उनकी आलोचना कर रहे हैं.

ट्यूनीशिया में बहुत से धार्मिक कट्टरपंथी गुट क्रांति के बाद ट्यूनीशिया को उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने की लीना जैसे कार्यकर्ताओं की मुहिम को पसंद नहीं करते हैं.

सिमट रहा है उदारवाद

राजधानी ट्यूनिस के पास अपने घर में वो दिखाती हैं कि कैसे उन्हें फ़ेसबुक और उनके मोबाइल फ़ोन पर धमकियां मिल रही हैं.

लीना बताती हैं, “ये धमकियां सिर्फ़ फ़ेसबुक या मोबाइल फ़ोन तक ही सीमित नहीं हैं. वो मुझे सड़के पर चलते वक़्त भी छेड़ते हैं और बुरा भला भी कहते हैं. हमें धर्म या धार्मिक लोगों से कोई दिक़्क़त नहीं है, लेकिन असल परेशानी कट्टरपंथी सलफ़ी गुट हैं जो समाज पर अपनी विचारधारा थोपना चाहते हैं.”

सलफ़ी या कहिए अतिरुढिवादी गुट अंसार अल शरिया संगठन के सदस्य अक्सर ट्यूनिस की सड़कों पर निकले हैं. वो नारे लगाते हैं, “मिस्टर बराक ओबामा, हम सब ओसामा बिन लादेन हैं.”

ये लोग चाहते हैं कि शरिया क़ानून लागू किया जाए. दो साल पहले देश में क्रांति हुई और दशकों से जारी दमनकारी शासन का अंत हुआ. लेकिन इससे सलफ़ी गुट भी मज़बूत हो कर उभरे हैं.

'शरिया क़ानून लागू हो'

ट्यूनीशिया में मौजूदा उदारवादी इस्लामपंथी सरकार भी स्थिति को लेकर चिंतित है.

पिछले महीने जब सरकार ने अंसार अल शरिया के एक सालाना सम्मेलन को प्रतिबंधित कर दिया तो उसके सदस्यों की सुरक्षा बलों से झड़पें हुईं.

सरकार अंसार के नेताओं पर नफ़रत फैलाने और हिंसा भड़काने का आरोप लगाती है, जिसमें पिछले साल सितंबर में अमरीकी दूतावास पर हमला भी शामिल है.

इस गुट के नेता के ख़िलाफ़ गिरफ्तारी वांरट भी जारी किया गया है.

अंसार अल शरिया गुट के सदस्य आम तौर पर मीडिया से बात नहीं करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी बात को सही तरीक़े से पेश नहीं किया जाता है.

लेकिन गुट के एक सदस्य यूसुफ़ इसलिए बीबीसी से बात करने को राज़ी हुए कि उनकी बात दुनिया तक पहुंचनी भी ज़रूरी है.

यूसुफ कहते हैं, "हम आंतकवादी संगठन नहीं हैं जैसा कि सरकार और पश्चिमी जगत हमें पेश करते हैं. हमारा आंदोलन शांतिपूर्ण हैं और हम इस्लाम धर्म का प्रचार करते हैं. हां, हम शरिया लागू करना चाहते हैं और यही हमारी राय है. हम धर्म का प्रचार करते हैं और ग़रीब इलाक़ों में लोगों की मदद करते हैं. आप ख़ुद वहां जाकर देख सकते हैं."

सरकार पर भारी कट्टरपंथी ताकतें

ट्यूनीशिया के बाहरी इलाक़े में स्थित एक ग़रीबों की बस्ती में अंसार अल शरिया के सदस्यों को लोगों की मदद करते देखा जा सकता है. यहां रहने वालों लोगों के लिए दो वक्त की रोटी का प्रबंध करना सबसे बड़ी चुनौती है.

यहां रहने वाले लोगों को जब अंसार अल शरिया के सदस्य खाना, दवाएं और कपड़े देते हैं, तो वो ख़ुशी ख़ुशी उसे स्वीकार करते हैं.

ट्यूनिस विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर क़ैसी सैदी मानते हैं कि जिन इलाक़ों में सरकार बुनियादी सेवाएं मुहैया नहीं करा पा रही है.

वहां अंसार अल शरिया जैसे संगठनों से खूब फलने फूलने का मौका है.

सैदी कहते हैं, "ये एक आदत बन गई है कि पार्टियां और आंदोलन ख़ास कर उन इलाक़ों में अपनी पैठ बनाने की कोशिश करते हैं जहां बहुत ज़्यादा बेरोज़गारी और ग़रीबी है. वहां अगर अंसार अल शरिया अगर सामाजिक कार्य करता है तो उसे आसानी से वोटों में तब्दील किया जा सकता है. मैं मानता हूं कि इसमें कोई शक नहीं है कि कट्टरपंथी गुट ट्यूनिशिया के धर्मनिरपेक्ष ताने बाने को बदल देना चाहते हैं."

ट्यूनीशिया में आजकल कई लोग सड़कों पर महिलाओं को नकाब पहने हुए देखकर हैरानी जताते हैं.

उनका कहना है कि ये ऐसी बात है जिसके बारे में कुछ समय पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी.

लेकिन बढ़ते कट्टरपंथ के चलते ऐसा हो रहा है.

इसे ट्यूनीशिया जैसे देश में ख़तरे की घंटी माना जा रहा है जो लंबे समय से अरब जगत का सबसे धर्मनिरपेक्ष देश रहा है.

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