कीनियाई नागरिकों को हर्ज़ाने की घोषणा जल्द

केन्या को हर्ज़ाना देगा यूके
Image caption ब्रिटिश सरकार केन्या के माऊ-माऊ विद्रोह के दौरान यातना के शिकार लोगों को हर्ज़ाना देने पर विचार कर रही है

ब्रिटिश सरकार 1950 के दशक में कीनिया के माऊ-माऊ विद्रोह के दौरान यातनाएं झेलने वालों को हर्ज़ाना देगी. समझा जाता है कि विदेश मंत्री विलियम हेग एक अरब रुपए से ज़्यादा की सहायता की घोषणा कर सकते हैं.

पांच हज़ार कीनियाई नागरिकों का कहना है कि उनके साथ तब के औपनिवेशिक प्रशासन के दौरान या तो बदसुलूकी हुईं या फिर यातनाएं दी गईं.

ब्रिटिश सरकार ने उस वक़्त माऊ-माऊ विद्रोहियों के साथ ज़बर्दस्त जंग लड़ी थी. ये विद्रोही औपनिवेशिक शासन के ख़ात्मे के साथ ही ज़मीन की भी मांग कर रहे थे.

इस युद्ध में यातनाओं के शिकार कई साल से ब्रिटिश सरकार से हर्ज़ाने की मांग कर रहे हैं.

बीबीसी को मिली जानकारी के मुताबिक हेग इन पीड़ितों के प्रति दुख जताने के अलावा हाउस ऑफ कॉमंस में हर्ज़ाने की घोषणा भी कर सकते हैं.

2011 में शुरू हुई क़ानूनी जंग

सरकार ने पहले तर्क दिया था कि औपनिवेशिक शासन ख़त्म होने के बाद यातनाओं की सारी ज़िम्मेदारी 1963 में आज़ादी के बाद कीनियाई रिपब्लिक की हो गई थी और इसके लिए ब्रिटेन को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

मगर 2011 में हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि तीन दावेदारों- पाओलो मुओका न्ज़िली, वामबुगा वा न्यिंगी और जेन मुथोनी मारा का मामला क़ानूनन बहस के लायक है.

कई का ख़ून, कई अपंग

Image caption केन्याई मानवाधिकार आयोग के मुताबिक 90 हज़ार केन्याई नागरिकों को यातनाएं दी गईं थीं

वकीलों का आरोप था कि विद्रोह के दौरान न्ज़िली को नपुंसक बनाया गया, न्यिंगी को बुरी तरह पीटा गया और मारा के साथ क़ैदियों के कैंप में यौन प्रताड़नाएं दी गईं थीं.

ब्रिटेन के फॉरेन एंड कॉमनवेल्थ ऑफ़िस यानी एफ़सीओ ने दावा किया कि ये मामला वैधानिक समय सीमा के बाहर चला गया है. इसके बाद ये केस एक बार फिर हाईकोर्ट पहुंचा.

एफ़सीओ का कहना था कि गवाहों और दस्तावेज़ों की उपलब्धता को लेकर उसे काफ़ी परेशानी का सामना उठाना पड़ा.

मगर पिछले साल अक्टूबर में अदालत ने कहा कि पीड़ितों का केस काफ़ी पुख़्ता है और वक़्त बीतने के बावजूद उनके दावों के आधार पर मुक़दमा चलाया जाए.

उस वक़्त तीन दावेदारों के वकील ने कहा था कि वो ‘जल्द से जल्द’ मुक़दमा शुरू करवाने के प्रयास करेंगे और साथ ही कोशिश करेंगे कि सरकार के साथ अदालत से बाहर कोई समझौता हो सके.

1952 में हुआ था विद्रोह

विद्रोही गुट माऊ-माऊ ने 1952 में ब्रिटिश निवासियों के ख़िलाफ़ ख़ूनी अभियान शुरू किया था जिसे बाद में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने दबा दिया था.

कीनिया के मानवाधिकार आयोग ने कहा था कि इस दौरान 90 हज़ार कीनियाइयों की हत्या हुई, उन्हें यातनाएं दी गईं या अपंग बना दिया गया. इसके अलावा दयनीय हालत में क़रीब एक लाख 60 हज़ार लोगों को कैंपों में बंद रखा गया.

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